@canopus3000i
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Bharat
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Canopus3000 retweeted
And woman who is calling the protesters to wear kalava like kasaab to the protest is a professor at Kirori Mal College. @DelhiPolice
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As per reports, Delhi Police is planning to play Amruta Fadnavis's songs at full volume at Jantar Mantar to disperse the protesters.
Canopus3000 retweeted
"𝘛𝘰 𝘤𝘩𝘢𝘯𝘨𝘦 𝘵𝘩𝘦 50% 𝘭𝘪𝘮𝘪𝘵, 𝘪𝘴 𝘵𝘰 𝘩𝘢𝘷𝘦 𝘢 𝘴𝘰𝘤𝘪𝘦𝘵𝘺 𝘸𝘩𝘪𝘤𝘩 𝘪𝘴 𝘯𝘰𝘵 𝘧𝘰𝘶𝘯𝘥𝘦𝘥 𝘰𝘯 𝘦𝘲𝘶𝘢𝘭𝘪𝘵𝘺 𝘣𝘶𝘵 𝘣𝘢𝘴𝘦𝘥 𝘰𝘯 𝘤𝘢𝘴𝘵𝘦 𝘳𝘶𝘭𝘦."
-𝗦𝘂𝗽𝗿𝗲𝗺𝗲 𝗖𝗼𝘂𝗿𝘁
𝗕𝘆 𝗽𝗿𝗼𝘃𝗶𝗱𝗶𝗻𝗴 72% 𝗾𝘂𝗼𝘁𝗮, 𝗕𝗝𝗣 𝗴𝗼𝘃𝘁 𝗶𝘀 𝗱𝗲𝗳𝘆𝗶𝗻𝗴 𝘁𝗵𝗶𝘀 𝗷𝘂𝗱𝗴𝗲𝗺𝗲𝗻𝘁. 𝗜𝘁 𝘄𝗶𝗹𝗹 𝗯𝗲 𝗮 𝘀𝗹𝗶𝗽𝗽𝗲𝗿𝘆 𝘀𝗹𝗼𝗽𝗲.
FYI,
A Five judge Constitution Bench of Honorable Supreme Court, in it's judgement (Jaishri Patil case), had said:
"𝗧𝗼 𝗰𝗵𝗮𝗻𝗴𝗲 𝘁𝗵𝗲 50% 𝗹𝗶𝗺𝗶𝘁 𝗶𝘀 𝘁𝗼 𝗵𝗮𝘃𝗲 𝗮 𝘀𝗼𝗰𝗶𝗲𝘁𝘆 𝘄𝗵𝗶𝗰𝗵 𝗶𝘀 𝗻𝗼𝘁 𝗳𝗼𝘂𝗻𝗱𝗲𝗱 𝗼𝗻 𝗲𝗾𝘂𝗮𝗹𝗶𝘁𝘆 𝗯𝘂𝘁 𝗯𝗮𝘀𝗲𝗱 𝗼𝗻 𝗰𝗮𝘀𝘁𝗲 𝗿𝘂𝗹𝗲. 𝗧𝗵𝗲 𝗱𝗲𝗺𝗼𝗰𝗿𝗮𝗰𝘆 𝗶𝘀 𝗮𝗻 𝗲𝘀𝘀𝗲𝗻𝘁𝗶𝗮𝗹 𝗳𝗲𝗮𝘁𝘂𝗿𝗲 𝗼𝗳 𝗼𝘂𝗿 𝗖𝗼𝗻𝘀𝘁𝗶𝘁𝘂𝘁𝗶𝗼𝗻 𝗮𝗻𝗱 𝗽𝗮𝗿𝘁 𝗼𝗳 𝗼𝘂𝗿 𝗯𝗮𝘀𝗶𝗰 𝘀𝘁𝗿𝘂𝗰𝘁𝘂𝗿𝗲.
𝗜𝗳 𝘁𝗵𝗲 𝗿𝗲𝘀𝗲𝗿𝘃𝗮𝘁𝗶𝗼𝗻 𝗴𝗼𝗲𝘀 𝗮𝗯𝗼𝘃𝗲 50% 𝗹𝗶𝗺𝗶𝘁 𝘄𝗵𝗶𝗰𝗵 𝗶𝘀 𝗮 𝗿𝗲𝗮𝘀𝗼𝗻𝗮𝗯𝗹𝗲, 𝗶𝘁 𝘄𝗶𝗹𝗹 𝗯𝗲 𝘀𝗹𝗶𝗽𝗽𝗲𝗿𝘆 𝘀𝗹𝗼𝗽𝗲, 𝘁𝗵𝗲 𝗽𝗼𝗹𝗶𝘁𝗶𝗰𝗮𝗹 𝗽𝗿𝗲𝘀𝘀𝘂𝗿𝗲, 𝗺𝗮𝗸𝗲 𝗶𝘁 𝗵𝗮𝗿𝗱𝗹𝘆 𝘁𝗼 𝗿𝗲𝗱𝘂𝗰𝗲 𝘁𝗵𝗲 𝘀𝗮𝗺𝗲.
𝗧𝗵𝘂𝘀, 𝗮𝗻𝘀𝘄𝗲𝗿 𝘁𝗼 𝘁𝗵𝗲 𝗾𝘂𝗲𝘀𝘁𝗶𝗼𝗻 𝗽𝗼𝘀𝗲𝗱 𝗶𝘀 𝘁𝗵𝗮𝘁 𝘁𝗵𝗲 𝗽𝗲𝗿𝗰𝗲𝗻𝘁𝗮𝗴𝗲 𝗼𝗳 50% 𝗵𝗮𝘀 𝗯𝗲𝗲𝗻 𝗮𝗿𝗿𝗶𝘃𝗲𝗱 𝗮𝘁 𝗼𝗻 𝘁𝗵𝗲 𝗽𝗿𝗶𝗻𝗰𝗶𝗽𝗹𝗲 𝗼𝗳 𝗿𝗲𝗮𝘀𝗼𝗻𝗮𝗯𝗶𝗹𝗶𝘁𝘆 𝗮𝗻𝗱 𝗮𝗰𝗵𝗶𝗲𝘃𝗲𝘀 𝗲𝗾𝘂𝗮𝗹𝗶𝘁𝘆 𝗮𝘀 𝗲𝗻𝘀𝗵𝗿𝗶𝗻𝗲𝗱 𝗯𝘆 𝗔𝗿𝘁𝗶𝗰𝗹𝗲 14 𝗼𝗳 𝘄𝗵𝗶𝗰𝗵 𝗔𝗿𝘁𝗶𝗰𝗹𝗲𝘀 15 𝗮𝗻𝗱 16 𝗮𝗿𝗲 𝗳𝗮𝗰𝗲𝘁𝘀."
Is this the worth of Honorable Supreme Court Verdict on equality for the BJP govt? That they are ready to defy it for appeasing Jarange patil?
Looks like vote bank appeasement is the top priority of BJP rather than Constitutional values!!
Canopus3000 retweeted
- Celebrated Diwali on his birthday.
- Put his photo on the COVID certificate.
- Named a cricket stadium after himself.
- Renamed an intl airport after himself.
All this while still in active office. This level of cringe self-glorification is something we haven't seen from any previous PM during their active tenure.
Canopus3000 retweeted
37 lakh Sawarn General category students have less enrollment in universities than reserved category because of increase in reservations and schemes across india. BJP Government is systematically wiping out General category talent and merit out of the system.
Canopus3000 retweeted
🧵थ्रेड🧵
अभिजीत दिपके आणि मंडळींना डॉ. प्रकाश आमटे यांच्याबरोबर बघून तुम्हाला आश्चर्य किंवा ‘अभिजीत दिपके बरोबरच असणार’ असे काही वाटण्याआधी आमटे कुटुंबाबद्दल खालील माहिती नक्की वाचा
👇🏻
अनेक राष्ट्रीय पातळीवरील आणि जागतिक स्तरावरील पुरस्कार विजेते आमटे कुटुंबीय
Canopus3000 retweeted
Since Kisan Andolan, Punjab is slipping into Taliban rule. Remember Lakhbir Singh? He was brutally lynched at Singhu border for ‘blasphemy’. It happened on camera, the Nihangs perpetrators confessed, prosecution had ton of material evidence, but the ‘brave’ courts acquitted them!
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This is the clarity that saves a civilisation, knowing who you are, what you inherit, and what you refuse to surrender.
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🚨ASSAM: HIMASHRI BORO’S UNCLE REVEALS CHILLING DETAILS OF HER FINAL JOURNEY;
👉 Himashri Boro left Assam for Andhra Pradesh on August 13 with a dance group and decided to return home on October 5 as she had an exam on October 10.
👉 After missing her booked train, Himashri reportedly boarded another train compartment with a general ticket.
👉 Her friend Jyoti Choudhury’s male friend Avinash, an Assam native studying in Andhra Pradesh, took Himashri to the railway station, bought her a ticket and helped her board train number 22503 while it was moving.
👉 Soon after boarding, Himashri called Jyoti at 2:39am and said some boys were harassing her and that she was not safe. She asked her friend to make arrangements for her safety.
👉 Jyoti immediately called railway helpline 139 and informed authorities that Himashri was travelling in a particular coach of train number 22503, requesting Railway Police to check on her.
👉 According to her uncle, no railway personnel checked on Himashree after the alert.
👉 The family could not contact Himashri for around 2 hours and 48 minutes, although her phone continued ringing. Suspecting that something had happened, they contacted Panbazar Police Outpost early on October 6.
👉 Panbazar Police allegedly directed the family to approach the GRP or RPF, saying the matter did not fall under its jurisdiction.
👉 The family approached the GRP, which directed them to the RPF. The RPF then began contacting railway personnel and working to obtain CCTV footage from stations along the route.
👉 When the train reached Guwahati Railway Station at around 1 PM the next day, the family checked its compartments and found two of Himashri’s bags, but Himashree was missing.
👉 Some co-passenger allegedly said Himashree was thrown from the moving train, while another passenger claimed she jumped from the train and another said she got down at a certain station.
👉 At around 5 PM, the family reportedly received information from Andhra Pradesh that Himashri’s mobile phone had been switched on. Her phone had reportedly been ringing until around 9 AM on October 6 before becoming unreachable.
👉 The family then asked police to track the mobile phone’s location.
👉 Himashri was later found dead beside a railway track in Andhra Pradesh, with her family now seeking answers over her final movements, the reported harassment call and the conflicting accounts surrounding her disappearance.
Canopus3000 retweeted
इतिहास की सबसे बड़ी भूलों में से एक यह भी रही है कि लोग बहुत देर तक यह मानते रहे कि जिनसे वे रोज़ दूरी बनाते हैं, मुसीबत के समय वही अपने आप लौट आएँगे।
जब आग पड़ोसी के हिस्से में होती है, तब उसे व्यक्तिगत शिकायत कहा जाता है।
जब वही आग अपने घर की दीवार तक पहुँचती है, तब अचानक सभ्यतागत चेतना का व्याख्यान शुरू हो जाता है।
समस्या यह नहीं कि कोई समुदाय अपने अधिकारों की बात करता है। समस्या यह है कि साझा चेतना की माँग अक्सर उसी क्षण याद आती है जब उसकी ज़रूरत पड़ती है।
जिन सामान्य वर्ग के लोगों को नीति बनाते समय हर जगह से बाहर रखा जाता है, जिनकी माँगों को छोटे स्वार्थ का नाम दिया जाता है, और जिनके अपने हक की बात करते ही उन्हें जातिवादी करार दे दिया जाता है, उन्हीं से बाद में यह अपेक्षा की जाती है कि वे बड़े प्रश्न को पहचान लें?
जब हिंदुओं को SC, ST, OBC और सामान्य वर्ग में बाँटने का काम खुद किया जाए, तब एकता की याद अठारहवीं सदी के उदाहरण से क्यों आती है?
अठारहवीं शताब्दी का सबक उलटा भी पढ़ा जा सकता है। मराठा, राजपूत, सिख, जाट और दक्षिण की शक्तियाँ इसलिए एक स्थायी साझा रणनीति नहीं बना सकीं क्योंकि हर पक्ष को लगता था कि अगला संकट अभी किसी और का है।
आज भी वही तर्क दोनों तरफ चलता है। यदि एक पक्ष वर्षों तक यह मानता रहे कि दूसरे का संकट उसका संकट नहीं है, तो जिस दिन वह साझा चेतना की बात करे, दूसरा पक्ष भी यही कह सकता है कि यह प्रश्न अभी उसके भविष्य का नहीं है।
इतिहास आग को मकानों की सीमा समझाकर नहीं रोकता, यह बात सही है। लेकिन इतिहास यह भी नहीं मानता कि जो लोग लंबे समय तक एक-दूसरे को बाहर रखते हैं, वे संकट के दिन केवल उपदेश से एक हो जाएँगे।
राजनीति में कुछ लड़ाइयाँ सभ्यता की होती हैं और कुछ सत्ता की। जब दोनों पक्ष केवल यह देख रहे हों कि सत्ता किसके पास रहे और किसके हाथ से जाए, और दोनों में से कोई उस वर्ग के ठोस हित की बात न करे जिसे वे रोज़ छोटा बताते रहे हैं, तब उस वर्ग से यह उम्मीद करना कि वह अपनी शिकायत भूलकर मैदान में उतर आए, साझा चेतना नहीं, सुविधा का तर्क है।
सरकार से नाराज़ होना और राष्ट्र से तटस्थ होना एक बात नहीं है। लेकिन यह फ़र्क तभी विश्वास पैदा करता है जब साझा भविष्य की कीमत हर तरफ से चुकाई जा रही हो, केवल एक तरफ से नहीं।
सभ्यताएँ केवल इसलिए नहीं बचतीं कि कोई उन्हें बड़ा प्रश्न याद दिला दे। वे तब बचती हैं जब जिन लोगों से एकता माँगी जा रही है, उन्हें पहले यह भरोसा हो कि उनका प्रश्न भी प्रश्न है, उनकी सीमा भी सीमा है, और उनकी चुप्पी केवल तभी टूटेगी जब साझा चेतना दोनों तरफ से एक जैसी दिखे।
राजनीतिक लड़ाई को देशभक्ति का रंग देना केवल सत्ता हासिल करने का एक जरिया है, जबकि असलियत में दोनों ही पक्ष जातिवादी नीतियों के जरिए सामान्य वर्ग को अधिकारों से बाहर रखते हैं।
जब राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए भेदभाव पैदा करते हैं, तो इस वर्ग को भी उन्हें अपनी देशभक्ति की परिभाषा से बाहर कर देना चाहिए।
यह संघर्ष किसी नैतिक आदर्श का नहीं, बल्कि सिर्फ कुर्सी और नियंत्रण की होड़ है जहां जनता को मोहरा बनाया जाता है।
बाकी अब लोग समझदार हैं, तो अपने हिस्से के प्रश्न, देशभक्ति और लड़ाइयां, उनको खुद तय करने दीजिए🙏
इतिहास की सबसे बड़ी भूलों में से एक यही रही है कि लोग बहुत देर तक यह मानते रहे कि सामने खड़ा संकट उनका संकट नहीं है.. जब तक आग पड़ोसी के घर में होती है, आदमी को लगता है कि वह सुरक्षित है। समस्या यह है कि इतिहास आग को मकानों की सीमा समझाकर नहीं रोकता..
सभ्यताएँ केवल सेनाओं के कारण जीवित नहीं रहतीं.. वे इसलिए बचती हैं क्योंकि उनके भीतर एक न्यूनतम साझा चेतना होती है कि कुछ प्रश्न व्यक्तिगत शिकायतों, जातीय हितों, प्रांतीय प्रतिद्वंद्विताओं और तत्काल राजनीतिक नाराज़गी से बड़े हैं..
राजनीति विज्ञान में एक बहुत पुरानी समस्या बताई जाती है...समाज में कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिनका लाभ सबको मिलता है, लेकिन उन्हें बचाने की कीमत कोई अकेला व्यक्ति नहीं चुकाना चाहता.. हर किसी को लगता है कि कोई दूसरा आगे बढ़ेगा, कोई दूसरा लड़ेगा, कोई दूसरा जोखिम उठाएगा और लाभ मुझे भी मिल जाएगा। लेकिन जिस दिन बहुत सारे लोग यही सोचने लगते हैं, उसी दिन पूरी व्यवस्था कमजोर होने लगती है..
भारत में अठारहवीं शताब्दी का समय इसका बड़ा उदाहरण है...मुगल सत्ता कमजोर हो रही थी..मराठा शक्ति बढ़ रही थी..मजबूत राजपूत राज्य थे, जाट शक्ति बनना शुरू हो चुकी थी, सिख शक्ति उभर रही थी, मैसूर था, बंगाल था, हैदराबाद था और अनेक स्थानीय शक्तियाँ अपने-अपने हित, क्षेत्र, पुराने विवाद और तत्कालीन राजनीतिक समीकरण देख रही थीं..हर शक्ति की अपनी समस्याएँ, अपने शत्रु और अपने हित थे..
लेकिन परिणाम क्या हुआ? अंग्रेज छाती पर दो सौ साल के लिए चढ़ बैठे..
उपमहाद्वीप में कोई स्थायी साझा सुरक्षा व्यवस्था खड़ी नहीं हो सकी..
ईस्ट इंडिया कंपनी जब भारत आई थी तब उसके पास कोई विशाल भारतीय साम्राज्य नहीं था। वह व्यापार करने आई थी। फिर उसने भारतीय शक्तियों से अलग-अलग समझौते किए, कहीं युद्ध किया, कहीं मित्रता की, कहीं एक पक्ष को दूसरे के विरुद्ध खड़ा किया, कहीं राजस्व पर अधिकार लिया और फिर उसी भारतीय धन से भारतीय सैनिकों की सेना खड़ी करके अगले भारतीय राज्य से युद्ध किया..
अंग्रेजों ने भारत को एक दिन में नहीं जीता..उन्होंने एक ऐसी भूमि को धीरे-धीरे जीता जिसकी अलग-अलग शक्तियाँ बहुत लंबे समय तक यह मानती रहीं कि अगला संकट अभी किसी और का है..
इतिहास हमें एक असुविधाजनक बात सिखाता है..कोई सभ्यता केवल इसलिए सुरक्षित नहीं रहती क्योंकि उसके लोग बहादुर हैं..भारत में बहादुरी की कभी कमी नहीं रही..
राजपूत शताब्दियों तक लड़े...मराठों ने असाधारण सैन्य और राजनीतिक शक्ति खड़ी की..सिख परंपरा ने गुरु हरगोबिंद से लेकर गुरु गोबिंद सिंह और खालसा तक अद्भुत सैन्य चेतना विकसित की..जाटों ने अपनी शक्ति बनाई..दक्षिण में विजयनगर से लेकर मैसूर तक अनेक शक्तियों ने प्रतिरोध किया।
समस्या यह नहीं थी कि लड़ने वाले लोग नहीं थे...समस्या यह थी कि अलग अलग क्षेत्रों की वीरता हमेशा एक स्थायी साझा रणनीतिक चेतना में नहीं बदल सकी..यही किसी सभ्यता की सबसे कठिन परीक्षा होती है।
आप अपने छोटे मतभेदों को कब तक बड़ा मानेंगे और किस क्षण समझेंगे कि सामने खड़ा प्रश्न आप सबके भविष्य का है?
आज भी यही प्रश्न हमारे सामने दूसरे रूप में आता है।
आप आरक्षण नीति से नाराज़ हो सकते हैं..UGC से नाराज़ हो सकते हैं...किसी अदालत के फैसले से असहमत हो सकते हैं...सरकार की आर्थिक नीति गलत लग सकती है। आपको लग सकता है कि जिस राजनीतिक व्यवस्था को आपने समर्थन दिया उसने आपकी अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया।
इनमें से किसी भी बात पर आपको चुप रहने की जरूरत नहीं है।
सरकार से सवाल करिए। खुलकर विरोध करिए। अपने अधिकार माँगिए। चुनाव में सरकार को दंड दीजिए। लोकतंत्र में यही आपका अधिकार है।
लेकिन एक बात समझनी होगी सरकार से नाराज़ होकर राष्ट्र से तटस्थ नहीं हुआ जा सकता.. क्योंकि जिस व्यवस्था से आप नाराज़ हैं, उसके भीतर ही आपका घर सुरक्षित है, आपकी संपत्ति सुरक्षित है, आपकी भाषा और संस्कृति का भविष्य सुरक्षित है, आपका व्यापार चलता है, आपके बच्चों की शिक्षा चलती है, आपका पासपोर्ट दुनिया में आपकी पहचान देता है और आपकी सीमा पर खड़ी सेना यह सुनिश्चित करती है कि राजनीति आपके घर की दीवार तक युद्ध बनकर न पहुँचे..
इस व्यवस्था में कमियाँ हो सकती हैं...बहुत बड़ी कमियाँ हो सकती हैं..उन्हें ठीक करना चाहिए।
लेकिन व्यवस्था और अराजकता के बीच तटस्थ रहने जैसा कोई वास्तविक विकल्प नहीं होता।
जब राज्य और समाज दोनों कमजोर होते हैं तो खाली जगह खाली नहीं रहती। वहाँ कोई न कोई दूसरी शक्ति आती है। कभी मिलिशिया, कभी अपराधी गिरोह, कभी विदेशी शक्ति, कभी कट्टरपंथी आंदोलन और कभी ऐसा राजनीतिक ढाँचा जिसमें आपके अधिकारों की कोई गारंटी नहीं होती..
अराजकता अपने आप स्वतंत्रता में नहीं बदलती..
अक्सर वह किसी अधिक कठोर सत्ता का रास्ता खोलती है..
यही कारण है कि सभ्यतागत चेतना और रोजमर्रा की राजनीति में फर्क समझना जरूरी है..
यदि भारत हमारे लिए केवल 1947 में बना एक प्रशासनिक ढाँचा है तो किसी सरकार से नाराज़ होकर उससे भावनात्मक दूरी बना लेना आसान है.. लेकिन यदि भारत हमारे लिए हजारों वर्षों की स्मृति, संस्कृति, तीर्थ...परंपरा, भाषा, ज्ञान, संघर्ष और निरंतरता का नाम है तो हमारी भूमिका बदल जाती है।
तब हम केवल इस व्यवस्था के उपभोक्ता नहीं हैं
हम इसके उत्तराधिकारी भी हैं और संरक्षक भी..
इतिहास का एक क्रूर नियम है...आप किसी संकट में रुचि न लें, इससे यह तय नहीं होता कि संकट भी आपमें रुचि नहीं लेगा..
Canopus3000 retweeted
ज्ञानियों और 'लेकिन मोदी, लेकिन योगी' करने वालों के नाम
दस महीने से बातें चल रही हैं। इन दस महीनों में कई ‘नेता’ बने। किसी ने कॉन्ग्रेस से पैसे ले कर आंदोलन को खराब करने का प्रयास किया, कोई भाजपा के नेताओं की गोद में बैठ गया ताकि आंदोलन में टूट पड़ जाए। कोई गाँव-गाँव भटक कर ₹40-50 लाख जुटा चुका है, पर स्टेज पर गाली सुनता है, गद्दार कहलाता है।
जैसे-जैसे चुनाव समीप आता जाएगा, पार्टियों के फंड बढ़ते जाएँगे। इनमें से कई ने यह तक कहा कि फलाना आ जाएगा, हमने बताया कि जिसका भय, जो कह कर दिखा रहे हो, वही सब तुम्हारी फेवरेट पार्टी कर चुकी है। यह नैरेटिव ध्वस्त हो गया।
अब नया चल रहा है: सारी बातें सही हैं, हर नीति जिस पर GC नकारात्मक लाइन ले रहा है, सब उचित है! लेकिन मोदी जी… लेकिन योगी जी…
कैंचो! ये कौन सी लाइन है बे? जब सारी नीतियाँ, जिस पर हम बोल रहे हैं, गलत ही हैं। सब समाज को विभाजित करने वाली ही हैं, तो हम बोलेंगे किसको? विरोध किसका करें? तिलचट्टा पार्टी का?
तुमने ये जो कुत्ते की विष्ठा समाज के आँगन में फेंकी है, उसका हम करें क्या? और उल्टा हम पर ही आक्षेप कि हम मोदी विरोध में राष्ट्र विरोधी हो गए? मेरे मुँह से निकला एक वाक्य बता दो जहाँ मैंने भारत के विरोध में कुछ बोला हो पिछले दस महीनों में!
वो नहीं निकाल पाओगे। हाँ, तुम्हें यदि लगता है कि मोदी या योगी ही राष्ट्र हैं, तो मैं बता देता हूँ कि मोदी एक छपास का भूखा, निकृष्ट स्तर का जातिवादी हो चुका है। या, पहले ही था, हमें दिखा नहीं कभी।
योगी भी राष्ट्र नहीं हैं। राष्ट्र न मैं हूँ, न तुम हो, राष्ट्र हम सब हैं। नेता उतना ही अच्छा होता है जितनी उसकी गवर्नेंस। बाकी चीजें फ्लफ हैं। योगी जी के नाक के नीचे यूपी में जो भ्रष्टाचार, जातिवाद चल रहा है वह किसी को क्यों नहीं दिखता? सब भूल जाएँ क्योंकि वो भाजपा के हैं और हमारे पास कोई विकल्प नहीं! तो हम विकल्प बनाएँगे, समय लगेगा, लेकिन बनाएँगे। और कोई चारा नहीं है।
ध्यान रहे कि 2024 के बाद, हिन्दू समाज ‘बँटेंग तो कटेंगे’ पर एकजुट हो कर भाजपा को लगातार वोट दे रहा था। फिर इनके मलद्वार में UGC का कीड़ा घुसा कि राहुल गाँधी क्या ‘रोहित वेमुला एक्ट’ लाएगा, हम उस एक्ट से भी विकृत चीज ले कर आएँगे और OBC को बताएँगे कि तुम्हें भी सुरक्षा दे दी गई है। अब शत्रु केवल एक है: सवर्ण!
सरकार की अपनी रिपोर्ट में अब उच्च शिक्षा के कॉलेजों में SC/St/OBC की संख्या 62% हो चुकी है, सवर्णों (मुस्लिम आदि समेत) के बच्चे EWS समेत केवल 38% में हैं। जहाँ मुस्लिम, दलित का एनरोलमेंट 200% से अधिक बढ़ा है, अनारक्षित की संख्या, 2020-21 से 2023-24 में 37 लाख से घटी है! जी हाँ, प्रतिशत ही नहीं, संख्या भी घटी है!
हम अंधे नहीं हैं। हमें ओडीशा, मध्यप्रदेश समेत सब दिख रहा है। हमें कर्नाटक में वेमुला एक्ट पर तुम्हारी चुप्पी भी दिखी। हमें ओबीसी में मुस्लिम को घुसाना भी दिखा। हमें भर्तियों में लगातार कम होती सवर्ण सीटें भी दिख रही हैं।
हमारा माय-बाप अब हमारे घर वाले ही बचे हैं। हमने वह आउटसोर्सिंग अब बंद कर दी है। हम नहीं जानते कि यूपी चुनाव में क्या होगा, लोकसभा चुनाव कैसा बीतेगा, पर हम बिना लड़े नहीं मरेंगे। और जो हमारे साथ नहीं है, जो हमें शर्तें गिना रहा है, वह सब ही शत्रु है।
मेरे मन में ऐसे किसी भी व्यक्ति को ले कर कोई सम्मान नहीं है जो 'किंतु-परंतु' में उलझा हुआ है और किसी अस्तित्वहीन 'RW' की दुहाई दे रहा है। RW जैसी कोई भी सुसंगठित व्यवस्था ना कल थी, ना आज है।
मैंने फ़रवरी में ही यह सब सुना था कि 'अब बस कर दो भाई, कितना UGC करते रहोगे'। मैं तब भी नहीं रुका था। और जब आज भी तुम सब वही कह रहे हो कि 'ये साला पागल हो गया है, सबसे लड़ रहा है, एक ही बात हर दिन बोलता है', मैं आज भी नहीं रुकूँगा। क्योंकि फ़रवरी में न रुकने का परिणाम हमे सितंबर में दिखा, और आज ना रुकने का मार्च में दिखेगा।
मैं लाखों की भीड़ में अकेला भी एक तरफ़ रहूँ और मैं कनविंस्ड रहूँ कि मैं सही हूँ, तो मुझे भीड़ ना तो दिखाई देती है, ना उसकी ध्वनि सुनाई देती है। मैं जो कर रहा हूँ, और जो करता रहूँगा उसका एक कॉस्ट है जो मैंने इन किसी भी 'मठाधीशों' से नहीं माँगा।
आज ये ज्ञान देने लगे, तो बताया कि ये कितने बड़े दोगले हैं। आगे और भी बहुत कुछ बताऊँगा कि किसके लिए कोई विषय केवल एक विषय है, और किसके लिए फण्ड उगाही का एक मार्ग। डेढ़ हज़ार लोग को जोड़ नहीं सकते और 'चार लोग नहीं आएँगे सड़क पर' का ज्ञान देते थे ये सब। हमने कितने उतार दिए, वो सबको दिख गया।
अभी हमारी लड़ाई का पहला चरण है। और इसकी टाइमलाइन छः महीने की नहीं, छः वर्ष की है। तुम्हें हमारी भीड़ नहीं दिखेगी क्योंकि हम भीड़ जुटा ही नहीं रहे। बाक़ी, समय सबको उत्तर देता है। बड़े-बड़े सिंहासनों को इन्हीं ब्राह्मणों ने उठाया और गिराया है।
जो सत्ता अपने समाज की प्रतिभा का सम्मान नहीं करती, वह मिट्टी में मिल जाती है।
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“Give us death if you can’t deliver justice,” says Amit Chaudhary, whose family is facing 14 cases under the SC/ST Act.
He had to face jail at the age of 14 because of this. Now, he faces 42 court hearings a month.
Full video: youtu.be/5Fc8slGqfvI
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झूठ आप बोल रहे हैं!
UGC 2026 नियम 13 जनवरी 2026 को लागू हो चुके थे!
ये रहा gazetted regulations👇
मंत्री होकर गलत जानकारी दे रहे हैं?
हमने तो इसके लागू होने के 2 दिन बाद ही इसको देखा और आवाज़ उठाई!
और अब भी सुप्रीम कोर्ट ने इसको रोका हुआ है!
सरकार तो अभीतक इसको वापिस लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाई!
Canopus3000 retweeted
Times have changed. It is because of our forgiving nature, that India is facing these problems. Forgive, forgive, forgive, you have to draw a line somewhere. This court commuted death sentence in a case where father raped and murdered his elder daughter. Goes to jail on life imprisonment on the basis of the mother’s testimony. After some years the father comes out on parole and murders the mother in front of his younger daughter. On the younger daughter’s testimony, he’s given death sentence. And then death sentence is commuted to life sentence by the Supreme Court on the ground that he did not murder the younger child. That is why we say, our forgiving nature has to come to an end somewhere: Supreme Court Justice Dipankar Datta while hearing plea seeking premature release of a life convict whose death sentence was commuted to life imprisonment after a prolonged delay in deciding his mercy petition.
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Medical Officers appointed by @BJP4India and @BJP4Odisha double engine govt.
Only 411 seats out of Five thousand, Two hundred and Forty Eight vacancies were filled by meritorious candidates.
92% or reserved
8% of those who deserved.