Associate Editor @aajtakradio, Podcast: Padhaku Nitin & Sandarbh, Ex @CNBC_awaaz, @TV9Bharatvarsh, @News24tvchannel •Lawyer • Writer of #इतिइतिहास, #नफरतीचिंटू

Noida, India
Joined April 2013
"मैं, जो बहुत बेसब्र हूँ, उनसे पहले ही जा रहा हूँ।" — 22 फरवरी 1942 की रात ब्राज़ील के एक शांत पहाड़ी कस्बे में जब स्टीफन ज़्विग और उनकी पत्नी लोटे ने नींद की गोलियों का ओवरडोज़ लिया तब वो अपने ज़हन में बहुत हद तक सारे सवालों से मुक्त थे। उस रात बीसवीं सदी के उस पूरे विचार की मौत हो गई थी जिसने यूरोप को कला, दर्शन और उदारता का केंद्र माना था। ज़्विग को शायद आप में से कुछ ने पढ़ा हो, कुछ ने मेरी तरह देर से खोजा हो। मुझे उनका नाम पहली बार पता चला था जब एक शानदार फिल्म खत्म हुई और अंत में डायरेक्टर ने उन्हें याद करते हुए कुछ लाइनें लिखीं। —- ज़्विग विश्वयुद्धों के दौर में दुनिया के सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले लेखक थे। वियना के एक संपन्न यहूदी परिवार में पले-बढ़े ज़्विग की आँखों ने उस यूरोप को देखा था जो बिना पासपोर्ट की खुली सीमाओं, वियना के मशहूर कैफ़े-हाउसों में चलने वाले दार्शनिक विमर्शों और एक साझा महाद्वीपीय सभ्यता का सपना जी रहा था। ज़्विग ने अपनी आत्मकथा 'द वर्ल्ड ऑफ यस्टरडे' में इसे 'सुरक्षा का स्वर्णिम युग' कहा था। विडंबना देखिए इसी आत्मकथा की कॉपी प्रकाशक को डाक से भेजने के ठीक 24 घंटे बाद ज़्विग ने अपनी पत्नी का हाथ थामे यह दुनिया छोड़ दी। फ्रायड, गुस्ताव महलर और रिल्के जैसे दिग्गजों के समकालीन ज़्विग 1920-30 के दशक में जर्मन भाषियों और पूरे यूरोप में एक सेलिब्रिटी की तरह पढ़े जा रहे थे। 'Beware of Pity' और 'Letter from an Unknown Woman' जैसी उनकी किताबों के अनुवाद दुनिया भर में हिट थे। मगर समय बदला। 1914 के पहले विश्व युद्ध और फिर 1930 के दशक में उभरे नाज़ीवाद ने उस परिष्कृत दुनिया को चंद बरसों में रौंद डाला। जिस वियना को ज़्विग अपनी आत्मा मानते थे वहाँ उनकी किताबें जलाई जाने लगीं। 10 मई 1933 को हिटलर के प्रोपेगैंडा मंत्री गोयबल्स के आदेश पर उन्मादी नाज़ी छात्रों ने चौराहों पर उन किताबों को जलाया जिन्हें वे 'अन-जर्मन' मानते थे। इसमें फ्रायड, मार्क्स, आइंस्टीन और थॉमस मान के साथ ज़्विग की किताबों भी थीं। उनकी किताबों की छपाई पर पाबंदी लग गई। प्रकाशकों पर दबाव बनाकर अनुबंध रद्द कराए गए। —- अराजनैतिक स्वभाव के ज़्विग पहले विश्व युद्ध के बाद से वियना छोड़कर साल्ज़बर्ग में एक पहाड़ी पर बने अपने सुंदर घर में रहने चले गए थे। 1934 के फरवरी में ऑस्ट्रियाई गृहयुद्ध के दौरान एक दिन पुलिस ज़्विग के घर में घुस आई। झूठा शक जताया गया कि उन्होंने घर में वामपंथी मिलिशिया के हथियार छुपा रखे हैं। तलाशी में कुछ नहीं मिला, लेकिन एक विश्वप्रसिद्ध, शांतिप्रिय लेखक के घर में पुलिस का इस तरह अपमानजनक ढंग से घुसना यह बता गया कि अब मुल्क में न कानून का राज बचा है, न नागरिक गरिमा। आहत होकर ज़्विग लंदन चले गए। 1938 में जब हिटलर ने ऑस्ट्रिया का विलय किया तो ज़्विग का पासपोर्ट रद्द हो गया। वो स्टेटलेस हो गए। ब्रिटेन में रिफ्यूजी कार्ड लेना पड़ा। युद्ध छिड़ते ही जर्मनों पर शक़ गहराने लगा तो वे पहले अमेरिका और फिर 1941 में ब्राज़ील में शरण पाए। — फरवरी 1942 में नाज़ी अजेय लग रहे थे। 60 साल के ज़्विग की हिम्मत अब टूटने लगी थी। 22 फरवरी 1942 को रविवार था। पेट्रोपोलिस के अपने छोटे से किराए के बंगले में ज़्विग ने आत्मीयजनों को खत लिखने के बा पुर्तगाली में “घोषणा” शब्द लिखकर जर्मन में अपना अंतिम सुसाइड नोट टेबल के बीचों-बीच रखा। रात करीब 9 से 10 बजे के बीच ज़्विग और लोटे ने अपने बेडरूम का दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया। लंबे वक्त से जमा की गई नींद की गोलियों का घोल पहले 60 साल के ज़्विग ने पिया और अचेत हो गए। फिर 33 साल की लोटे ने भी उतनी ही खुराक ले ली। रिपोर्ट कहती हैं कि ज़्विग ने लोटे से जीने का आग्रह किया था, मगर वे ज़्विग के बिना इस उजड़ी दुनिया में रहने को तैयार नहीं थीं। अगली सुबह नाश्ते के लिए जब नौकरानी ने दरवाज़ा खटखटाया तो अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। सुबह दस बजे तक कोई हलचल न होने पर पुलिस बुलाई गई और दरवाज़ा तोड़ा गया। अंदर संघर्ष या तड़प का कोई निशान नहीं था। हर चीज़ अपनी जगह पर करीने से रखी थी। ज़्विग जा चुके थे। उनके लिखे नोट की कुछ लाइनें साफ चमक रही थीं- मैं अपने मित्रों को सलाम करता हूँ! काश वो आनेवाली भोर देख सकें! मैं, जो बेसब्र हूँ, पहले जा रहा हूँ।" ज़्विग का जाना यह सबक छोड़ गया कि सभ्यताएँ और लोकतंत्र कोई अमर शिलालेख नहीं हैं जिन्हें कभी खरोंच न आए। जिस शिष्टाचार और आज़ादी को हम बहुत सहज मान बैठते हैं, अगर उनकी हिफ़ाज़त न की जाए तो वे नफ़रत के एक ही झोंके में तिनकों की तरह बिखर सकते हैं।अफसोस कि जिस भोर से पहले वो बेसब्र होकर चले गए, वो कुछ ही साल बाद आ गई थी। #इतिइतिहास (फोटो- ज़्विग का अंतिम नोट)
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ना इस्तेमाल करने से इंसान की पूंछ मिट गई, मुझे डर है एनसीआर वालों की कार से इंडिकेटर ना गायब हो जाएं।
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फाहियान ने जो देखा वो 1627 साल पुराना भारत था। पता नहीं कब कागज़ पत्तर की अंग्रेज़ी गुलामी हमें सभ्य लगने लगी। अब नागरिक स्वतंत्रता भी सिर्फ़ कागज़ में है। उसे हरने के दुनिया भर की हुकूमतों के पास पचास बहाने हैं।
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Even today, the world stands behind Pakistan- with the US dragging most of them there by the arm.
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ये जितेंद्रनाथ सान्याल ने लिखा था. वही जिन्होंने भगत सिंह के साथ संघर्ष किया. किसी वक्त क्रांतिकारियों की बाइबिल रही “बंदी जीवन” लिखनेवाले शचींद्रनाथ सान्याल और काकोरी में सज़ा काटनेवाले भूपेंद्रनाथ सान्याल के भाई. सान्याल बंधुओं के बारे में थोड़ा पढ़िए. #इतिइतिहास
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ये कोई संयोग नहीं है।
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देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में खींची गई अंतिम फोटो। सादेपन, दृढ़ता, ईमानदारी और कर्मठता के प्रतीक शास्त्री जी को जयंती पर कोटि कोटि प्रणाम!! 🙏🙏🙏
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गांधी के राष्ट्रपिता होने पर बड़े सवाल किए जा रहे हैं। कोई राष्ट्र का पिता कैसे हो सकता है भला??? शब्दज्ञान के जुगनुओं, हो तो राष्ट्र का पति भी नहीं सकता लेकिन है। राष्ट्र कभी देश नहीं होता। ये नेशन स्टेट है। नेशन स्टेट में सबकुछ हो सकता है। पति भी पिता भी। जिस दुनिया से ये अवधारणाएं फैली हैं ये पद और पदवी भी वहीं से आए हैं। काश कि तुमने पॉलिटिकल साइंस पढ़ा होता, काश कि तुम्हारा लेनादेना इतिहास से होता, काश कि तुम नफरत हटाकर वाकई प्रश्न का उत्तर खोजने निकलते।
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चीन पर पॉडकास्ट की तैयारी में फाहियान को पढ़ रहा था तो कल रात कुछ लिखकर पोस्ट किया। थोड़ा मन हुआ कि सबको बताऊं फाहियान ने पाटलिपुत्र में क्या देखा। पाटलिपुत्र आज के पटना से दूर नहीं है। यहां फाहियान ने बहुत चीज़ों के अलावा एक ऐसे अस्पताल का ज़िक्र किया जो रोगियों की मुफ्त सेवा में लगा था। हाल फिलहाल इसके खंडहर कुम्हरार में पाए जा सकते हैं। गूगल पर बेशुमार फोटो पड़ी हैं। पटना वालों के लिए ये कोई हैरत वाली बात नहीं लेकिन बहुत लोग हैं जिन्हें ये नहीं मालूम। 1912-15 में कुम्हरार में खुदाई हुई थी तो वो सब मिला जिसके बारे में फाहियान ने लिखा था। मेरी पिछली पोस्ट के नीचे कमेंट में एक सज्जन ने पूछा था कि मठ मिले, अस्पताल मिले, स्तूप मिले लेकिन महल नहीं मिले क्या, वो ईंट के नहीं बनते थे? तो उसका जवाब है कि मिले और ऐसे मिले कि दुनिया का माथा हिल गया। यहां 80 खंभों वाला अशोक का बनवाया भव्य सभागार मिला। हर खंभे की ऊंचाई 32 फीट थी। दस पंक्तियों में आठ आठ खंभे खड़े किए गए थे। इन पर शीशे जैसी चिकनी पॉलिश थी जिसे 650 साल बाद भी फाहियान महसूस कर सकता था। इन खंभों को धंसने से बचाने के लिए साल की लकड़ी के बड़े-बड़े चौखटे नीचे बिछाए गए। सभागार की छत और फर्श लकड़ी के थे। जब करीब सौ साल पहले खुदाई चली तो इन सब चीज़ों के साथ राख और कोयले की मोटी परत मिली। पुरातत्वविदों ने माना कि ये भव्य इमारत किसी अग्निकांड में खाक हुई थी। आग के ताप से बलुआ पत्थर के खंभे टुकड़ों में बिखर कर फैल गए। ऐसा नहीं कि इस महल और सभागार का पता बस चीनी यात्री फाहियान देता हो। उसके 700 साल पहले मेगस्थनीज़ जब अशोक के दादा चंद्रगुप्त मौर्य के समय आया था तब उसने यहां लकड़ी का प्रासाद देखा था। उसने लिखा कि भारतीय राजप्रासाद ईरान के हखामनी साम्राज्य के विख्यात महलों से ज़्यादा सुंदर और प्रभावित करनेवाले थे। मेगस्थनीज़ ने चंद्रगुप्त मौर्य के महल का वर्णन किया है वो लकड़ी का बना था। पटना के ही बुलंदीबाग जो कुम्रहार से थोड़ी दूरी पर है वहां की खुदाई में लकड़ी की विशाल चारदीवारी, लकड़ी के नाले और सुरक्षा प्राचीर के अवशेष मिले हैं। चंद्रगुप्त वाले लकड़ी के महल को बाद में अशोक ने बड़ा और खूबसूरत बनवा दिया जहां श्रीलंकाई परंपरा और इतिहास के मुताबिक तृतीय बौद्ध संगीति आयोजित हुई, जिसकी अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी। ये बहुत बड़ी घटना थी जिसे आज सिलेबस में पढ़ाते हैं। इसके बाद मैंने आपको बताया कि इस इमारत को फाहियान ने देखा जब इसका असर खत्म होने की तरफ था। उसके भी करीब सवा दो सौ साल बाद ह्वेनसांग आया तब तक पाटलिपुत्र का पतन हो चुका था और सत्ता कन्नौज जा चुकी थी। ह्वेनसांग की किताब कहती है कि पाटलिपुत्र का पुराना नगर वीरान हो गया। अशोक का ऐतिहासिक प्रासाद और सभागार खंडहरों के ढेर में तब्दील हो गए। बड़े पैमाने पर यहां कमरे या रहने की जगह का ना मिलना सवाल खड़े करता है मगर पुरातत्वविदों का कहना है कि मौर्य काल में रिहायशी महल बहुमंजिला और अधिकतर साल और शीशम की नक्काशीदार लकड़ी से बनते थे। पत्थर का इस्तेमाल मुख्य रूप से विशाल खंभों और सार्वजनिक स्मारकों में हुआ। आगजनी और गंगा- सोन की बाढ़ के कारण लकड़ी का पूरा रिहायशी ढांचा सदियों पहले नष्ट हो गया था। उसी कुम्हरार परिसर में ऊपर की परतों से गुप्त काल का आरोग्य विहार और धन्वन्तरि नाम खुदा हुआ पात्र मिला जिसकी बात मैंने पिछली पोस्ट में की। इससे ये साबित हुआ कि भले अशोक का सभागार खत्म हो गया पर उस जगह के आसपास गतिविधियाँ होती रहीं। एक दिलचस्प बात और। दिव्यावदान और अशोकावदान नाम के बौद्ध संस्कृत ग्रंथों में उल्लेख है कि अशोक ने अपने शासनकाल में यक्षों की मदद से पाटलिपुत्र में एक अद्भुत प्रासाद और 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया था। यही लोक मान्यता फाहियान के कानों तक पहुंची और इसीलिए उसने अपनी किताब में कहा कि अशोक का ये सभागार देवदूतों ने बनाया, इंसानों के बस का नहीं था। तस्वीर में खुदाई के दौरान निकला सभागार का खंडहर। #इतिइतिहास
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पानी की टंकी भर गई है, कृपया मोटर बंद कीजिए। ये नारा भी है। दर्शन भी। चेतावनी भी।
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आज फाहियान की किताब फ़ो-क्यो-की (हिंदी में उपलब्ध) पढ़ रहा था। करीब सोलह सौ साल पहले चीन से आया ये बौद्ध भिक्षु जब भारत की सड़कों पर घूम रहा था तो उसने जो कुछ देखा उसे अपनी डायरी में दर्ज किया। कुछ विद्वानों का मत है कि वो रोज़ नहीं लिखता था बल्कि बाद में अपनी याददाश्त के आधार पर लिखता था, और इसीलिए कई बार भूल भाल भी जाता था। फाहियान बौद्ध भिक्षु था और चीन से चला था ताकि विनयपिटक की एक प्रति भारत से लेकर लौट सके। बौद्ध धर्म के आधारभूत ग्रंथ त्रिपिटक में से एक है विनयपिटक। फाहियान जिस वक्त यहां आया तब गुप्त वंश के राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का राज था। उन्होंने 375 से 415 ई में शासन किया। ये वही राजा हैं जिनके दरबार में नवरत्न थे- अभिज्ञानशाकुंतलम, मेघदूत और रघुवंश जैसी अमर कृतियां लिखनेवाले कालिदास, आयुर्वेद और शल्य चिकित्सा के महान आचार्य धन्वंतरि, बृहत्संहिता लिखनेवाले खगोलशास्त्री वराहमिहिर, संस्कृत के पहले सुव्यवस्थित शब्दकोश अमरकोश के रचयिता अमर सिंह। कुल मिलाकर भारतीय इतिहासकार इस कालखंड को “स्वर्णयुग” लिखते हैं। चंद्रगुप्त द्वितीय के राजकाज में धार्मिक भेदभाव नहीं था। वो खुद विष्णु के परम भक्त थे और परमभागवत की उपाधि धारण करते थे। कुतुब मीनार परिसर में खड़ा जंग रहित महरौली का लौह स्तंभ उन्हीं के काल का माना जाता है, जिस पर चंद्र नाम खुदा है और जो भगवान विष्णु को समर्पित था। अभी हाल में स्वप्ना लिडिल के साथ पढ़ाकू नितिन पॉडकास्ट में उसका ज़िक्र भी हुआ था। चंद्रगुप्त का अपना सेनापति आम्रकार्दव बौद्ध था। मुख्य विदेश और गृह मंत्री वीरसेन 'साब' एक शैव था। राज्य में बौद्ध मठों और हिंदू मंदिरों दोनों को बराबर दान और सुरक्षा मिलती थी। हालांकि फाहियान ने अपने विवरण में राजा का नाम साफ साफ नहीं लिखा लेकिन कई बातों में एक बात ने मुझे पोस्ट लिखने को मजबूर किया। हो सकता है इस बारे में पटना के लोग जानते हों लेकिन बाकी नहीं। उसने बताया कि शहर के रईसों ने वहां एक मुफ्त अस्पताल खोल रखा था। गरीब, अनाथ, लाचार या बाहर से आए किसी भी बीमार व्यक्ति का वहां मुफ्त इलाज होता था, खाना मिलता था और ठीक होने तक रहने की पूरी छूट थी। सालों साल कई इतिहासकार इसे सिर्फ एक यात्री की बढ़ा चढ़ाकर लिखी बात मानते रहे। उन्हें लगता था कि इतने पुराने जमाने में ऐसा सरकारी या सामाजिक अस्पताल कैसे हो सकता है लेकिन जमीन बहुत दिनों तक सच नहीं छिपाती। 1950 के दशक में जब पटना के कुम्रहार में खुदाई हुई तो मिट्टी के नीचे से पकी ईंटों के कमरे निकले। साथ में मिट्टी की एक सील मिली, जिस पर पुरानी लिपि में लिखा था- श्री आरोग्य विहारे भिक्षु संघस्य। यानी वो सचमुच बौद्ध भिक्षुओं द्वारा चलाया जाने वाला एक अस्पताल (आरोग्य विहार) ही था। वहां मिट्टी के एक बर्तन का टुकड़ा भी मिला, जिस पर लिखा था- धन्वन्तरेः। यानी धन्वंतरि के नाम से जुड़ा हुआ जो उसी दौर के सबसे बड़े वैद्य थे। पुरातत्वविदों का मानना है कि ये पात्र या तो चंद्रगुप्त के नवरत्न धन्वंतरि के नाम या उपाधि से संबंधित था या फिर इस अस्पताल के मुख्य औषधालय को उनके नाम पर समर्पित किया गया था। वैसे धन्वंतरि चिकित्सा के देवता भी माने जाते हैं। सोचकर अच्छा लगता है कि जिस जमाने में दुनिया में अस्पतालों की कोई खास समझ नहीं थी, उस दौर में हमारे यहां साफ सफाई, पानी की निकासी और हर इंसान के मुफ्त इलाज का एक पूरा सिस्टम जमीन पर चल रहा था। फोटो उसी अस्पताल के खंडहरों की है। कभी समय हो तो मेगस्थनीज़ (करीब 300 ईसा पूर्व), फाहियान (करीब 400 ईस्वी) और ह्वेनसांग (करीब 630 ईस्वी) के यात्रा विवरणों को पढ़िए। करीब एक हज़ार साल का बदलता भारत दिखेगा, साथ में दिखेगा पाटलिपुत्र भी। आपको दुख होगा कि चीज़ें सिर्फ बदतर ही होता गईं। #इतिइतिहास
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सस्ते में लगा देंगे बाऊ जी.. आओ तो सही..
तेरा ध्यान किधर है, #TTstaff दुकान इधर है 👉 itgstore.in/
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इंस्टाग्राम पर रील दिख जाती हैं जिसमें कोई ना कोई विद्वान पांच किताबें बता रहा है.. कभी पॉलिटिक्स समझने के लिए, कभी इंटरनेशनल अफेयर्स और कभी इकोनॉमी। मैं सारी सेव कर रहा हूं। इस जन्म में खरीद लूंगा। फिर अगले में उम्मीद है पढ़ भी लूंगा।
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कोई दिन नहीं जाता जब नोएडा में बिना नंबर प्लेट की कार नहीं दिखती हैं। @Noidatraffic
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गुड़गांव में महिला बाइकर को टक्कर मारकर भाग निकलनेवाला आदमी सबको बुरा लग रहा है लेकिन नोएडा में बिना नंबर लगाए दनदनाती कारें किसी को अभी दिख नहीं रहीं। किसी ऐसी ही घटना के होने का इंतज़ार है क्या? हर आदमी कैमरा लगाकर निकलता भी नहीं है। नोएडा ट्रैफिक पुलिस ने ऐसी क्या व्यवस्था बना रखी हैं कि बिना पिछली नंबर प्लेट लगाए दौड़ रही कारों की पहचान हो सके? यदि कोई तरीका हो तो आम इंसानों को भी शेयर करें।
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बहुत से लोग बुद्ध के साथ जीवनभर घूमकर भी प्यासे ही रह गए. किताबों, फिल्मों, अच्छी संगति में रहने के बावजूद कुछ लोग चिकने घड़े रह जाते हैं. दरअसल योग्यता सिखानेवाले की ही ज़रूरी नहीं, सीखनेवाले की भी आवश्यक है.
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एक बहुत शानदार डॉक्यूमेंट्री आप यूट्यूब पर देख सकते हैं। ये उन दिलचस्प 13 दिनों की कहानी है जब सोवियत यूनियन के सातवें प्रीमियर निकिता ख्रुश्चेव अमेरिकी दौरे पर थे। वो साल 1959 था और महीना यही सितंबर. अथाह संशय से भरे ख्रुश्चेव हर बात पर बारीक नज़र रखे थे। शीतयुद्घ के तनाव को कुछ हल्का करने के लिए वो अमेरिका पहुंचे ज़रूर थे लेकिन उन्हें शक था कि अमेरिकी उनका अपमान भी कर सकते हैं। कुछ ही दिनों पहले उनके एक बयान को तोड़ मरोड़कर फैलाया गया था जिसकी एक लाइन अमेरिका के बच्चे- बच्चे तक कुछ यूँ पहुँची कि ख्रुश्चेव उन्हें दफना देना चाहता है। इस दौरे की शुरूआती फुटेज दर्शाती है कि उनकी झलक देखने के लिए अमेरिकी लोग सड़कों पर उतर तो आए थे लेकिन ये लोग ना हाथ हिलाते थे ना मुस्कुराते थे। सरकारी इंतज़ाम के तहत उनसे मिलने के लिए फ्रैंक सिनात्रा, एलिज़ाबेथ टेलर, मर्लिन मुनरो जैसे सितारे पहुंचे और उन्हें ट्वेंटीथ सेंचुरी फॉक्स के स्टूडियो ले जाया गया। ख्रुश्चेव अपना घूम फिर रहे थे मगर उनकी इच्छा थी कि नेताओं- अभिनेताओं से हटकर आम अमेरिकियों से मुलाकात हो। ये अमेरिका के प्लान में नहीं था। इस दौरे में एक दफे ऐसा भी हुआ जब पत्रकारों ने उन्हें उकसा दिया। एक शहर के मेयर ने निकिता ख्रुश्चेव को हत्थे से उखाड़ दिया। फिर डिज़्नीलैंड का उनका दौरा सुरक्षा कारणों से रद्द हो गया तो सरकारी लोगों से बोर हो चुके ख्रुश्चेव की निराशा का ठिकाना नहीं रहा। अब वही होने लगा जिसका डर था। उन्हें मज़ा नहीं आ रहा था। वॉशिंगटन डीसी ने उनके मूड को भांपा और आदेश दिया कि इस रूसी भालू को बिल्कुल नाराज़ ना किया जाए। मूडी से ख्रुश्चेव को थोड़ी राहत मिली जब इसके बाद उन्हें आम लोगों के बीच ले जाया जाने लगा। यही वो चाह रहे थे, और यहीं से सब बदलनेवाला था। लोगों से मेल मिलाप के दौरान ज़बरदस्त मीडिया कवरेज पा रहे ख्रुश्चेव की छवि रातों रात बदलने लगी। वो लोगों से बात कर रहे थे, ग्रॉसरी स्टोर में हाथ मिला रहे थे, फैक्ट्री में एक मज़दूर ने उन्हें सिगार भेंट किया तो उन्होंने अपनी घड़ी उतार कर दे दी। मोटे-नाटे ख्रुश्चेव को करीब से देखने के लिए शहर उमड़ रहा था। आम अमेरिकी अपने “दुश्मन” को देखने आ रहे थे लेकिन एक मिलनसार जिज्ञासु बूढ़े को देख यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही आदमी है जिससे उनकी ज़िंदगियों को अमेरिकन मीडिया खतरा बताता रहता है। इस बीच ख्रुश्चेव अपने एक अमेरिकी मित्र से मिलने पहुंचे। उसके खेत में ऐसी भीड़ आई कि फसल तबाह हो गई। बहुत ज़ोर का ड्रामा रहा। अब अमेरिकी लोग ख्रुश्चेव को देखकर मुस्कुरा रहे थे। उन्हें वो एक ऐसे बूढ़े की तरह दिख रहे थे जो हंसता है, चुटकुले मारता है और कई बार गुस्सा जाता है। चौतरफा मीडिया कवरेज के बीच अमेरिका के शहर शहर होकर जब ख्रुश्चेव राष्ट्रपति आइज़नहावर से बातचीत करने कैंप डेविड पहुंचे तो कूटनीतिक मोर्चे पर सब वैसा नहीं हुआ जैसा सोचा गया। फिर भी ख्रुश्चेव जाते जाते आइज़नहावर को अपने देश आने का न्यौता दे आए लेकिन उसके बाद चीज़ें बिगड़ती गईं। रूसी आसमान में अमेरिका का जासूसी एयरक्राफ़्ट मार गिराया गया जिससे एक दूसरे को लेकर जो थोड़ा भरोसा जमा था वो खत्म हो गया। ख्रुश्चेव ने अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए बड़े मन से गोल्फ कोर्स तैयार कराया था पर अब न्यौता वापस ले लिया गया। नाराज़ ख्रुश्चेव इसके बाद फिर से एक बार अमेरिका गए भी लेकिन इस बार वो बस संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक में न्यूयार्क पहुंचे। दुनिया में घटनाएं तेज़ी से घट रही थीं। बर्लिन की दीवार को भी हरी झंडी दे दी गई। और तो और क्यूबा संकट सामने खड़ा हो गया। कैनेडी ने क्यूबा को घेर लिया और दुनिया निकिता ख्रुश्चेव की परमाणु बम से लैस मिसाइलों की तरफ देखने लगी। पृथ्वी का हर देश दम साधे इंतज़ार कर रहा था कि किस तरफ से पहला परमाणु हमला होगा… अमेरिकियों को ख्रुश्चेव फिर दुश्मन दिखने लगे लेकिन फिर एक खुले और एक गुप्त समझौते के तहत दोनों देश पीछे हट गए। परमाणु युद्ध टल गया। आज भी सोवियत यूनियन द्वारा परमाणु हमला ना किए जाने के पीछे कई थ्योरी चलती हैं। सच क्या है नहीं मालूम लेकिन एक थ्योरी ये भी है कि ख्रुश्चेव के दिल में अमेरिका की मीठी यादें अब तक बसी थीं। वो अपने उस अमेरिकी दौरे को भूले नहीं थे। उन्होंने सच्चे दिल से अमेरिकियों की दोस्ती चाही थी। उस दौरे में अमेरिकियों से मिले प्यार को वो कभी नज़र अंदाज़ नहीं कर सके। शायद इसलिए ख्रुश्चेव ने म्यान से निकली अपनी तलवार कभी नहीं चलाई।
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