विचरण मन का आचरण तन का....... कल हों न हों. श्रीकृष्ण!राधे-राधे! विज्ञान और दर्शन!! भावनाओं का पथिक-

विलीन- अल्मोडा उत्तराखण्ड
Joined January 2017
बह चली बयार लुट न जाये सिंगार उड़ा न ले कहीं बेताब वो तैयार बांध लो आंचल कहीं छूट न जाये शीशे की दीवार चलना हुआ दुश्वार संभलना जरा गिरे हो हर बार थाम लो जिगर कहीं टूट न जाय हर गली में तैयार बैठे हैं चितचोर बिखरे हैं इधर तार-तार बेजार बेदर्द जमाना है यह कहीं लूट न जाय...
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कविता एक नदी है उसे बहने दीजिए धीमे से गुनगुनाए तो कहने दीजिए लहरें जो उठती हैं तो तरंगें मचलती हैं बहाव उसकी गति का ही चलने दीजिए न रोकिए न टोकिए मन को उतरने दीजिए.... #kavyakshra🖊️
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!! एक शाम सिर्फ़ तिरे नाम !! तेरे ही इंतज़ार में सँवर गई हूँ आज मैं,चराग़ की तरह सनम निखर गई हूँ आज मैं, लपेटे जामुनी ये रेशमी हसीं लिबास को, हया की ओट में ज़रा ठहर गई हूँ आज मैं..!! #Khusboosingh #ख़ुशबू_सिंह 1/5
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!! तेरे नाम का दीया !! जलता है जो दीप हाथ में, मांगूँ तुझको हर इक बात में, आ भी जा अब इस रात में, भीगें प्यार की बरसात में..!! सीने पर ये हाथ धरा है, दिल में तेरा प्यार भरा है, इश्क़ मेरा अनमोल खरा है, तुझसे ही हर ख़्वाब हरा है..!! #Khusboosingh #ख़ुशबू_सिंह 1/3
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12 शब्द कविता ! शीर्षक: रिश्ते एक कविता, केवल 12 शब्दों में लिखिए और हैशटैग #12शब्द_कविता लगाकर, 21.10.26 तक पोस्ट करिए। एक हैंडल से एक से अधिक कविता लिखी जा सकती है ! 10 सर्वश्रेष्ठ कविताओं में से एक लकी कवि को एक पुरस्कार दिया जाएगा ! 🎁
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!! तुम्हारे इंतज़ार में !! देखो ना, आज मैंने खुद को कैसे सजाया है, तुम्हारी पसंद का ये पीला रंग अंग पे चढ़ाया है..!! साड़ी के इन फूलों में, मेरी चाहत की महक है, और इन आँखों में, सिर्फ तुम्हें देखने की चहक है..!! 1/4
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रूबाई - तेरे हाथों..... में जो..... हाथ आए, दिल को फिर कोई डर नहीं सताए, तू जो हो.... राहों में..... मेरी यूँ ही, उल्फ़त मेरी.......ज़िंदगी हो जाए। #अशोक_मसरूफ़ PIC Credit-pinterest
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#छोटा_दरवाज़ा रवि के प्रथम स्पर्श से कमलिनी खिली हर्ष से मंद मंद दिखी मुस्कान सौंदर्य ने समेटी जहान! किंतु न कर सकी इनकार रुनझुन सुरमई सांझ की मधुर मधुर झंकार से भी हुई सुंदरता म्लान !! 🦋 ~ डाॅ. भारती बिंदु जी चित्र साभार : Pinterest
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Every morning is a beautiful morning. — Terri Guillemets
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I would love to live like a river flows, carried by the surprise of its own unfolding. - John O'Donohue
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किया हो जिसने दीदार-ए-यार एक बार कभी... वो फिर कहीं मोहब्बत से महरूम नहीं रहा है... ~ Minal Sultan
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जो हमसे बन सका सो हमने कर लिया तन्हाईयों का मंज़र..यादों से भर लिया ...st
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रूबाई - तेरे क़दमों...में दिल ये रख. दूँ मैं, तेरी चाहत में ख़ुद को लिख दूँ मैं, तू अग़र.... उम्र भर..…. रहे. मेरी, हर ख़ुशी.... तेरे नाम... कर दूँ मैं। #अशोक_मसरूफ़ Pic Credit---grok
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मनुष्य की #अभिव्यक्ति की तीक्ष्णता निर्माण और विध्वंस दोनों ही समान अनुपात में करती रही है ..... मगर, समस्त आरोप तो लेखनी के सिर मढ़ दिए गए... महिमामंडन हो या प्रणयनिवेदन या फिर हो.... संबंधविच्छेदन....... इसमें शब्दों की भूमिका को संदिग्ध माना गया... लेखनी को कृत्यों में साझेदार कहा गया..... शब्दों के समर्पण का उसी क्षण अवमूल्यन हो गया... जब-जब लेखनी ने किसी हृदय की उन्मुक्तता को बाधित किया... और #अभिव्यक्ति पर अंकुश लगा दिया.... #kavyakshra 🖊️
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--शून्य से शून्य का सफर-- ये जीवन क्या है? यह एक ऐसा सवाल है जिसकी हर किसी के लिए परिभाषा अलग होगी, क्योंकि सबके अनुभव अलग-अलग होते हैं। लेकिन कुछ बातें कभी नहीं बदलतीं, वो हमेशा एक जैसी ही रहती हैं। मेरे नज़रिए से यह जीवन हमारा है ही नहीं। हम सब कुछ दूसरों का लेकर चल रहे हैं, इसलिए बोझ महसूस होना स्वाभाविक है। यहाँ केवल हमारा अस्तित्व ही...हमारा है, जिसे पहचानने में अक्सर देर हो जाती है और हम जीवन की भागमभाग में खो जाते हैं। इस यात्रा में जिसे हम मेरा जीवन कहते हैं, असल में हम उम्र भर दूसरों की अपेक्षाओं, समाज के नियमों और पहचान के ढांचों को सहेजने में ही लगे रहते हैं। बचपन में जो नाम मिला, वह किसी और ने दिया; जो संस्कार मिले, वे परिवार से आए; और जो सफलता के पैमाने तय किए गए, वे समाज ने बनाए। जब सब कुछ बाहर का ही है, तो इस मानसिक और भावनात्मक बोझ का अनुभव होना बिल्कुल स्वाभाविक है। हम उस यात्री की तरह हो गए हैं जो किसी और का सामान अपनी पीठ पर लादकर एक अनजानी मंजिल की ओर दौड़े जा रहा है और इसमें हम खुद को ही भूल गए हैं। मेरी दादी कहती थीं कि किसी की बुराइयाँ क्यों देखनी, आवाज़ सुनो तो तुम्हें पता चलेगा; हर आवाज़ की अपनी एक पहचान है...वह खुशी में अलग होगी, दर्द में अलग होगी और सामान्य भाव में अलग होगी। बचपन की यह बात मेरे मन में ऐसी बसी कि मुझे चेहरे याद नहीं रहते। इसका मतलब यह नहीं कि मैं चेहरे देखती नहीं, बल्कि मैं मानती हूँ कि चेहरा बाहरी है। हम बाहरी भावों और मुखौटों को तो बदल सकते हैं, लेकिन उस आवाज़ को कैसे बदलेंगे जो अंतर्मन से आई है? कबीरदास जी भी कहते हैं... "मन ना रँगाए, रँगाए जोगी कपड़ा..." अर्थात, बाहरी चोले बदलने से कुछ नहीं होता।जो मुझे सबसे ज्यादा प्रभावी लगती है। इसलिए बदलती दुनिया में, मेरे लिए उस आंतरिक आवाज़ को सुनना अधिक महत्वपूर्ण है। जो अंदर से आती है, वही सत्य है। इस बाहरी दिखावे की भीड़ में जब मैंने अंतर्मन को सुनना शुरू किया, तो जो वास्तव में महत्वपूर्ण लगा, वही मेरे लिए ज़रूरी हो गया। जीवन दो धुरी के बीच का सफर है और इन दो धुरियों के बीच का जो फ़ासला है...माता-पिता से मिली पहचान से लेकर खुद की बनाई पहचान के विसर्जन तक--वही असल में जीवन की प्रयोगशाला है।इसे हम कैसे जीते हैं यह हम पर निर्भर करता है। पहली धुरी हमें जड़ें देती है और इसी जुड़ाव का सबसे सुंदर रूप है श्राद्ध। मेरे लिए श्राद्ध के यह दिन उस जड़ के प्रति असीम कृतज्ञता है जहाँ से हम अंकुरित हुए। यह इस बात का अहसास है कि हमारा यह शरीर और हमारे संस्कार हमारे पूर्वजों की देन हैं। हम उनका कर्ज चुका तो नहीं सकते, लेकिन श्रद्धा से उन्हें याद कर इस अस्तित्व के बोझ को एक पावन सम्मान में बदल सकते हैं। यह धुरी हमें बताती है कि हम शून्य से शुरू हुए थे। वहीं दूसरी धुरी हमें यह याद दिलाती है कि अंत भी शून्य ही है, और इस शून्य को आनंदपूर्वक स्वीकार कर लेना ही मृत्यु का उत्सव मनाना है। यदि हमने जीवन को निष्ठा से जिया है, तो मृत्यु हमारे लिए एक परम उत्सव बन जाती है। जब शुरुआत और अंत दोनों ही हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, और दोनों ही जगह हम पूरी तरह खाली हैं, तो इस बीच के सफर में अहंकार, ईर्ष्या, तनाव, दर्द और चिंताओं का बोझ उठाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। इसे एक सफर का आनंद लेते हुए जीने में क्या बुराई है? और मृत्यु कोई भय या शोक नहीं है, बल्कि उस किराए के घर और उधार की पहचान को मूल केंद्र को वापस लौटाने का समय है।जब हम जीवन भर दूसरों का बोझ ढोने से मुक्त होकर अपने शुद्ध अस्तित्व में लौटते हैं, तो मृत्यु एक विलाप नहीं, बल्कि आत्मा का अपने परम घर लौटने का महा-उत्सव बन जाती है। फिर बोझ किसलिए? सच्ची समझ तब आती है जब हम इस शोरगुल से बाहर निकलकर अपने शुद्ध अस्तित्व को देखने का साहस करते हैं। वह अस्तित्व जो पदों, उपाधियों, रिश्तों और सांसारिक सफलताओं से परे है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है और न ही कुछ वास्तव में मेरा है, तो जीवन का वह बोझ अचानक हल्का होने लगता है। तब हम जीवन को एक गंभीर और थका देने वाले संघर्ष की तरह नहीं, बल्कि एक सुंदर खेल की तरह जीने लगते हैं। पहचान बनाना ज़रूरी है क्योंकि वह इस दुनिया में जीने का माध्यम है, लेकिन उस पहचान में खो जाना या उसे ही अंतिम सत्य मान लेना भूल है। जब हम अपनी खुद की बनाई पहचान को भी एक दिन चुपचाप छोड़ देने की कला सीख जाते हैं, तभी हम सच्चे अर्थों में मुक्त हो पाते हैं। फिर बोझ कैसा? फिर तो बस एक सहज प्रवाह है, जहाँ हम चलते हैं, सीखते हैं, रचते हैं और अंत में उसी अनंत अस्तित्व में विलीन हो जाते हैं जहाँ से हम आए थे।                                            ✍️ शिखा सिंह।
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मोहब्बत तो सिर्फ शब्द है.. इसका अहसास तुम हो,,, शब्द तो सिर्फ नुमाइश है ..... जज़्बात मेरे तुम हो......!!!❤️🖤🧡 #सुप्रभात_जिन्दगी #सुगंधा
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#छोटा_दरवाज़ा उसका जाना मैं ख़ामोश देखती रही देखती रही तब तक... जब तक उसके कदमों की चाप मेरे कानों में गूंजती रही... आज भी तन्हाई में उस दर्द की दस्तक होती है मेरे हृदय की दहलीज़ पर... छलक पड़ती हैं आंँखें #काँटे सा चुभता है वो पहली मुलाक़ात का सूखा गुलाब...🦋 ~ बिमला वर्मा
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Morning Vibe - Good morning my great X family Enjoy the beautiful day ahead 💐 आज किसी मंज़िल की जल्दी मत रखिए, कुछ रास्ते धीरे चलने पर ही अच्छे लगते हैं। मन पर बीते कल का बोझ थोड़ा कम रखिए, क्योंकि हल्का मन ही दूर तक साथ चलता है। किसी के पास बहुत कुछ होकर भी कमी होती है, और किसी के पास कम होकर भी दिल भरा रहता है। शायद सुकून चीज़ों में नहीं, उन्हें देखने के हमारे ढंग में छिपा होता है। आज अपने हिस्से की अच्छाई बचाकर रखिए, हर बात का ज़वाब देना ज़रूरी नहीं। कुछ लोगों को समझाने से बेहतर है, अपने रास्ते पर चुपचाप चलते रहना। सुबह की शुरुआत किसी बड़ी उम्मीद से नहीं, एक साफ़ मन और सहज मुस्कान से कीजिए। दिन कैसा रहेगा, यह कौन जानता है, मग़र उसे सुंदर बनाने में अपना हिस्सा ज़रूर रखिए। सुप्रभात शुभ दिन जी 💐 💐 #अशोक_मसरूफ़ Pic Credit-pinterest
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