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2\41 Gali No. 2 Ansari road
Joined April 2020
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Check out this conversation around cyber-scam, job trafficking and writing. Cambodia Compound can be ordered from Amazon, Flipkart and on Unbound Script website. If English is your language, you may want to pick Press 9 For A Crime. @UnboundScript @PenguinIndia @CNBC_Awaaz
'गैंग्स ऑफ डिजिटलपुर' के इस विशेष एपिसोड में ध्रुव मिश्रा के साथ मौजूद हैं चर्चित पुस्तक 'कंबोडिया कंपाउंड' के लेखक और सुपरहिट वेब सीरीज 'ग्रहण' के निर्देशक शैलेंद्र झा। इस बातचीत में जानिए: विदेश में नौकरी (IT Jobs in Bangkok/Cambodia) के नाम पर युवाओं को कैसे कंबोडिया ले जाकर 'डिजिटल दास' (Digital Slavery) बनाया जाता है? 'डिजिटल अरेस्ट' का साइकोलॉजिकल खेल क्या है और क्यों पत्रकार, डॉक्टर व जज जैसे पढ़े-लिखे लोग भी इसमें फंस जाते हैं? भारतीय एम्बेसी और सरकार की चेतावनियों के बावजूद कंबोडिया, लाओस और म्यांमार का 'गोल्डन ट्राइंगल' कैसे काम कर रहा है? #GangsOfDigitalpur @imdhruvamishra @shajha26 #DigitalSlavery #CyberFraud #CyberSafety #CyberCrime
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ज़िंदगी तीन तरह से जवाब देती है किताब यहां उपलब्ध है : link.amazon/B0eTq6HxQ @yv_post @UnboundScript
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यशवंत व्यास की पुस्तक 'कॉरपोरेट जंगल का हिट उपदेश' की खास चर्चा @yv_post @UnboundScript @theBookwalla @harminderbooks
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किताब लिखना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी है उसका पाठकों तक पहुँचना। अक्सर हम किताबें लिखते हैं, लेकिन उन्हें पाठकों तक पहुँचा नहीं पाते। आदिवासी साहित्य, इतिहास और ज्ञान के साथ तो यह समस्या लंबे समय से रही है। मेरा पूरा प्रयास है कि जो कुछ लिखा जाए, वह सिर्फ किताब के पन्नों तक सीमित न रहे, बल्कि अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचे—ताकि आदिवासी समाज के बारे में सही इतिहास, तथ्य और जानकारी लोगों तक पहुँच सके। आदिवासी समाज पर लंबे समय तक ज्यादातर गैर-आदिवासियों ने लिखा और कई बार उनकी दृष्टि से लिखा गया इतिहास हमारे समाज की वास्तविकता को उलट-पुलट कर प्रस्तुत करता रहा। अब हमारे लोग स्वयं लिख रहे हैं, अपने इतिहास को दर्ज कर रहे हैं और उसे पाठकों तक पहुँचा रहे हैं। यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण है। इसी क्रम में मेरी पुस्तक “संविधान सभा में आदिवासी” को Amazon, Flipkart और अन्य माध्यमों से आप तक पहुँचाने का प्रयास जारी है। कल किताब के साथ कुछ तस्वीरें आई हैं। वे तस्वीरें अभी आपके सामने हैं। ❤️📚 अगर आप आदिवासी इतिहास, संविधान और संविधान सभा में आदिवासियों की भूमिका को समझना चाहते हैं, तो इस पुस्तक को जरूर पढ़ें और दूसरों तक भी पहुँचाएँ। किताब का लिंक कमेंट बॉक्स में👇 जोहार।
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आप सभी को विश्व आदिवासी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ #adivasidiwas
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आप सभी को जोहार! 🙏🏹 साथियों, बेहद हर्ष के साथ साझा कर रहा हूँ कि मेरी नई पुस्तक “संविधान सभा में आदिवासी” अब पूर्णतः प्रकाशित होकर आपके लिए उपलब्ध है। यह पुस्तक आप सभी के स्नेह, विश्वास और निरंतर प्रोत्साहन का परिणाम है। जिस तरह आपने मेरी पिछली पुस्तक “राष्ट्र निर्माण में आदिवासी” को भरपूर प्रेम दिया, उसी तरह इस पुस्तक को भी अपना स्नेह और समर्थन देंगे,ऐसी मुझे पूरी आशा है। “संविधान सभा में आदिवासी” दरअसल उस ऐतिहासिक संघर्ष को सामने लाने का प्रयास है,जिसे आदिवासी प्रतिनिधियों ने संविधान सभा के भीतर लड़ा था। यह संघर्ष उनकी पूर्ववर्ती लड़ाइयों से बिल्कुल अलग था। यहाँ उनका सामना अंग्रेज़ शासकों से नहीं, बल्कि उन लोगों से था जिन्हें अपने सभ्य, शिक्षित और अभिजात्य होने का अहंकार था। जिन्हें लगता था कि वे ही आदिवासियों के हितों को सबसे बेहतर समझते हैं और वही उनके भविष्य का निर्णय कर सकते हैं। लेकिन संविधान सभा में पहली बार भारत के मूलवासियों (The Real Owners of India) आदिवासियों ने अपने अधिकारों, स्वशासन, संस्कृति, पहचान और सम्मान की आवाज़ पूरे आत्मविश्वास के साथ बुलंद की। उन बहसों, संघर्षों और ऐतिहासिक निर्णयों की पूरी कहानी इस पुस्तक के पन्नों में दर्ज है। आज से यह पुस्तक Amazon पर ऑनलाइन उपलब्ध है। आप अभी अपना ऑर्डर कर सकते हैं। अगले कुछ दिनों में पुस्तक आपके घर तक पहुँच जाएगी। इस बार विश्व आदिवासी दिवस एक नई किताब, नए विचार और अपने इतिहास के साथ मनाइए। पुस्तक का लिंक:👇 [amzn.in/d/0ggmuNhr] आपका स्नेह, सुझाव और आशीर्वाद मेरे लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहे हैं। यदि आपको यह प्रयास सार्थक लगे, तो कृपया इस पोस्ट को अधिक से अधिक साझा करें, ताकि संविधान सभा में आदिवासियों के ऐतिहासिक योगदान की यह कहानी अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके। जोहार! — डॉ. जितेंद्र मीणा #संविधानसभामेंआदिवासी #SamvidhanSabhaMeinAdivasi #IndianConstitution #adivasi #TribalHistory #5thSchedule #6thSchedule #संविधान_सभा_में_आदिवासी #AdivasiHistory #ConstituentAssembly
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बहुत बहुत शुक्रिया अर्जुन
इतिहास तभी पूरा होता है जब उसमें हाशिए की आवाज़ें भी दर्ज हों। @JitendraMeenaDU की नवीन पुस्तक “संविधान सभा में आदिवासी” भारतीय संविधान निर्माण में आदिवासी प्रतिनिधियों की भूमिका, उनके विचार, संघर्ष और संवैधानिक योगदान का दस्तावेज़ है। #संविधान_सभा_में_आदिवासी
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शुक्रिया 🙏
इतिहास तभी पूरा होता है, जब उसमें आदिवासियों की आवाज़ भी दर्ज हो। @JitendraMeenaDU की पुस्तक "संविधान सभा में आदिवासी" इस ऐतिहासिक सत्य को सामने लाती है। #संविधान_सभा_में_आदिवासी
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जाति धर्म को एक तरफ रख के भारतीय होने के साथ साथ विवेकशील व्यक्ति को भी यह पुस्तक एक बार जरूर पढ़नी चाहिए । @JitendraMeenaDU #आदिवासी – at Warda, India
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आज जब संविधान को कमजोर करने की हर मुमकिन कोशिश की जा रही है ऐसे दौर में हमें संविधान को और अधिक मजबूती से पकड़े रहना होगा। इसके साथ-साथ इसके निर्माण की कहानी को जानना बेहद जरूरी है क्योंकि जो लोग इसे कमजोर कर रहे है वे इसकी बुनियाद पर चोट कर रहे है। ऐसे में हमें संविधान की बुनियाद को एक बार फिर से समझना होगा लेकिन इस बार उसे एक अलग नज़रिए-आदिवासी- से। क्योंकि आदिवासी दर्शन ने हमारे संविधान को समावेशी और लोकतांत्रिक बनाया है। इस पूरी कहानी को मैंने अपनी नई पुस्तक “संविधान सभा में आदिवासी” में दर्ज किया है। यदि आप संविधान की बुनियाद को और आदिवासियों के योगदान को समझना चाहते है तो इसे पढ़ सकते है। कुल 360 पेज की इस पुस्तक को @UnboundScript ने छापा है यदि आप इच्छुक है तो ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते है अथवा मुझे मैसेज या काल कर सकते है। जोहार डॉ जितेंद्र मीणा
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आज जब पूरे देश में शिक्षा की बदहाल होती व्यवस्था पर गंभीर बहस हो रही है, तो मुझे इस बात का फ़क्र है कि जब बहुत कम लोग इस विषय पर बोल रहे थे, तब मैंने अपनी आवाज़ बुलंद की। सत्ता की नाराज़गी का जोखिम उठाया, लेख लिखे, आंदोलन किए, लगातार सवाल उठाए, सोशल मीडिया पर तथ्यों और आँकड़ों के साथ शिक्षा की बर्बादी को बेनकाब किया, नौकरी तक गँवाई, और अंततः एक किताब लिखकर इस पूरे दौर को एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में दर्ज कर दिया- #प्रोफ़ेसर_की_डायरी। पिछले एक महीने में दर्जनों लोगों ने कहा कि वर्षों से जिस लड़ाई को आप लड़ रहे थे, आज वह देशव्यापी बहस का विषय बन गई है। लेकिन सच कहूँ तो मुझे इस बात से खुशी नहीं होती कि मेरी आशंकाएँ और मेरे जोखिम आज सच साबित होते दिखाई दे रहे हैं। मेरी असली खुशी उस दिन होगी, जब हम मिलकर स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों को बचा पाएँगे, जब शिक्षा को फिर से लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक और सबके लिए सुलभ बनाया जा सकेगा। अगर मेरी किताब हर गुजरते दिन के साथ और अधिक प्रासंगिक होती जाती है, तो यह अपने आप में कोई उत्सव का विषय नहीं है। हाँ, इतना सुकून ज़रूर है कि जिन बातों को मैंने समय रहते लिखा, जिन ख़तरों की ओर मैंने सबसे पहले इशारा किया, वे आज लाखों लोगों के बीच चर्चा का विषय हैं। यदि आपने अभी तक यह किताब नहीं पढ़ी है, तो एक बार अवश्य पढ़िए। शायद शिक्षा के इस संकट को समझने और उसे बदलने की लड़ाई में यह आपके भी काम आए। @UnboundScript प्रकाशन से आई मेरी इस किताब का लिंक नीचे ये है- amzn.in/d/0bwR9NUa
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नई पुस्तक — “संविधान सभा में आदिवासी” साथियों आपको सूचित करते हुए ख़ुशी है कि वर्षों की मेहनत और सैंकड़ो दस्तावेज़ों- रिपोर्टों, किताबों, लेखों एवं संविधान सभा की बहसों का अध्ययन के बाद अब मेरी नई पुस्तक “संविधान सभा में आदिवासी” तैयार है। यह रहा कवर पेज। साथियों मेरा उद्देश्य आदिवासी इतिहास के उन पन्नों को सामने लाना है, जिन्हें जान बूझकर छिपाया गया। जिसे बहुत कम पढ़ा अथवा समझा गया है। आदिवासी संविधान सभा में दर्शक नहीं थे बल्कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार थे। उन्होंने लोकतंत्र, स्वशासन, जल-जंगल-जमीन, सांस्कृतिक पहचान, भाषाई अधिकार, स्व-शासन व्यवस्था, आरक्षण और संवैधानिक सुरक्षा जैसे विषयों पर ऐतिहासिक विचार रखे। लेकिन यह दुखद है कि आदिवासियों की आवाज़ आज भी मुख्यधारा की चर्चा में जगह नहीं पा सकी। संविधान सभा में आदिवासी” उसी ख़ालीपन को भरने का प्रयास है। मुझे उम्मीद है कि यह पुस्तक केवल शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए ही नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और आदिवासी इतिहास में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। मैं @UnboundScript के प्रकाशक @theBookwalla का आभारी हूँ कि उन्होंने इस पुस्तक को प्रकाशित करने का निर्णय लिया। उनके सहयोग और प्रतिबद्धता के बिना यह कार्य संभव नहीं था। मित्र और संपादक आशीष मिश्रा का भी विशेष धन्यवाद करता हूँ। उनकी संपादकीय दृष्टि, टिप्पणियाँ, और निरंतर सहयोग ने इसे मूर्त रूप दिया। मैं दोस्तों, परिवारजनों और संसद भवन लाइब्रेरी के कर्मचारियों का भी हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने ये संभव बनाया। मेरी पहली पुस्तक “राष्ट्र निर्माण में आदिवासी” को देशभर के पाठकों ने जिस स्नेह और विश्वास के साथ स्वीकार किया, वही मेरे लिए इस दूसरी पुस्तक को लिखने की सबसे बड़ी प्रेरणा बना। आशा है कि “संविधान सभा में आदिवासी” भी संविधान और आदिवासी इतिहास पर एक गंभीर राष्ट्रीय विमर्श को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाएगी। नोट : अगले 2-3 दिनों में अमेजन पर मिलना शुरू हो जाएगी। जोहार डॉ. जितेंद्र मीणा दिल्ली विश्वविद्यालय
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क्यों पढ़ें यशवंत व्यास की यह पुस्तक 👇 @yv_post @UnboundScript @theBookwalla किताब यहां उपलब्ध है : link.amazon/B01uEBEOc
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यशवंत व्यास ने पारंपरिक मैनेजमेंट के उबाऊ सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए इसे 'रेज़र मैनेजमेंट' का नाम दिया है, जो आपको अपनी धार को पैना रखने और अपनी वास्तविक पहचान को बनाए रखने की तरकीबें सिखाता है। किताब यहां उपलब्ध है : link.amazon/B04Gsg3Vx @yv_post @UnboundScript
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करीब दस बरस पहले शैलेंद्र भाइजी से यूं ही एक औपचारिक-सी मुलाक़ात हुई थी। लेकिन उस छोटी-सी मुलाक़ात में ही उनके सौम्य व्यक्तित्व ने मुझे उनका प्रशंसक बना दिया था। एक रिश्ता यह भी था कि वे मेरे प्रिय आरिफ़ अली के जोड़ीदार रहे हैं। फिर संयोग ये रहा कि कुछ साल पहले हम एक ही मोहल्ले के वासी हो गये। आते-जाते मुलाक़ातें बढ़ीं, बातें बढ़ीं और अपनापा भी बढ़ता गया। हमारे बीच सहज सौहार्द के दो कॉमन बिंदु हैं। एक, हम दोनों टीवी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि से आते हैं। दूसरा, हमारी मातृभाषा एक है। शायद इसलिए बातचीत में एक अलग-सी घरवाली गर्माहट बनी रहती है। पिछले साल सितंबर में उनका पहला उपन्यास 𝐏r𝐞s𝐬 𝟗 𝐟o𝐫 𝐚 𝐂r𝐢m𝐞 छप कर आया। किताब मैंने मंगवा ली थी, लेकिन पढ़ना टलता रहा। न्यूज़ मीडिया के शीर्ष पर लंबे समय तक रहने की वजह से उन्होंने शायद भांप लिया था कि या तो अंग्रेज़ी में मेरा हाथ तंग है, या पूरी तरह गोल है। सो अभी कुछ दिन पहले इस उपन्यास का हिंदी संस्करण “कंबोडिया कंपाउंड” अनबाउंड स्क्रिप्ट से छप कर आया, तो उन्होंने मुझे बुलाया और बड़े स्नेह से यह किताब उपहार में दी। शैलेंद्र झा वही हैं, जिन्होंने मेरे बहुत प्रिय छोटे भाई सत्य व्यास के उपन्यास पर बनी चर्चित वेब सीरीज़ “ग्रहण” बनायी थी। उनकी सौम्यता अद्भुत है। इसकी झलक आप इस तस्वीर में भी देख सकते हैं। “कंबोडिया कंपाउंड” सिर्फ़ एक थ्रिलर नहीं है। यह हमारे समय की उस अंधेरी सुरंग में उतरती किताब है, जहां मोबाइल की घंटी, लोन ऐप का नोटिफ़िकेशन और एक अनजान नंबर से आया कॉल किसी साधारण आदमी की पूरी ज़िंदगी उलट सकता है। साइबर फ़्रॉड आज अख़बार की ख़बर भर नहीं रह गया है, यह हमारे घरों, जेबों, खातों और मन की शांति तक पहुंच चुका है। इस अपराध की दुनिया जितनी चमकदार स्क्रीन पर दिखती है, भीतर से उतनी ही बेरहम, संगठित और डरावनी है। आप भी “कंबोडिया कंपाउंड” ज़रूर पढ़िए।
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आगामी 12 जून की शाम 6 बजे, तहज़ीब और रवायत के शहर लखनऊ के लूलू मॉल में आयोजित "लूलू रीडर्स फ़ेस्ट" के अंतर्गत "लेखक से संवाद" कार्यक्रम में आपसे मुलाक़ात होगी। यह केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि विचारों, अनुभवों और संवेदनाओं के साझे होने का एक सुंदर अवसर है। @crossword_book और @LuLu_Mall की यह पहल विशेष इसलिए भी है कि यहाँ किताबें केवल अलमारियों में सजी वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि लेखक और पाठक के बीच एक जीवंत पुल हैं। एक ऐसा पुल, जिस पर चलते हुए हम अपने समय, समाज, संघर्षों, उम्मीदों और सपनों के बारे में बात कर सकते हैं। मैं @UnboundScript से प्रकाशित अपनी दोनों चर्चित पुस्तकों—प्रोफेसर की डायरी और जाति जनगणना पर संवाद के बहाने लखनऊ आ रहा हूँ। ये दोनों किताबें तो एक ज़रिया मात्र हैं, असली ख़्वाहिश आप सबसे मिलने, आपकी बात सुनने और अपने समय के सवालों पर एक आत्मीय संवाद करने की है। हर लेखक के लिए उसके पाठक केवल पाठक नहीं होते, वे उसकी यात्रा के सहयात्री होते हैं। जिन लोगों ने मेरी किताबों को पढ़ा है, उन पर विचार किया है, उनसे सहमति या असहमति जताई है, उनसे मिलना हमेशा एक विशेष अनुभव होता है। और जो अभी तक इन किताबों से नहीं जुड़े हैं, उनसे परिचय का यह अवसर भी कम महत्वपूर्ण नहीं। लखनऊ और आसपास के मित्रों, विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधार्थियों, पाठकों और शुभचिंतकों से आग्रह है कि इस शाम को संवाद की एक साझा शाम बनाइए। आइए, कुछ किताबों की बातें करें, कुछ समाज की, कुछ अपने समय की, और कुछ उन सपनों की जिन्हें अभी पूरा होना है। अभी से तारीख़ दर्ज कर लें- 12 जून, शाम 6 बजे लूलू रीडर्स फ़ेस्ट, लूलू मॉल, लखनऊ
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