Ashique iqbal retweeted
📢Trend Alert📢Tomorrow🤝
20 Oct. Tuesday 4PM
#SaveRaceCourseMasjid
अस्सलामु अलैकुम नाजरीन आप सभी से गुज़ारिश है कि प्रशासन दिल्ली PM हाउस के पास रेस कोर्स मस्जिद को तोड़ने के मंसूबे बना रहा है।
मस्जिद 150 साल पुरानी बताई जा रही है, मस्जिद कमेटी के पास 1933 के सरकार कागज़ात है, 1977 के दिल्ली गैजेट नोटिफिकेशन में भी दर्ज है।
कल शाम 4 बजे हम सब मिलकर #SaveRaceCourseMasjid के साथ मस्जिद के हक मे ट्रेंड ट्वीट करेंगे।
उम्मीद है आप सभी साथ देंगे और इस मुहिम को कामयाब बनाएंगे।
Hashtage:- #SaveRaceCourseMasjid
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Join All Muslim 💯
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बिल्कुल सही कह रहे हैं ओवैसी साहब मैं सहमत हूं।
अब हिस्सेदारी और बराबरी तभी मिलेगी जब तक हम लोग नेता नहीं बनेंगे।
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This video genuinely overwhelmed me. It reminds us of the immense sacrifices Muslims of UP made to build and strengthen the leadership of Dalits and Backward Classes.
For many, that contribution came at a devastating personal cost. Muslims helped build this leadership, only to be discarded once their purpose was served.
This man’s story is heartbreaking. He put aside the pain of watching his own child die and even missed the child’s janazah because he did not want his leader to lose an election.
Think about that for a moment. No political cause can erase the weight of such a sacrifice. It is a level of personal loss that words can barely capture.
Ashique iqbal retweeted
Meri aulad secularism naam qurban?
Avg congressi/SP/BSP gulam aur inke zehniyat rakhne wale lifafon aur chande pe jeene wale log
This video genuinely overwhelmed me. It reminds us of the immense sacrifices Muslims of UP made to build and strengthen the leadership of Dalits and Backward Classes.
For many, that contribution came at a devastating personal cost. Muslims helped build this leadership, only to be discarded once their purpose was served.
This man’s story is heartbreaking. He put aside the pain of watching his own child die and even missed the child’s janazah because he did not want his leader to lose an election.
Think about that for a moment. No political cause can erase the weight of such a sacrifice. It is a level of personal loss that words can barely capture.
Ashique iqbal retweeted
Replying to @apnarajeevnigam
आप लोगो ये लोग क्यों बीजेपी की बी टीम नहीं लगती??? क्यूँकि आप बी नहीं चाहते मुस्लिम आगे बड़े उनकी हिस्सेदारी बड़े, मुस्लिम हमेशा ये नक़ली सेक्युलर के सामने झुका हुवा रहे। हिम्मत करके इनपे बी बोलके दिखाए
मुसलमान से इतनी नफ़रत है टोटी और CongRSS में कि उर्दू नाम वालों का इस्तेमाल कर कैसे हरा दिए
बलरामपुर भी तुम्हारी अम्मा इकरा हसन, बाप अफ़ज़ाल अंसारी और भड़वा टुट्टा शायर हरवा दिया मुसलमान आदिल हसन को 300 votes से
उसमे भी टोटी का मुसलमान से नफ़रत वाला एजेंडा चला
Replying to @ashiqecool
ठाकुरगंज में सऊद असरार की सीट भाजपा गठबंधन को दी
बलरामपुर में महबूब आलम की सीट भाजपा गठबंधन को दी
कस्बा में आफाक आलम की सीट भाजपा गठबंधन को दी
प्राणपुर में इशरत परवीन की सीट भाजपा को दी
केवटी में फराज फातमी की सीट भाजपा गठबंधन को दी
“गान में गू नहीं हगने चले हो bhnchd के छोड़े”
Replying to @Alhamd313 @ashiqecool
कोई दिक्कत नहीं अगर ओवैसी की मदद से भी भाजपा की सरकार बनती है
तो भी इत्तेहाद उल मुस्लिमीन 00 ही पाएगी
झूठ फैला रहे हो चादरमोड
सीमांचल पर मत भिड़ना भोस D K, टोटी ने ही मुसलमानों को हरवाया है वहाँ
पूछ तेरे नाजायज़ बाप इमरान शायर से कि अफ़ाक आलम 5 बार का जीता हुआ MLA का टिकट इरफ़ान कितने बेचा पप्पू यादव के साथ ??
और 5 बार का जीता हुआ MLA का टिकट किस आधार पर काटा ??
Replying to @ashiqecool
ठाकुरगंज में सऊद असरार की सीट भाजपा गठबंधन को दी
बलरामपुर में महबूब आलम की सीट भाजपा गठबंधन को दी
कस्बा में आफाक आलम की सीट भाजपा गठबंधन को दी
प्राणपुर में इशरत परवीन की सीट भाजपा को दी
केवटी में फराज फातमी की सीट भाजपा गठबंधन को दी
सियासत अगर तेरे समझ कि चीज़ होती तो हुतुये ये बात तू सबसे पहले अपने नाजायज़ बाप राहुल गांधी से पूछता कि तेलंगाना में अलायन्स कियूँ किया हुआ है AIMIM से ? और ज़रूरत कियूँ पड़ी?
और केरल में मुसलमानों कि पार्टी IUML से गठबंधन कियूँ किया हुआ है अकेले कियूँ नहीं लड़ता इलेक्शन वहाँ ?
Ashique iqbal retweeted
पहले ये सेक्युलर थे फिर संघी हो गए, और लगता है बहुत जल्द फिर से सेक्युलर हो जाएंगे।
सेक्युलर पार्टियों के लिए सेक्युलर शब्द कपड़ों की तरह हो गया है जब चाहे पहन लो और जब चाहे उतार दो..!!
IRCTC वाला किया घोटाला था दोस्त??
जिसका summon RJD एंड कांग्रेस के अलायन्स वाले दिन आया था
किया हुआ था उस दिन यादव जी ?? बारह कैंडिडेट अलायंस के बाद भी एक दूसरे के आमने सामने मैदान काहे था रजाऊ ??
दुइ कंटाप में ज़मीन नचा दिया जाएगा सर
Ashique iqbal retweeted
The Captive Mind और भारत की मुस्लिम राजनीति का इलीट वर्ग
Czesław Miłosz की किताब The Captive Mind हमें बताती है कि किस तरह बुद्धिजीवी और राजनीतिक इलीट अपनी स्वतंत्र सोच से समझौता करके किसी व्यवस्था के अनुकूल हो जाते हैं। वे धीरे धीरे व्यवस्था की सीमाओं को ही वास्तविकता मानने लगते हैं और फिर उसी व्यवस्था को सही साबित करने में अपनी बौद्धिक ऊर्जा खर्च करने लगते हैं।
भारत में मुस्लिम राजनीति के इलीट वर्ग को भी इसी नजरिए से देखने की जरूरत है।
एक तरफ आम मुस्लिम अवाम है जो अपनी सुरक्षा सम्मान शिक्षा रोजगार और राजनीतिक हिस्सेदारी के सवालों से जूझ रही है। दूसरी तरफ मुस्लिम राजनीति का एक ऐसा इलीट वर्ग है जिसकी राजनीतिक स्वीकार्यता अक्सर स्थापित सत्ता संरचनाओं के साथ उसके संबंधों पर निर्भर दिखाई देती है।
आम मुसलमान अपने नेतृत्व से पूछता है कि उसकी राजनीतिक ताकत का वास्तविक परिणाम क्या निकला। उसके प्रतिनिधित्व का विस्तार क्यों नहीं हुआ। उसकी समस्याएं चुनावी भाषणों से आगे नीतिगत फैसलों तक क्यों नहीं पहुंचीं। और मुस्लिम नेतृत्व को अपने स्वतंत्र राजनीतिक विकल्पों के लिए बार बार सफाई क्यों देनी पड़ती है।
लेकिन इलीट राजनीति का एक हिस्सा इन सवालों का जवाब देने के बजाय स्थापित राजनीतिक व्यवस्था की सीमाओं को ही अंतिम सत्य मान लेता है। वह अवाम को समझाता है कि राजनीतिक हिस्सेदारी की मांग करना अव्यावहारिक है। स्वतंत्र नेतृत्व की कोशिश करना जोखिम भरा है। और मौजूदा व्यवस्था के भीतर जो जगह मिल रही है उसी को उपलब्धि समझ लेना चाहिए।
यहीं The Captive Mind का विचार प्रासंगिक हो जाता है।
जब कोई राजनीतिक इलीट व्यवस्था को बदलने के बजाय अवाम को उसी व्यवस्था के अनुकूल ढलने की शिक्षा देने लगे तो सवाल उठना चाहिए कि वह अवाम का प्रतिनिधित्व कर रहा है या व्यवस्था की स्वीकार्य सीमाओं का।
यह जरूरी नहीं कि हर समझौता अवसरवाद हो। गठबंधन और चुनावी रणनीति राजनीति का हिस्सा हैं। लेकिन रणनीतिक समझौते और स्थायी राजनीतिक आत्मसमर्पण के बीच फर्क होना चाहिए।
मुद्दा किसी एक दल या नेता का नहीं है। सवाल उस पूरी राजनीतिक मानसिकता का है जिसमें मुस्लिम अवाम से हर बार समझौता करने की उम्मीद की जाती है लेकिन मुस्लिम राजनीतिक इलीट से अपनी स्वतंत्रता और जवाबदेही साबित करने की मांग नहीं की जाती।
लोकतंत्र में किसी समुदाय की भूमिका केवल वोट देने और चुनावी चंदा जुटाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी वास्तविक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
आम मुसलमान को केवल राजनीतिक समर्थन देने वाला वर्ग नहीं बल्कि अपने राजनीतिक भविष्य का निर्णय लेने वाला वर्ग बनना होगा।
क्योंकि किसी समुदाय की राजनीतिक परिपक्वता इस बात से तय नहीं होती कि उसका इलीट सत्ता के कितने करीब है। असली कसौटी यह है कि वह इलीट अवाम को कितना जवाबदेह है और उसकी राजनीतिक ताकत को कितने वास्तविक अधिकारों में बदल पाता है।
The Captive Mind हमें दूसरों की मानसिक गुलामी पहचानने से पहले एक जरूरी सवाल पूछने के लिए प्रेरित करती है।
कहीं हमारी राजनीतिक समझ भी उन्हीं सीमाओं की कैदी तो नहीं बन गई है जिन्हें हमने कभी चुनौती देने का सपना देखा था?
✍️ aw azmi
#TCT ☕️
टोटी जहाँ जहाँ जाएगा, वहाँ कि सरकार ऐसे ही बनवाएगा 😂
दिल्ली, बिहार, बंगाल और अब UP
टोटी ही पनौती है 😂😂
93% मुसलमानों ने टोटी को वोट दिया है,
बेवफ़ा तो साले तुमलोग हो, थे, और रहोगे
मुल्ले टाइट करने गए थे ना ?
Replying to @ashiqecool
Tum log apni vote gad me ghusod lo tum logo ke chakkar me spa aj stta me nhi hai
गांव का गुद्दा लाल हो जाएगा बेटा,
तुम्ही लोग टोटी के साथ बेवफ़ाई किए हो भोस D K
और टोटी का मुस्लिम विरोधी एजेंडा,
उसके बाद भी मियाँ भाई साथ में ही था अब नहीं रहेगा
मुल्ले टाइट करने चले थे ना भाजपा के साथ,
तुमलोग तो वो हो के जिसने तुमलोगों आरक्षण दिया तुम उसके सगे नहीं हूए
Replying to @ashiqecool
Tum log apni vote gad me ghusod lo tum logo ke chakkar me spa aj stta me nhi hai
Ashique iqbal retweeted
Replying to @ashiqecool
अखिलेश बहुत बड़ा फ्रॉडी गिरगिट है जो चुनाव देखते ही तरह तरह के रंग बदलता रहता है पहले सगा बनाता है फिर ऐसा कोई सगा नहीं जिसको इसने कभी ना कभी ठगा ना हो।
P= परिवार
D=धन्नासेठ
A= अपराध
correction,
AIMIM 5 विधाएक जीती और
वहाँ भी टोटी ने
मुसलमान विधायक हरवा के BJP और JDU को जीतवाया,
बाजी इक़रा हसन, और अफ़ज़ाल अंसारी का इस्तेमाल कर के वो भी बिन बुलाए बारात कि तरह
वरना टोटल 10 MLA मुसलमान सिक्योर था
बिहार का नाम ना लेना सपाई कर्मियों
बहुत लप्पड़ पड़ेगा
ओवैसी: अब्दुल अब दरी नहीं बिछाएगा
हक़ीकत: 2015 में बिहार में 24 मुस्लिम विधायक थे ओवैसी के बिहार जाने के बाद अब केवल 11 मुस्लिम विधायक बचे है
ओवैसी हमेशा जीते हुए मुस्लिम विधायक के सामने अपने उम्मीदवार उतारते हैं ताकि वह हार जाए
इन्हें केवल चुनाव में अब्दुल की याद आती है उसके बाद यह मस्त हैदराबाद के महल में बैठकर बिरयानी खाते हैं और भूल जाते हैं कि बिहार और यूपी के मुसलमान को क्या दिक्कत हो रही है।



























