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बाबा कहते हैं....“करोड़ों प्रकार से योग की साधना करके मुनिगण जिस परम गतिको भगवान् हरिसे माँगते हुए सकुचाते हैं वही परम गति त्रिपुरारि शिवजी की पुरी काशी में कीट-पतंग भी पा जाते हैं!”
दानी कहुँ संकर सम- नाहीं!
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शिवरात्रि, जन्माष्टमी पर हमें पूजा करने, दर्शन पाने मंदिर जाना पड़ता है, पर मैया हमारी करुणामयी है।
अष्टमी-नवमी पर वो विविध रूपों से झुंड के झुंड बना स्वयं हमारे घरों में आती, अपनी पूजा कराती और सबको कृतार्थ कर जाती! बाहर निकलो तो अनुभव होगा चारों ओर केवल मैया ही व्याप्त हैं🙂↕️
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तुलसीदास जी विनय पत्रिका में भगवती के स्वरूप का वर्णन ‘पर्वशर्वरीश वदनि’ रूप में करते हैं...शर्वरी का अर्थ रात्रि...और ईश से ईश्वर...रात्रि के ईश्वर हैं चन्द्रदेव...वो भी पर्व के...पुर्णिमा के चन्द्र के सदृश... क्या अद्भुत शैली है गोस्वामी जी की!
































