पत्रकार और लेखक।राजनीति पर ख़बरें सुनता और सुनाता हूँ।एक्स - इंडिया टुडे, राजस्थान पत्रिका. राजनीति पर सात किताबें प्रकाशित.

New Delhi
Joined September 2009
इधर राहुल गांधी विपक्ष के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग पर धरना प्रदर्शन कर रहे थे,उधर अमित शाह और बीजेपी के रणनीतिकार संसद में दो तिहाई बहुमत हासिल करने की रणनीति पर काम कर रहे थे। दरअसल विपक्षी एकता का नेतृत्व कर रही कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका लोकसभा सीटें बढ़ाने के लिए संविधान (131वां संशोधन) बिल,परिसीमन (संशोधन) बिल और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल पर लगने जा रहा है। गौरतलब है कि संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हुआ था,लेकिन इसका अब तक सत्रावसान नहीं किया गया है। क्या है लोकसभा का गणित  लोकसभा में 543 सांसद हैं।3 सीटें खाली हैं। इनमें से एनडीए के 318 सांसद हैं। बिल को पास कराने के लिए दो-तिहाई यानी 360 वोट चाहिए। मतलब सरकार को 42 सांसदो का समर्थन चाहिए। राज्यसभा का क्या है गणित  राज्यसभा में 245 सीटें हैं। 3 खाली हैं। इस तरह 240 में से एनडीए के 153 सांसद हैं।यहां बिल को पास कराने के लिए 162 सांसद चाहिए।यानी,यहां भी एनडीए को छोटी पार्टियों के 9 सांसदों की जरूरत पड़ेगी। कौन सरकार का साथ दे सकता है। लोकसभा में ऐसे 39 सांसद हैं जो ना एनडीए का हिस्सा हैं और ना ही इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं।इसमें से डीएमके के 22, अकाली दल के एक और निर्दलीय और अन्य छोटे दलों के 4 सांसद सरकार का समर्थन कर सकते हैं।नागौर से लोकसभा सांसद हनुमान बेनीवाल का सरकार के साथ जाना तय है। इंडिया गठबंधन में से सबसे दिलचस्प समर्थन नेशनल कॉन्फ़्रेंस के 2, झारखंड मुक्ति मोर्चा के 3 के साथ शरद पवार के 8 सांसदो का समर्थन मिल सकता है। खबर यह भी है कि समाजवादी पार्टी से बातचीत लगभग हो चुकी है।अखिलेश यादव ने थोड़ा समय मांगा है।अखिलेश यादव भी अंतिम समय में सरकार का समर्थन कर सकते हैं। एक क्षेत्रीय पार्टी में बड़ी टूट भी हो सकती है।कांग्रेस के कुछ सांसद भी पाला बदल सकते हैं,भले ही उन्हें फिर चुनाव में जाना पड़े। दरअसल मोदी और शाह कांग्रेस को बड़े झटके के साथ बिल पास कराना चाहते हैं।झटका कब और कितने वोल्ट का होगा यह देखना बाकी है। थोड़ा इंतिज़ार कीजिए।सरकार संसद में बिल पास कराने जा रही है।
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रोज़ सुबह लिखने का सिलसिला 1277 दिनों से लगातार जारी है।लिखने से एक दिन का भी अवकाश नही लिया। सुबह लिखने के इस उपक्रम में कुछ अच्छा पढ़ने और मनपसंद सुनने के लिए समय नहीं मिल रहा था। सोशल मीडिया समय का एक अच्छा खासा हिस्सा सोख रहा है।इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि सोशल मीडिया के इश्क़ ने मुझे निकम्मा बना दिया।मेरी पूरी दुनिया सोशल मीडिया पर लिखने और टीवी डिबेट में सिमट कर रह गई।सोशल मीडिया से दूरी बनाकर ख़ुद के लिए थोड़ा समय चाहता हूँ। एक सप्ताह सोशल मीडिया से दूर रहने का तय किया है।फैसला आसान नहीं था,लेकिन कर लिया है। अब आप सबसे अगले सोमवार 19 अक्टूबर को सुबह 8.30 बजे मुलाक़ात होगी। आप सब स्वस्थ रहे, मस्त रहे और अपना ध्यान रखें। 🙏
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दिल्ली पुलिस इतनी नाकारा और निकम्मी है कि पत्रकारों को भी आंदोलनकारी समझ रही है। देश के प्रतिष्ठित पत्रकारों,नए युवा पत्रकारों, मीडिया संस्थाओं को एक ही डंडे से हॉक रही है।
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आज सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का जन्मदिन है। बच्चन साहब आज 84 साल के हो गए। इस उम्र में भी अमिताभ बच्चन रचनात्मक ऊर्जा से खौल रहे है और हमारी खाली जगहों को ऐसे भर रहे है जैसा उँगली पर गिनने वाले लोग कर पाते हैं। अपने शुरुआती सालों में लंबे और बहुत दुबले-पतले अमिताभ के पास न क्लासिक सुडौल चेहरा था और न ही सुगठित मांसपेशियों से भरी वैसी काया जो उनके समकालीन अभिनेताओं के पास थी।मगर अभिताभ के पास जो था वह किसी और के पास नहीं था।सिनेमा और इतिहास ने अमिताभ बच्चन को जो भूमिका सौंपी,उसके साथ उन्होंने पूरा न्याय किया।जब अमिताभ सोच-विचार में खोई, सुलगती आंखें और सदमे के साथ गुस्सा और तकलीफ बयान करने वाला चेहरा लेकर आए तो लोगों के दिलो-दिमाग में उसकी गहरी गूंज सुनाई दी।उन्होंने जीने और होने का एक तरीका बताया। अमिताभ बच्चन के आगाज का एक असल लम्हा खोजना हो तो वह हो सकता है जब दर्जन भर असफल फिल्मों के बाद भी सलीम-जावेद की सिफारिश पर प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन को 'जंजीर' फ़िल्म में अवसर दिया और जंजीर में परदे की उनकी हीरोइन और बाद में पत्नी बनीं जया भादुड़ी ने गूंजते हुए शब्दों में उनसे कहा, "इस लावे को बहने दो." और वह बह निकला, दशकों के लिए,जहां अमिताभ बच्चन को हिंदी सिनेमा का नंबर 1 से नंबर 10 तक कहा जाने लगा। एक समय ऐसा भी आया जब बेहिसाब कर्ज और लगभग दिवालिया हो चुके अमिताभ को धीरूभाई अंबानी ने सलाह दी कि अभिनय के रास्ते पर चलकर ही वह कर्ज से मुक्ति पाएंगे क्योंकि इसी काम में वह निपुण हैं और इसी के बाद उन्होंने कौन बनेगा करोड़पति के साथ साधारण लोगों से मनोहर मुस्कान के साथ सौम्य बातचीत करते हुए खुद को नए सिरे से ईजाद किया।यश चोपड़ा की 'मोहब्बतें' अनुबंधित की।यहीं से कर्ज मुक्ति की राह प्रशस्त हुई।कर्ज से उबरने के लिए अपने दृष्टिकोण को विशुद्ध व्यावसायिक बना लिया और उसके बाद अमिताभ बच्चन ने स्वयं को कभी भी किफायत से खर्च नहीं किया। मेहनताना मिल जाने पर उन्हें फिल्म की गुणवत्ता से कोई सरोकार नहीं किया।पैसा फेंको, तमाशा देखो उनका मूल मंत्र बन गया।उन्होंने अभूतपूर्व वापसी का ताना-बाना बुना।ऐसी वापसी जिससे वे फिर कभी लौटकर नहीं गए।अमिताभ बच्चन ने सभी बाधाओं को साहस के साथ पार किया।उनका जुझारूपन हर दौर में काम आया।कड़ा परिश्रम और अनुशासन उनके व्यक्तित्व के सार तत्व है। अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन ने बालक अमिताभ को जब नैनीताल के प्रख्यात शेरवुड स्कूल में भेज था, तब धनवान पुत्रों के साथ अमिताभ का परिचय हुआ।अपने स्कूल के दोस्तों की जीवन-शैली को देखकर अमिताभ ने बचपन में ही निश्चय किया था कि जीवन में बहुत सफल और अमीर आदमी बनना है।पैसा कमाने का यह बीज अमिताभ में नैनीताल के शेरवुड स्कूल में पड़ा।धन कमाने की इस ललक का निर्वाह वह आज भी कर रहे हैं। आज अमिताभ बच्चन के लिए यादों की जुगाली के साथ आत्मावलोकन का भी अवसर है और वह स्वयं ही सोच सकते हैं कि उन्होंने क्या खोया और क्या पाया, या बतर्ज अपने पिता की आत्मकथा के पहले भाग की तरह 'क्या भूलूं, क्या याद करूं'। जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ बच्चन साहब।
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#shameonyou. Delhi police दिल्ली पुलिस आपको शर्म आनी चाहिए।
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ऑनलाइन व्यंग्य के रूप में जन्मी और सोशल मीडिया पर गरजने वाले कॉकरोच जमीन पर भी अपनी धमक दिखाएंगे,इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी।लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी की एक आवाज पर हजारों युवा भारतीय, गिग वर्कर,और झुग्गी बस्तियों के लोगों के साथ यूट्यूब इन्फ्लुएंसर और बड़े कॉलेजों के छात्र जुटे।कॉकरोचो के इस उफान में शिक्षा मंत्री उड़ गए।मोदी सरकार को दुर्लभ कदम वापसी पर विवश होना पड़ा।परीक्षा सुधारों में तेजी आई प्रधानमंत्री के साथ सरकार के सभी मंत्री खुद इंस्टाग्राम पर उतर आए। अब फिर कॉकरोच जंतर मंतर पर पहुंच रहे हैं।लोकतंत्र प्रदर्शनों और आंदोलनों में महकता है।शासन के प्रहरे और पुलिस के दमन में लोकतंत्र सिसकता है।आंदोलन से निकलकर सत्ता पर पहुचने वाले भी आंदोलन का अराजक बताते हैं।इसमें नया कुछ भी नहीं है। अंग्रजों ने महात्मा गांधी के आंदोलन को अराजक बताया था, जेपी के संपूर्ण क्रांति को इंदिरा गांधी ने अराजक और देशद्रोह बताया था, अन्ना आंदोलन को यूपीए सरकार ने विदेशी ताक़तों का हाथ बताया था।कोई सरकार प्रश्न पसंद नहीं करती। विपक्ष में रहकर जनता के साथ खड़े रहने वाले सत्ता में आते ही जनता के सामने खड़े हो जाते हैं।दुनियाभर की लोकतांत्रिक सरकारों का चरित्र ऐसा होता है।सिर्फ मरे हुए लोकतंत्र में धरना प्रदर्शन नहीं होते।लोकतंत्र धरना में धड़कता है। एक तंज से बनी पार्टी धरने प्रदर्शन से युवा भारतीयता का प्रतीक बनने की कोशिश कर रही है।आम आदमी पार्टी कॉकरोच पार्टी को साधन, संसाधन और सुविधा उपलब्ध करा रही है। शुरुआती ऐसे ग़ैर राजनीतिक संगठन के यात्रा की तार्किक परिणति राजनैतिक दल के रूप में होती है। युवाओं के समर्थन से सत्ता की राजनीति करने की तैयारी कर रही सोजेपी के कर्ताधर्ता जानते हैं कि वर्ष 2029 तक भारत में जेन जी के 38 करोड़ वोटर होंगे, जो कुल मतदाताओं का एक-चौथाई हिस्सा होगा। कभी छोटा और राजनीति से दूर रहा यह समूह भारत का सबसे बड़ा और शायद सबसे निर्णायक पीढ़ीगत वर्ग बनेगा।सोजेपी की नजर इसी वर्ग पर है।युवाओं के ताक़त की एक झलक तमिलनाडु में दिखी,जहां राजनीति में नए सुपरस्टार बिजय ने युवाओं के दम पर एक मजबूत पारंपरिक दल को सत्ता से बाहर कर सत्ता हथिया ली। आंकड़े और मिसाल दोनों मौजूद हैं।हौसला भी है और राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा होना असंभव नहीं।मगर सैद्धांतिक रूप से मुमकिन चीज़े भारत की उलझी और प्रतिस्पर्धा राजनीति की वास्तविकता के आगे अक्सर दम तोड़ देती हैं।कॉकरोच जनता पार्टी के सर्वेसर्वा संभावना और खतरे, दोनों को समझते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं। देश की राजनीति और आंदोलनों को मैं लंबे समय से देख रहा हूँ। मैंने जन आक्रोश से उठे आंदोलनों को तेजी से उभरते हुए और उतनी ही तेजी से बिखरते देखा है।कुछ आंदोलन टिकाऊ राजनैतिक ताकत भी बने।किसी भी आंदोलन के टिकाऊ राजनैतिक ताकत बनने के लिए जोश के साथ तीन चीजें चाहिए-नेतृत्व,एजेंडा और ऐसा संगठन जो एजेंडे को जनता तक पहुंचाकर असर पैदा कर सके और जन समर्थन जुटा सकें। महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण और अण्णा हजारे का आंदोलन इसलिए सफल हुआ और राजनैतिक ताकत बना क्योंकि उनके पास जन समर्थन था। सीजेपी संस्थाओं की जवाबदेही की बात कर रही है, लेकिन एक मजबूत राजनैतिक दल को इन शिकायतों से आगे बढ़कर भारत की अर्थव्यवस्था का खाका देना होगा। हर साल रोजगार बाजार में आने वाले 1.2 करोड़ युवाओं के लिए नौकरियां कैसे सृजित होंगी? शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच ढांचागत दूरी कैसे मिटेगी? सब प्रश्नों का व्यावहारिक हल बताना होगा। सीजेपी के एजेंडे को उससे ज्यादा धार, गहराई और तालमेल चाहिए जो उसके पास अभी है। उसे पारंपरिक दलों, खासकर कांग्रेस के हाथों अपना एजेंडा छिनने का खतरा भी है। कांग्रेस को अपनी तरफ से उठाए मुद्दों पर बहुत समर्थन नहीं मिला है।साथ ही, सत्तारूढ़ दल की पूरी ताकत भी सीजेपी पर टूटेगी। बहरहाल, युवाओं से संवाद के मोर्चे पर सीजेपी साफ तौर पर आगे है।सीजेपी जेन जी के पसंदीदा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सीधे बात करके वह पारंपरिक दलों के पूरे प्रचार तंत्र को दरकिनार कर रही हैं। भारत का राजनैतिक इतिहास आसानी से उम्मीद नहीं जगाता, लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी की संभावना खत्म भी नहीं करता। यह देखना दिलचस्प होगा कि व्यंग्य से जन्मा और असली जन आक्रोश से ताकत पाया युवा आंदोलन राजनैतिक परिपक्वता का कठिन सफर तय कर सकता है या नहीं।सीजेपी के बढ़ने की मुश्किलें, चाहे जिस रूप में सामने आएं, एक बड़ी तस्वीर दिखाएंगी, भारत दुनिया का सबसे युवा बड़ा देश है। वह युवाओं की राजनैतिक ऊर्जा को सकारात्मक या विनाशकारी रूप में कैसे समेटता है, यह किसी एक चुनाव से कहीं ज्यादा आने वाले दशकों के लोकतंत्र को आकार देगा।
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योगी कैबिनेट ने जेवर एयरपोर्ट का नाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर रखने का फैसला किया है। योगी आदित्यनाथ सरकार को इस फैसले से बचना चाहिए था।मोदी का कद बहुत बड़ा है। मोदी और बीजेपी जिस कांग्रेस को नेहरू,इंदिरा,राजीव गांधी के नाम तमाम योजनाओं का नामकरण करने के लिए घेरते रहे हैं,उस मुहिम को ऐसा फैसला कमजोर करता है। नरेंद्र मोदी अभी देश के प्रधानमंत्री हैं।मोदी के प्रधानमंत्री पद पर रहते ऐसे फैसले से बचना चाहिए था। गुजरात में स्टेडियम का नाम मोदी के नाम पर रखा गया है। अब यूपी में एयरपोर्ट। कुछ दिनो बाद बीजेपीका कोई ओर मुख्यमंत्री किसी योजना का नाम मोदी के नाम रख देगा।शुरुवात ऐसे ही होती है। मोदी की राजनीति को देखते हुए ऐसे फैसले का स्वागत नहीं किया जा सकता है। ऐसे फैसले मोदी की मुहिम को कमजोर करते हैं।
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गुजरात के मुख्यमंत्री और उसके बाद देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी निभाते हुए नरेंद्र मोदी ने 25 साल पूरे कर लिए हैं।ढाई दशक के सार्वजनिक जीवन में रहने के बाद भी लोकप्रियता के शिखर पर बने रहना मोदी की विलक्षण प्रतिभा को दिखाता है। प्रधानमंत्री मोदी पिछले 25 वर्षो से लेकतांत्रिक राजनीति के उस आला दायरे में रहे हैं,जहां बहुत कम नेता पहुंच पाते हैं। कोई संकट कभी मोदी की आभा को भेद नहीं पाया और न ही मोदी ने अपने राजनीतिक जीवन में नुकसान के कोई दिखाई देने वाले निशा छोड़े।लंबे समय से उनका राजनी​तिक ग्राफ गुरूत्वाकर्षण के नियम से बेअसर रहा है,जिसकी जद में अक्सर नेता आ ही जाते हैं। मोदी ने बार बार और भारी मुश्किलों के बावजूद,यह क्षमता दिखाई है कि वे उन झटकों से उबर सकते है,जो छोटे नेताओं को राजनीतिक रूप से खत्म कर देते हैं। यही क्षमता उनकी सबसे बड़ी पूंजी हैं। मोदी ने सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने पर कहा था कि “जिन्होंने मुझे जीत दिलाई,उन्होंने विनम्रता सिखाई; जिन्होंने गिराया, उन्होंने फिर खड़े होना सिखाया, आलोचकों ने अंदर झांकना सिखाया और विरोधियों ने लोकतंत्र की ताकत समझाई”। मोदी को जिस लोकतंत्र ने सबसे बड़ी ताकत दी,वही लोकतंत्र आज मोदी की सबसे बड़ी चुनौती बनकर आया है।अभी मोदी के सामने जो चुनौती है,वह पहले की किसी भी चुनौती से गुणात्मक रूप से अलग हैं। चुनावी,विधायी और शासन के मोर्चो पर भी उतनी ही ​कठिन चुनौतियां कतार में मोदी के सामने खड़ी हैं। मोदी किसी भी बात और घटना को भापने में माहिर हैं। मोदी लगातार सड़क पर हो रहे प्रदर्शन की तपस को भी भाप रहे होंगे। ऐसे आंदोलन को जो किसी राजनीतिक दल के ख़िलाफ़ नहीं,संवैधानिक संस्था के ख़िलाफ़ हो,उसे सिर्फ़ अराजक तत्वों का जमघट कहकर नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता।इस आग में कौन जलेगा और कौन झुलसेगा यह आने वाला समय बताएगा। मोदी परिपक्व नेता हैं।जब मोदी के कट्टर समर्थक जंतर मंतर पर छात्रों के जमघट को अराजक और देशद्रोही कह रहे थे,मोदी ने उसे छात्रों का संघर्ष बताया। मोदी राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं, वह जानते हैं कि कब तक किसको कंधे पर बैठाना है,और कब उतारकर फेक देना है।मोदी चुनाव आयोग की आग अपने दहलीज पर नहीं आने देंगे। मोदी या तो इस आग को बुझा देंगे या आग के केंद्र में रहे व्यक्ति से छुटकारा पा लेंगे। मोदी क्या करेंगे यह देखना बाकी है।
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पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के पौत्र और देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या से आध्यात्म, साधना और गायत्री मंत्र की शक्ति पर एक गहन और दिलचस्प संवाद @MinakshiKandwal के साथ 👇 Gayatri Mantra का रहस्य! | Pandit Shriram Sharma Acharya के अनसुने किस्स... youtu.be/AEOlnXD6UeY?si=Re_e… via @YouTube
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नाना पाटेकर नहीं रहे। नाना पाटेकर ने अपने पूरे जीवन में सीरियल और फिल्मों में अभिनय करके धन से ज़्यादा सम्मान कमाया।कई फ़िल्मों में नाना पाटेकर ने अविस्मरणीय अभिनय किया और बाक़ी बची फ़िल्मों में यादगार अभिनय किया। नाना पाटेकर आमिर और शाहरुख ख़ान की शक्ल- सूरत लेकर पैदा हुए होते,तो सुपर सितारों में शुमार होते।अभिनय में नाना किसी से कम नहीं थे।गोया कि सीरत सूरत से मात खा गई, क्योंकि मनोरंजन उद्योग में चेहरे की लुनाई बिकती है।यह क्षेत्र भी सबसे पुरातन व्यवसाय की तरह है,जहां चेहरा अच्छे ठुमरी गायन पर भारी पड़ता है।यह नाना पाटेकर का आत्मविश्वास और अभिनय कला ही थी जिसके दम पर मनोरंजन उद्योग में चॉकलेटी चेहरों की दुनिया में एक साधारण चेहरे को स्थापित कर दिया। यह कितनी अजीब बात है कि आम आदमी के नायक होने की धुरी पर घूमता यह मनोरंजन उद्योग चिकने-चुपड़े चेहरों पर चलता और फिसलता रहा है। सिनेमा यकीन दिलाने की कला है और शख्सियत का प्रोजेक्शन अत्यंत महत्वपूर्ण है।इसमें कलाकार के हुनर पर सब कुछ निर्भर करता है।नाना पाटेकर हुनरमंद थे। नाना पाटेकर ने सभी भूमिकाओं के साथ न्याय किया।फ़िल्म में उनकी भूमिका कितनी भी छोटी क्यों न हो, नाना पाटेकर ने उस हर भूमिका को जीवंत कर दिया। दर्शक की विचार प्रक्रिया को समझना कठिन है।पता नहीं उसे कब,कौन और किस भूमिका में पसंद आ जाए? शायद उसकी स्मृति के किसी कोमल तार को कोई अदा छू देती है।उसके साथ भावनात्मक तादात्म्य कैसे बनता है? क्या अपने या आस-पड़ोस के जीवन की कोई घटना,अनुभव या अनुभूति की झलक दिखने पर वह जुड़ जाता है? क्या दर्शक जब अपने व्यक्तिगत अस्पष्ट से सपनों की झलक जब परदे पर देखता है तो उससे जुड़ता है? फ़िल्म देखने सिनेमा हॉल जाने वाले दर्शक पैसा वसूल अभिनय और फ़िल्म देखना चाहते हैं।नाना पाटेकर पैसा वसूल अभिनेता थे।नाना पाटेकर अभिनीत कुछ फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल नहीं कर सकी हो, लेकिन नाना पाटेकर का अभिनय हर फ़िल्म में कमाल का रहा है। विवादों में भी नाना पाटेकर रहे।आरोप भी लगे। इन सब से विचलित हुए बिना नाना पाटेकर समाज में अपनी भूमिका निभाते रहे।किसानों की मदत करते रहे।असाधारण प्रतिभा के धनी रहे लेकिन साधारण जीवन जीते रहे।अहंकार नाना पाटेकर के पास फटक नहीं सका। भावपूर्ण श्रद्धांजलि
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से गठबंधन में 200 सीटें मांग रही कांग्रेस ने एमएलसी चुनाव में समाजवादी पार्टी के सामने दयनीय समर्पण कर दिया है। कांग्रेस ने सपा से एमएलसी चुनाव में 11 सीटों में से कुछ सीटें कांग्रेस को देने का आग्रह किया था और ना देने पर अकेले लड़ने की धमकी भी दी थी।ना सपा ने सीट छोड़ी और ना कांग्रेस लड़ने की हिम्मत जुटा सकी और अंतिम समय में एक साल जमीन पर काम कर रहे नेताओं को कांग्रेस ने बीच मझधार छोड़ दिया। कांग्रेस ने एमएलसी चुनाव के लिए पिछले साल 8 प्रत्याशी घोषित किए थे।इनमें मेरठ-सहारनपुर स्नातक सीट से विक्रांत वशिष्ठ, आगरा स्नातक सीट से रघुराज सिंह पाल, लखनऊ स्नातक सीट से डॉ स्मिता मिश्रा, वाराणसी शिक्षक सीट से संजय राय प्रियदर्शी और वाराणसी स्नातक सीट से अरविंद सिंह पटेल शामिल थे।इसके अलावा गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से देव भास्कर तिवारी, प्रयागराज-झांसी स्नातक सीट से अजय कुमार सिंह और आगरा वित्तविहीन शिक्षक सीट से आकाश अग्रवाल के नाम थे। कांग्रेस ने इन प्रत्याशियों को ज्यादा से ज्यादा वोटर बनाने का टारगेट दिया था।कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों से कहा था कि सपा के साथ गठबंधन ना होने पर अकेले लड़ेंगे और सपा को सबक सिखाएँगे।कार्यकर्ता और नेता जमीन पर काम करते रहे,एक साल तक घूम-घूमकर वोटर बनाते रहे,कांग्रेस का झंडा बुलंद करते रहें,लेकिन 2 अक्टूबर को आराधना मिश्रा ‘मोना’ के नया प्रदेश अध्यक्ष बनते ही नामांकन के दिन कांग्रेस ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। कांग्रेस के एमएलसी चुनाव लड़ने की एक साल से तैयारी कर रहे नेताओं ने कहा कि पार्टी अगर खुद चुनाव नहीं लड़ना चाहती, तो कम से कम हमारा समर्थन कर दे। हम ख़ुद लड़ लेंगे, लेकिन कांग्रेस उसके लिए भी हिम्मत नहीं जुटा सकी। एमएलसी चुनाव में 5 स्नातक और 6 शिक्षक कोटे की सीटें हैं।इसमें ग्रेजुएट और शिक्षक ही वोटर होते हैं।इसमें बढ़त लेने वाले दल को विधानसभा चुनाव से पहले अपना मनोबल बढ़ाने का मौका मिलता और प्रदेश की सियासी हवा का रूख भी साफ होता है और जनता का मिजाज भी पता चलता है। यूपी विधानसभा चुनाव से पहले एमएलसी की 11 सीटों पर हो रहे चुनाव को सभी दलों के लिए लिटमस टेस्ट माना जा सकता है। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश नहीं करना चाहता है।इमरान मसूद जैसे बड़बोले नेताओं के दम पर कांग्रेस यूपी में समाजवादी पार्टी को आखें दिखा रही है और अपने दम पर चुनाव लड़ने का दम भर रही है। जो पार्टी यूपी एमएलसी चुनाव में एक उम्मीदवार नहीं उतार पाई, वह पार्टी यूपी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से 200 सीटें मिलने का सपना देख रही है। ग़ज़ब है कांग्रेस।
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सत्ता के पास सब कुछ होता है।सत्ता सम्पन्न होती है। सत्ता अपने को बचाने के लिए सरकारी तंत्र को राजनीति के मैदान में उतारती रही है।खाकी वर्दी खादी की शक्ति का दृश्य रूप होती है। जिसके पास सत्ता होती है, शक्ति भी उसी में निहित होती है। विपक्ष के पास निडरता की ताक़त होती हैं।कार्यकर्ताओं का बल होता है।नेता कितने वोट ले सकता है,यह चुनाव बताता है; नेता कितने भय को पार कर सकता है, यह संकट बताता है। विपक्ष को कभी अनुकूल परिस्थिति नहीं मिलती। विपक्ष की परीक्षा प्रतिकूल परिस्थिति में होती है। लोकतंत्र का पहला अनुभव सड़क पर होता है।सड़क की लड़ाई ही संसद का मार्ग प्रशस्त करती है।इसीलिए राजनीति में सड़क जरूरी है।सड़क का अर्थ हिंसा कदापि नहीं है।अराजकता नहीं है।सड़क लोकतंत्र का बाहरी सदन है।जनता की आवाज का पहला मंच है। सरकार के संयम और विपक्ष के साहस की लड़ाई सड़क पर ही होती है।
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कैंची धाम पर उमड़ी भारी भीड़ ने पहाड़ों की क्षमता को फिर देश के सामने खड़ा कर दिया। स्थानीय लोग घंटों जाम और अव्यवस्था में फंसे रहे और बेहाल होते रहे। इसी बीच फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री के “धर्म टैक्स लगाओ” की माँग ने सुर्खियां बटोरीं और पत्रकार मीनाक्षी कंडवाल के साथ एक बेहद शानदार, बेबाक और विस्फोटक बातचीत में धर्म के नाम पर आडंबर, दिखावे और धार्मिक पर्यटन की परतें एक-एक करके खुलती गईं। बातचीत कई असहज लेकिन जरूरी सवाल छोड़ती है। @MinakshiKandwal 👇👌 Vivek Agnihotri EXCLUSIVE: 'धर्म टैक्स' क्यों चाहते हैं विवेक अग्निहोत्र... youtu.be/kED2QLQzfLc?si=02an… via @YouTube
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कल मंगलवार को पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर, तमिलनाडु की मदुरंतकम और धारापुरम और पुडुचेरी की थट्टनचावडी विधानसभा सीटों पर और असम के नगांव सीट पर लोकसभा उपचुनाव का मतदान हुआ है। इन उप चुनावों से किसी भी राज्य सरकार पर हार या जीत से कोई फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन परिणामों में कई संदेश सत्ता पक्ष और विपक्ष के लिए होंगे। सबसे दिलचस्प चुनाव बंगाल की दो विधानसभा सीटों नंदीग्राम और रेजीनगर में है।बंगाल में 15 साल में पहली बार ऐसा चुनाव हुआ है, जब ममता बनर्जी राज्य में न तो सीएम हैं, न ही विधायक और न चुनाव में उनका उम्मीदवार केंद्र में है। नंदीग्राम सीट की बात करें तो बीजेपी की जीत तय है। सीएम सुवेंदु अधिकारी का निजी गढ़ है।इसी नंदीग्राम ने 2007 के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने ममता बनर्जी और टीएमसी को 2011 में सत्ता तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। 2026 के विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम के साथ भवानीपुर सीट से भी चुनाव लड़ा और दोनों जगह जीत दर्ज की।मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने दोनों सीट पर जीत के बाद भवानीपुर सीट रखी थी, इसलिए नंदीग्राम में उपचुनाव हुआ है। ममता के प्रत्याशी संचिता प्रधान के पीछे हटने के बाद अब इस सीट पर कांग्रेस बनाम बीजेपी है। बंगाल की दूसरी सीट रेजीनगर में बीजेपी,कांग्रेस,टीएमसी के दोनों धड़ों,सीपीआई (एम) और हुमायूं कबीर की पार्टी जनता उन्नयन पार्टी मैदान में हैं।रेजीनगर मुस्लिम बहुल सीट है।बीजेपी के शंकराव सरकार को छोड़कर सभी प्रमुख उम्मीदवार मुस्लिम हैं। कांग्रेस से मोहम्मद अब्दुल्लाहिल काफी, टीएमसी से रबीउल आलम चौधरी और हुमायूं कबीर की पार्टी जनता उन्नयन पार्टी से हुमायूं कबीर के बेटे गोलाम नबी आजाद चुनाव लड़ रहे हैं।इस सीट पर ममता को कुछ उम्मीद है। तमिलनाडु के दो सीट के उपचुनाव की बात करे तो यहाँ सीएम विजय की पार्टी जीतती दिख रही है। तमिलनाडु में एआईएडीएमके की विधायक के. मरगथम कुमारवेल ने मदुरांतकम सीट से और पी. सत्यबामा ने धारापुरम सीट से विधायक पद से इस्तीफा देकर दोनों ने टीवीके जॉइन कर ली थी, इसलिए यहाँ चुनाव हुआ है। उपचुनाव टीवीके और डीएमके के बीच है। दिलचस्प बात ये है कि सरकार में विजय को सपोर्ट कर रहीं लेफ्ट पार्टियों सीपीआई और सीपीएम ने दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। 1952 से 2026 तक दोनों सीटों पर 16 बार विधानसभा चुनाव हुए हैं। एआईएडीएमके 6 और डीएमके 5 बार जीती। 2026 में पहली बार चुनाव में उतरी विजय की टीवीके एकतरफा लहर के बावजूद यहां हार गई थी।अब यह दोनों सीट विजय की टीवीके जीत सकती है। पुडुचेरी की सीट थट्टनचावडी पुडुचेरी में मुख्यमंत्री एन. रंगासामी की पार्टी जीत रही है। पुडुचेरी में मुख्यमंत्री एन. रंगासामी ने दो सीटों से चुनाव जीता था। उन्होंने मंगलम सीट अपने पास रखकर थट्टनचावडी से इस्तीफा दे दिया।थट्टांचावडी में रंगासामी 1991 से लगातार जीतते रहे हैं। अब उनकी जगह पूर्व विधायक अशोक आनंद चुनाव लड़ रहे हैं।यहाँ से पुडुचेरी में मुख्यमंत्री एन. रंगासामी की पार्टी ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस का जीतना तय है।पुडुचेरी में ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस,बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा है। एकमात्र लोकसभा सीट जहाँ उप चुनाव हुआ है वह असम की नागांव सीट है।असम में नागांव लोकसभा सीट से कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने लोकसभा से इस्तीफा देकर बीजेपी से असम विधानसभा चुनाव लड़ा था,इस कारण इस सीट पर लोकसभा का उप चुनाव हुआ है। प्रद्युत फिलहाल दिसपुर सीट से विधायक हैं। 2019 और 2024 में इस सीट से कांग्रेस के प्रद्युत बोरदोलोई सांसद चुने गए थे। मार्च 2026 में उन्होंने बीजेपी जॉइन कर ली और लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।इस कारण नागांव सीट पर चुनाव हुआ है। नागांव सीट कांग्रेस का गढ़ रही है।1951 से 1998 तक इस सीट पर कांग्रेस का एकछत्र राज रहा है।1999 से 2014 तक बीजेपी जीती।2019 और 2024 में फिर कांग्रेस आई।इस उप चुनाव में यह सीट बीजेपी और कांग्रेस के लिए नाक का सवाल है। इस बार बीजेपी ने पूर्व आईएएस अधिकारी देबाशीष शर्मा को टिकट दिया है।अगर कांग्रेस और एआईयूडीएफ में वोट बंटते हैं, तो बीजेपी जीत सकती है।धुबरी के पूर्व सांसद और एआईयूडीएफ सुप्रीमो बदरुद्दीन अजमल नागांव से चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस उप चुनाव में नागांव सीट गवा सकती हैं। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम बीजेपी जीत रही हैं और रेजीनगर में कड़ी चुनौती है। तमिलनाडु की मदुरंतकम और धारापुरम सीएम विजय की पार्टी जीत रही हैं। पुडुचेरी की थट्टनचावडी सीट पुडुचेरी में मुख्यमंत्री एन. रंगासामी की पार्टी ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस जीत रही है और और असम के नगांव सीट पर बीजेपी का पलड़ा भारी है। चुनाव परिणाम 9 अक्टूबर को घोषित किए जाएंगे।
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भाजपा ने यूपी से राज्यसभा के लिए सारे घर के बदल डाले। भाजपा ने 2020 में दलित वर्ग से ब्रजलाल, ब्राह्मण समाज से सीमा द्विवेदी, ठाकुर समाज से नीरज शेखर और अरुण सिंह, शाक्य समाज से गीता शाक्य और लोधी समाज से बीएल वर्मा को राज्यसभा भेजा था, लेकिन 2022 के विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि ये नेता अपने क्षेत्र और समाज में पार्टी की उम्मीद पर खरे नहीं उतरे, इसलिए बीजेपी नेतृत्व ने पिछले चुनावों का आकलन और 2027 के चुनाव को ध्यान में रखकर नए चेहरों को मौका देने का निर्णय किया। ध्यान देने वाली बात यह है कि सभी सामान्य कार्यकर्ता और मूल कैडर से निकले है।पार्टी ने तय किया है कि 9वां प्रत्याशी नोटों की दम पर नहीं,संगठन के दम पर चुनाव लड़ेगा,इसलिए किसी पूँजीपति को टिकट नहीं। सबसे खास बात यह है कि सभी टिकट योगी, मोदी और संघ के सहमति से दिए गए हैं।कोई भी विवादित नाम नहीं।किसी पर उंगली उठाने का मौका नहीं दिया।सभी जातियों को साधने की कोशिश।किसी गुट और किसी व्यक्ति विशेष का टिकट बटवारे में दबाव नहीं। दलितों को ध्यान में रखकर 2020 की तुलना में एक दलित प्रत्याशी बढ़ाया है।इनमें भी पासी और खटिक समाज,जो भाजपा का वोट बैंक माना जाता है,उन्हें ही मौका दिया है।प्रियंका रावत (पासी)और विद्या सागर सोनकर (खटिक) राज्यसभा भेजे गए। पिछड़े वर्ग में कुर्मी,पाल (गड़रिया) और लोधी समाज को भाजपा का वोटबैंक माना जाता है।इन तीनों जातियों से आने वाले धर्मपाल लोध है, प्रकाश पाल पाल समाज से हैं और श्रुति गंगवार कुर्मी हैं और संतोष गंगवार की बेटी है भेजे गए। ब्राह्मणों की नाराजगी को ध्यान में रखते हुए ब्राह्मणों की संख्या 2 बरकरार रखी है।राधा कृष्ण ओझा और गोपी कृष्ण पांडेय ब्राह्मण राज्यसभा भेजे गए।विधान परिषद चुनाव में भी भाजपा ने 11 सीटों में 5 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं। भाजपा ने राज्यसभा चुनाव में ठाकुर प्रतिनिधियों की संख्या दो से घटाकर एक कर दी है।पहले अरुण सिंह और नीरज शेखर ठाकुर समाज से राज्यसभा सदस्य थे। इस बार केवल राम प्रताप सिंह चौहान को टिकट दिया गया है।बीजेपी शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि योगी अकेले ठाकुर ही सब पर भारी हैं। लोध समाज आने वाले और राज्यसभा भेजे गए यूपी के पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह मोदी सरकार में बीएल वर्मा का स्थान ले सकते है।हालांकि धर्मपाल सिंह की उम्र 73 साल है। यूपी भाजपा के प्रदेश महामंत्री और पश्चिमी यूपी के प्रभारी बनाए गए राम प्रताप सिंह चौहान को ब्रज क्षेत्र में ठाकुर समाज को संदेश देने के लिए राज्यसभा भेजा है। यूपी बीजेपी राज्यसभा सूची में एक बाद यह भी खास है कि सभी स्थानीय नेताओं को जगह दी गई, कोई बाहरी नहीं।कोई दूसरे दल से आया हुआ भी नहीं है। संदेश साफ़ है कि एक बार राज्यसभा भेजा तो दूसरी बार मिलेगा तय नहीं है।कोई अपवाद ही तीसरी बार,अन्यथा हरगिज नहीं।नीरज शेखर को साफ़ संदेश है पिता का नाम और ठाकुर का तमगा अब काम नहीं आएगा।हरदीप पुरी को भी संदेश है कि पंजाब चुनाव के लिए और विकल्प है,आप आराम करें। हरीश द्विवेदी और स्मृति ईरानी को भी संदेश दे दिया है कि संगठन में परफॉर्म करो,आगे देखा जाएगा। कुल मिलाकर योगी की सलाह, संघ का मार्गदर्शन और मोदी का अंतिम फैसला राज्यसभा की सूची में दिख रहा है।
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बीजेपी की राष्ट्रीय महामंत्री स्मृति ईरानी और हरीश द्विवेदी क्यो राज्यसभा नहीं जाएंगे, इस पर चार दिन पहले विस्तार से लिखा था। अब यह भी साफ़ कर देता हूँ कि यह दोनों नेता 2029 का लोकसभा चुनाव लड़ेंगे, तब तक राज्यसभा नहीं जाएँगे।
स्मृति ईरानी और हरीश द्विवेदी को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा भेजे जाने की ख़ूब चर्चा हो रही है,इसका प्रमुख कारण इन दोनों नेताओं का राष्ट्रीय अध्यक्ष की टीम में राष्ट्रीय महामंत्री बनना है।दोनों नेताओं को महत्वपूर्ण राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी गई है। स्मृति ईरानी को हरियाणा और छत्तीसगढ़ राज्य का प्रभारी और हरीश द्विवेदी को कर्नाटक और बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य का प्रभारी बनाया गया है।दोनों नेता 2024 का लोकसभा चुनाव हारे थे। क्या स्मृति ईरानी और हरीश द्विवेदी राष्ट्रीय महामंत्री बन गए हैं इसलिए राज्यसभा भेजा ही जाता है? ऐसा नहीं है।बीजेपी में ऐसे कई प्रभावशाली महामंत्री रहे हैं जिन्हें पार्टी ने राज्यसभा नहीं भेजा और कई महामंत्री बहुत इंतिज़ार के बाद राज्यसभा भेजे गए। राम माधव पाँच साल से ज़्यादा अमित शाह की टीम में राष्ट्रीय महामंत्री थे,राज्यसभा नहीं गए।कैलाश विजयवर्गीय अमित शाह के करीबी राष्ट्रीय महासचिव थे,लेकिन कैलाश विजयवर्गीय को भी राज्यसभा नहीं भेजा।सुनील बंसल लंबे समय से राष्ट्रीय महामंत्री है अभी तक राज्यसभा नहीं पहुंचे।मुरलीधर राव भी महामंत्री बने थे, लेकिन राज्यसभा नहीं पहुंचे। छत्तीसगढ़ की नेता सरोज पांडेय अमित शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते 2014 में राष्ट्रीय महामंत्री बनी थीं,लेकिन भाजपा ने सरोज पांडे को 2018 में राज्यसभा भेजा था।महामंत्री बनने के चार साल बाद। अभी यूपी के प्रभारी बनाए गए विनोद तावड़े 2020 में नड्डा जी की टीम में महामंत्री बन गए थे, लेकिन राज्यसभा 6 साल बाद 2026 में भेजे गए।गुजरात के प्रभारी बनाए गए तरुण चुघ पाँच साल से ज़्यादा महामंत्री रहने के बाद 2026 में राज्यसभा भेजे गए। अरुण सिंह पाँच साल से ज़्यादा महामंत्री रहने के बाद दिसंबर 2019 में राज्यसभा भेजे गए थे। अमित शाह ख़ुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साढ़े तीन साल बाद 2017 में राज्यसभा पहुंचे थे। ऐसे में स्मृति ईरानी और हरीश द्विवेदी का राष्ट्रीय महामंत्री बनते ही राज्यसभा जाना तय मानना सही नहीं है।स्मृति ईरानी और हरीश द्विवेदी पार्टी के लिए इतने ही अहम नेता होते तो पार्टी लोकसभा चुनाव हारने के तुरंत बाद राज्यसभा भेज देती।ढाई साल इंतिज़ार नहीं कराती। यह भी हो सकता है कि पार्टी 2029 के लोकसभा चुनाव तक राज्यसभा ना भेजे और फिर सीधे लोकसभा में उतारे। सिर्फ़ राष्ट्रीय महामंत्री बन गए हैं, इसलिए राज्यसभा जाएँगे यह पूरा सत्य नहीं है। पार्टी राष्ट्रीय महासचिव बनने के तुरंत बाद स्मृति ईरानी और हरीश द्विवेदी को यूपी से राज्यसभा भेजती हैं तो उसके कई अन्य कारण भी होंगे, सिर्फ़ राष्ट्रीय महामंत्री बनना एक कारण नहीं हो सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा-अगर कोई प्रक्रिया लाखों भारतीय नागरिकों को उनके वोटिंग के अधिकार से रोकती है और अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाती है, तो यह मनमानी है। भारतीय नागरिकों को बड़े पैमाने पर वोटिंग से रोकने वाली कोई भी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और 14 का उल्लंघन होगी। ऐसी प्रक्रिया संविधान की बुनियाद पर चोट करती है।यह संवैधानिक व्यवस्था को नकारने के बराबर है।कोई भी संस्था या प्राधिकरण ऐसा नहीं कर सकता, कोई भी अदालत इसे माफ नहीं कर सकती। कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है। भारत के सर्वोच्च अदालत के वरिष्ठ न्यायाधीश की चुनाव आयोग पर यह टिप्पणी सामान्य नहीं,अभूतपूर्व और असाधारण है। यह टिप्पणी उस चुनाव आयोग पर है,जिसे कभी दुनिया में इस बात के सबूत के तौर पर पेश किया जाता था कि दुनिया का सबसे बड़ा और अक्सर बेहद उलझा हुआ लोकतंत्र भी ऐसी निष्पक्षता से स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव करा सकता है,जो कई पुराने लोकतंत्रों को शर्मिंदा कर दे। दुनिया में तमाम देशों में जब लोकतंत्र पर आस्था कमजोर हो रही थी,तब से भारत का चुनाव आयोग भारत में निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने और भारत के लोगों के वोट की हिफाजत करने के मामले में दुनिया के लिए मिसाल बनकर उभरा था। जिस देश में नेताओं और राजनीतिक दलों को तिकड़मी,चालबाज और धोखबाज माना जाता रहा हो,उस भारत देश में चुनाव आयोग एक निष्पक्ष अंपायर की भरोसा दिलाने वाली साख थी।अब यही साख तार तार हो गई है।चुनाव आयोग से आम जनता के उठ रहे भरोसे को सिर्फ विपक्ष का शोर बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता ने 23 सितंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की नियुक्ति पर बोलते हुए साफ़ कहा था कि चुनाव आयोग का केवल स्वतंत्र होना काफी नहीं है,उसका स्वतंत्र दिखना भी जरूरी है।यह आयोग के कामकाज की बुनियादी शर्त है। मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण चुनाव आयोग की सबसे बड़ी परीक्षा बनकर आया है। कानूनी चुनौतियों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने एसआइआर को मंजूरी दी,लेकिन कानूनी मंजूरी और जनता का भरोसा दो अलग बातें हैं। एसआइआर में 31 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की शुरुआती मसौदा सूचियों से 13.39 करोड़ नाम बाहर हो गए, यह देश के करीब 100 करोड़ मतदाताओं का 13 फीसद है।आसान तरीके से कहे तो लगभग उत्तर प्रदेश की पूरी मतदाता आबादी के बराबर लोग मतदान से वंचित हो गए।बहुत-से नाम हटने की वाजिब वजहें हैं, मौत या लोगों का दूसरी जगह जाने से भी नाम कटे हैं। भारत के मतदाताओं का भरोसा और विश्वास चुनाव आयोग की सबसे बड़ी पूंजी है।इस भरोसे और विश्वास को बनाने में चुनाव आयोग को दशकों लगे,लेकिन यह जितनी तेजी से मिट रहा है और चुनाव आयोग की छवि तार तार हो रही है,उससे किसी को भी सहज नहीं होना चाहिए। चुनाव आयोग ने चुनी हुई चुप्पी ओढ़ ली है।यह चुप्पी ख़तरनाक है।चुनाव आयोग का चुप रहना और सभी आरोपों का माकूल जवाब ना देना आम लोगों में भारी चिंता पैदा कर रहा है। चुनाव आयोग पर लग रहे आरोप सही हैं या नहीं,यह अलग सवाल है।संस्थागत लिहाज से अहम यह है कि आरोपों का चुनाव आयोग उनका ठोस जवाब नहीं दे पा रहा। भारत का लोकतंत्र अपने सबसे कठिन परीक्षा के दौर से गुज़र रहा है।
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परगट सिंह के पंजाब प्रदेश अध्यक्ष बनने की इनसाइड स्टोरी ——- पंजाब कांग्रेस में प्रदेश प्रधान के पद पर विजयइंदर सिंगला का नाम तय था,लेकिन 2 अक्टूबर को अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने इस्तीफा सौंपने के बाद राहुल गांधी से दिल्ली में व्यक्तिगत मुलाकात में विजय सिंगला के नाम का जमकर विरोध किया। वड़िंग ने राहुल गांधी के सामने तर्क रखा विजयइंदर सिंगला सीधे तौर पर चन्नी खेमे से जुड़े हुए हैं।अगर सिंगला को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता है, तो पंजाब कांग्रेस पर पूरी तरह से चन्नी गुट का दबदबा कायम हो जाएगा।इससे पार्टी के बाकी सभी धड़े अलग-थलग पड़ जाएंगे और चुनाव से पहले संगठन में असंतोष की नई लहर उठ खड़ी होगी। राजा वड़िंग ने राहुल गांधी से यह भी कहा कि हिंदू चेहरे को कमान सौंपने पर जट्‌ट सिख वोटर नाराज हो जाएंगे।विजयइंदर सिंगला हिंदू वोट दिला नहीं पाएंगे और जट्‌ट सिख वोटर दूर हो जाएंगे।नुक़सान दोहरा होगा।राजा वड़िंग ने राहुल गांधी को स्पष्ट कह दिया कि पंजाब में जट्‌ट सिख मुखिया होने पर ही जीत मिल सकती है। राजा वड़िंग ने राहुल गांधी को यह भी बताया कि पूर्व प्रभारी भूपेश बघेल के साथ जब हर बूथ मजबूत कार्यक्रम शुरू किया तो विजयइंदर सिंगला के क्षेत्र संगरूर में ही सबसे पहले चन्नी के समर्थन में नारे लगे।वहीं से मेरा व भूपेश बघेल का विरोध शुरू हुआ और यह सब सिंगला ने चन्नी के कहने पर किया। राजा वड़िंग ने राहुल गांधी के सामने विजयइंदर सिंगला की जगह परगट सिंह को अध्यक्ष बनाने की सलाह दी। राजा वड़िंग की विजयइंदर सिंगला को अध्यक्ष बनाने पर आपत्ति के बाद राहुल गांधी ने सचिन पायलट से बात की,सचिन पायलट ने चन्नी के अलावा राजस्थान के प्रभारी और चन्नी गुट के नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा से बात की।परगट सिंह के नाम पर सहमति बनने के बाद दिल्ली में अंतिम समय में विजयइंदर सिंगला की जगह परगट सिंह को अध्यक्ष बनाया गया। पार्टी को भी लगा कि चुनाव से ठीक पहले एक हिंदू चेहरे को कमान सौंपने से सिख वोट बैंक में गलत संदेश जा सकता है। पंजाब के सामाजिक ताने-बाने को ध्यान में रखते हुए पार्टी अंततः जट्ट सिख चेहरे परगट सिंह पर ही दांव खेलने को मजबूर हुई और आख़िरकार कांग्रेस ने जालंधर कैंट से विधायक परगट सिंह को कांग्रेस सूबा प्रधान बनाकर जट्टसिख की पॉलिटिक्स को बरकरार रखना तय किया। प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने वाले अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग मालवा बेल्ट से आते हैं।इससे पहले प्रताप सिंह बाजवा माझा बेल्ट से आते थे और अध्यक्ष थे।मालवा और माझा बेल्ट से कांग्रेस में पैदा हो रही गुटबाजी को खत्म करने के लिए कांग्रेस ने दोबाआ क्षेत्र से आने वाले परगट सिंह को अध्यक्ष बनाया। परगट सिंह की नियुक्ति को कांग्रेस हाईकमान राजा वड़िंग, चरणजीत सिंह चन्नी, प्रताप सिंह बाजवा और अन्य धड़ों के बीच संतुलन बनाने वाले चेहरे के रूप में देख रहा है। कांग्रेस ने 16 साल बाद दोआबा क्षेत्र से पार्टी प्रधान बनाया है। इससे पहले 2010 में मोहिंद्र केपी पंजाब प्रदेश अध्यक्ष बने थे। परगट सिंह को सूबा प्रधान बनाने के पीछे एक बड़ा कारण दोआबा में बढ़ रहे बीजेपी के प्रभाव को कम करना भी है। 2 दिन पहले ही जालंधर के ही कैंट हलके के परागपुर में गृह मंत्री अमित शाह रैली कर गए हैं। इससे पहले पीएम मोदी भी 2 बार जालंधर का दौरा कर चुके हैं। दोआबा की 23 सीटों को सभी पार्टियां अपने ट्रंप कार्ड के रूप में देख रही हैं। भाजपा यहां पर जनवरी 2026 से ही बढ़त बनाकर चल रही है। चाहे पीएम नरेंद्र मोदी के डेरा बल्लां आने की बात हो, चाहे आदमपुर एयरपोर्ट का नाम श्री गुरु रविदास महाराज के नाम पर रखने का हो, बीजेपी दोआबा में फ्रंटफुट पर खेल रही थी। परगट सिंह जट्ट सिख समुदाय से हैं। राजा वड़िंग भी इसी समुदाय से थे, इसलिए सामाजिक समीकरण के स्तर पर कांग्रेस ने बहुत बड़ा बदलाव नहीं किया। हाईकमान ने समुदाय बदलने के बजाय संगठन मजबूत करने पर ज्यादा फोकस किया है। परगट सिंह को मालवा क्षेत्र, शहरी हिंदू वोटर्स, दलित समुदाय और माझा क्षेत्र के नेताओं को साथ लेकर चलना होगा। केवल दोआबा या जट्ट सिख चेहरे पर निर्भर रहना 2027 में काफी नहीं होगा।
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आज गांधी जयंती हैं। गांधी को देखने का सबका अपना अपना नजरिया है। मेरी नजर में महात्मा गांधी सच्चे सनातनी हिंदू थें। महात्मा गांधी से ज्यादा हिंदू धर्म को समझने वाला और उसकी सटीक व्याख्या करने वाला कोई दूसरा नहीं हुआ। हिंदू धर्म का मर्म गांधी ने समझा था इसलिए गांधी बेहद धार्मिक व्यक्ति थें और गांधी के जीवन में धर्म हमेशा केन्द्र में रहा।गांधी का समस्त,चिंतन,नीतिया, जीवनशैली धर्म आधारित थे और यह उनके दिनचर्या में दिखता था।गांधी का धर्म सभी धर्मो को जगह देनें के बाद भी अपने आधार रूप मे एक सनातनी हिंदू का धर्म था। गांधी के जीवन में, राजनीति में और जीवन के हर क्षण में धर्म प्रच्छन्न था। गांधी के जीवन मे धर्म विहीन कुछ नहीं था। गांधी का यह धर्म पूरी तरह ईश्वर,आध्यात्मिकता, आत्मा और नैतिकता से परिपूर्ण था। गांधी के आरम्भिक संस्कार जैन धर्म के पांच सूत्र अहिंसा, अस्तेय, सत्य, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य से बने थे। गांधी के जीवन में ईश्वर और आत्मा का महत्व था, इसलिए गांधी की प्रार्थना में, भाषणों में, ईश्वर और आत्मा हमेशा उपस्थित रहते थें।गांधी की वेशभूषा और आचरण मे एक संत की छवि थी।गांधी का धर्म वैश्विक था,जिसमें दुनिया के किसी भी धर्म की भाषा समाहित हो सकती थी।'सत्य','अहिंसा' उनके धर्म के दो चक्र थे। गांधी के जीवन को देखकर आश्चर्य होता है कि कैसी निष्कलुष चेतना रही होगी, जो इतने झंझावातों के बावजूद डिगी नहीं।ना कभी झूठ बोला,ना कभी हिंसा का मार्ग सुझाया,छले जाकर भी मन में द्वेष नहीं आने दिया,धोखा खाकर भी भरोसा नहीं गँवाया,गाली सुनकर भी मन में क्रोध नहीं जगा,किसी को अपमानित करने की भावना नहीं आई,आत्मा में कुछ अवरुद्ध नहीं हुआ।उलटे उन्होंने यही सोचा कि मुझमें ही कोई दोष रहा होगा,जो मैं देश को समझा नहीं सका। यह महात्मा गांधी का व्यक्तित्व ही था कि तमाम मतभेदों के बाद भी कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उन्हें महात्मा कहा,नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें राष्ट्रपिता कहा,हिन्दुस्तान ने उन्हें प्यार से बापू कहा, विस्टन चर्चिल ने उन्हें नंगा फकीर कहा।नेल्सन मंडेला,मार्टिन लूथर किंग जैसी विभूतियों ने उन्हें अंहिसा का पूजारी कहा। गांधी बेजोड़ थे।उनके जैसे लोग भारत में क्या, सारे संसार में दुर्लभ होते हैं।कई सदियां कीचड़ में डूब जाती हैं, तब गांधी जैसा महात्मा जन्म लेता हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन ने सच ही लिखा था कि 'भावी पीढ़ियों को विश्वास ही नहीं होगा कि इस धरती पर हाड़ मांस का कोई गांधी कभी जन्मा भी था। महात्मा गांधी के जन्म जयंती पर शत शत नमन 🙏
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