"शिक्षा मंत्री के हटने से मेरे गरीब बच्चों को क्या मिला?"
"धोखा या न्याय? सच जानिए!"
क्या केवल शिक्षा मंत्री के हटने से गरीब बच्चों की शिक्षा की समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी?
क्या अब सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधरेगी? क्या हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी? या बदलाव के लिए अभी और ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है?
इस वीडियो में शिक्षा व्यवस्था, गरीब बच्चों के अधिकार और आवश्यक सुधारों पर चर्चा की गई है।
क्या शिक्षा मंत्री के हटने से अब ये बड़े बदलाव होंगे?
❓ क्या बड़े-बड़े कोचिंग सेंटरों पर कार्रवाई होगी?
❓ क्या पेपर लीक पूरी तरह बंद हो पाएंगे?
❓ क्या पेपर लीक करने वालों को मौत की सज़ा जैसे कठोर कानून की मांग पर विचार होगा?
❓ क्या पेपर लीक करने वालों पर NSA या UAPA जैसे कड़े कानून लागू किए जाएंगे, या इसके लिए कानून में संशोधन होगा?
❓ क्या NEET की परीक्षा साल में दो बार आयोजित की जाएगी?
❓ क्या पेपर लीक के दोषियों की संपत्ति जब्त की जाएगी?
❓ क्या गरीब और मेहनती छा�
@ANI @PTI_News
🪔✨ HAPPY DIWALI | दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ✨🪔
एक दीप आशा का, एक दीप विश्वास का, एक दीप मानवता और इंसाफ का! ❤️
इस पावन दीपावली पर आइए संकल्प लें कि हम केवल अपने घरों को ही नहीं, बल्कि जरूरतमंदों के जीवन को भी प्रेम, करुणा, सम्मान और खुशियों से रोशन करेंगे।
🌟 May the light of Diwali defeat darkness, injustice, discrimination and hatred, bringing peace, dignity, equality and happiness to every human life.
Let Humanity Shine, Let Justice Prevail, Let Peace Unite the World! 🌍🕊️
With Warm Wishes & Blessings,
Dr. Anthony Raju
Advocate, Supreme Court of India
Chairman – All India Council of Human Rights, Liberties & Social Justice (AICHLS)
National Legal Aid Council
National Council of News & Broadcasting
📞 8588872001
🪔 Happy Diwali – Spreading Light, Love, Peace & Humanity!
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क्या सिर्फ एक गवाह के बयान पर POCSO में सजा हो सकती है?
क्या POCSO केस में केवल एक गवाह का बयान दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त है? क्या हर मामले में मेडिकल और अन्य सबूत जरूरी हैं?
जानिए कानून और सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण सिद्धांत।
कानूनी सलाह एवं सहायता के लिए WhatsApp करें: 8588872001
डॉ. एंथनी राजू
Advocate, Supreme Court of India
LEGAL DISCLAIMER: यह वीडियो केवल सामान्य कानूनी जागरूकता एवं शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी विशेष मामले में कानूनी सलाह नहीं है। प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों, परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होता है। किसी भी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष घोषित करने का अधिकार केवल सक्षम न्यायालय को है।
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बचाव पक्ष के वकीलों के लिए सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला!
Helpline 085888 72001
क्या अभियोजन पक्ष द्वारा चार्जशीट में शामिल नहीं किए गए दस्तावेज भी आरोपी के बचाव में मददगार हो सकते हैं?
CBI v. Anil Dixit, 2026 INSC 1064 में सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसी द्वारा भरोसा नहीं किए गए दस्तावेजों (Unrelied-Upon Documents) के निरीक्षण और प्रासंगिक दस्तावेजों को मुकदमे में प्रस्तुत कराने की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण निर्देश दिए।
एक मजबूत बचाव केवल अभियोजन पक्ष के सबूतों की जांच करने से नहीं बनता, बल्कि उन महत्वपूर्ण दस्तावेजों और साक्ष्यों की पहचान करना भी जरूरी है, जो आरोपी के पक्ष में मददगार हो सकते हैं।
कानूनी प्रावधान: धारा 94 BNSS, 2023 (पुरानी धारा 91 CrPC के समकक्ष)।
प्रस्तुतकर्ता:
Dr. Anthony Raju
Advocate, Supreme Court of India
अस्वीकरण: यह पोस्ट केवल कानूनी जागरूकता एवं शैक्षणिक जानकारी के उद्देश्य से है। प्रत्येक मामले में इस फैसले का उपयोग तथ्यों और मुकदमे की प्रक्रिया के चरण के अनुसार अलग हो सकता है। उचित कानूनी सलाह आवश्यक है।
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🚨 फीस नहीं देने पर बच्चों को प्रताड़ित नहीं किया जा सकता! जानिए कानून।
बच्चों को फीस के नाम पर अपमानित करना, मानसिक रूप से प्रताड़ित करना या शिक्षा से वंचित करना स्वीकार्य नहीं है।
⚖️ बच्चों के अधिकारों की रक्षा करें!
🇮🇳 इस राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनें।
Follow करें, जागरूकता फैलाएँ और बच्चों के सम्मान एवं शिक्षा के अधिकार की आवाज़ बनें।
📞 Legal Awareness Helpline: 9873087903
Legal Awareness by Dr. Anthony Raju
Advocate, Supreme Court of India.
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आर्मी लॉ: SUMMARY OF EVIDENCE के बाद क्या होता है?
क्या Summary of Evidence (साक्ष्यों का संकलन) पूरा होने के बाद आरोपी का Court Martial होना अनिवार्य है?
जवाब है – नहीं!
Army Rules, 1954 के Rule 24 के तहत, Summary of Evidence पर विचार करने के बाद Commanding Officer (CO) के पास मुख्य रूप से तीन विकल्प होते हैं:
1. Court Martial के लिए भेजना:
आरोपी को Court Martial में मुकदमे का सामना करने के लिए भेजने की प्रक्रिया शुरू करना।
2. उच्च सैन्य अधिकारी को मामला भेजना:
मामले को उचित वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के विचार और आगे के आदेश के लिए भेजना।
3. दोबारा सुनवाई या आरोप समाप्त करना:
CO मामले को दोबारा सुन सकता है, आरोप खारिज कर सकता है या कानून के अनुसार उचित संक्षिप्त कार्रवाई कर सकता है।
⚖️ महत्वपूर्ण कानूनी बात:
केवल Summary of Evidence पूरा हो जाने से आरोपी दोषी नहीं हो जाता और न ही Court Martial अपने आप शुरू हो जाता है।
डॉ. एंथनी राजू की विशेषज्ञ कानूनी सलाह:
बचाव पक्ष के वकील को विशेष रूप से इन बिंदुओं की जांच करनी चाहिए:
- गवाहों के बयानों में विरोधाभास और चूक।
- प्रत्यक्षदर्शी और सुनी-सुनाई बातों में अंतर।
- मेडिकल एवं फॉरेंसिक रिपोर्ट।
- Army Rules 22, 23 और 24 का सही पालन।
- आरोपी को गवाहों से जिरह करने और अपना बचाव प्रस्तुत करने का उचित अवसर मिला या नहीं।
याद रखिए: Summary of Evidence का पूरा होना दोष सिद्ध होना नहीं है। प्रत्येक आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी बचाव का अधिकार है।
⚖️ कानूनी जागरूकता | सैन्य कानून | Court Martial Defence | POCSO Defence
डॉ. एंथनी राजू
Advocate, Supreme Court of India
Chairman, All India Council of Human Rights, Liberties & Social Justice (AICHLS)
अस्वीकरण (DISCLAIMER): यह पोस्ट केवल सामान्य कानूनी जागरूकता एवं शैक्षणिक जानकारी के उद्देश्य से है। इसे किसी विशेष मामले में कानूनी सलाह न माना जाए। प्रत्येक मामले में तथ्यों, लागू कानूनों और सैन्य प्रक्रिया के अनुसार स्थिति अलग हो सकती है। कोई भी कानूनी कदम उठाने से पहले योग्य सैन्य कानून विशेषज्ञ या अधिवक्ता से सलाह लेना अनिवार्य रूप से उचित है।
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POCSO CASE में सज़ा हो गई—अब आगे क्या करें?
POCSO केस में सज़ा हो गई है? क्या अब सभी कानूनी रास्ते बंद हो गए? बिल्कुल नहीं—लेकिन अगला कदम सोच-समझकर उठाना ज़रूरी है!
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POCSO केस में सज़ा के बाद अपील, सज़ा निलंबन और ज़मानत के कानूनी विकल्प जानें। सही कदम उठाने से पहले फैसले का कानूनी विश्लेषण करवाएँ।
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⚠️ STRONG LEGAL DISCLAIMER:
यह वीडियो केवल सामान्य कानूनी जागरूकता के उद्देश्य से है, व्यक्तिगत कानूनी सलाह नहीं। किसी भी POCSO मामले में अपील, सज़ा निलंबन या ज़मानत की उपलब्धता संबंधित फैसले, साक्ष्यों, लागू कानून और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। किसी भी कदम से पहले योग्य अधिवक्ता से सलाह लें। किसी परिणाम या ज़मानत की गारंटी नहीं दी जाती। पीड़ित बच्चे की पहचान या उसकी पहचान उजागर करने वाली जानकारी साझा न करें।
POCSO में जमानत नहीं मिल रही? अब आगे क्या कानूनी रास्ते हैं?
“सेशन कोर्ट से जमानत खारिज हो गई, तो क्या सारे रास्ते बंद हो गए? बिल्कुल नहीं—कानून में आगे भी उपाय हो सकते हैं!
याद रखें: सही कानूनी रणनीति के लिए केस डायरी, उपलब्ध साक्ष्य, जमानत खारिज होने के कारण और अदालत के आदेश का सावधानीपूर्वक अध्ययन जरूरी है।
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⚖️ कानूनी जानकारी एवं सहायता के लिए संपर्क करें।
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Disclaimer: यह वीडियो केवल सामान्य कानूनी जागरूकता के लिए है, व्यक्तिगत कानूनी सलाह नहीं। प्रत्येक मामले का परिणाम उसके तथ्यों, साक्ष्यों और लागू कानून पर निर्भर करता है।
आपसी सहमति और समझौते के आधार पर POCSO केस रद्द! आखिर यह कैसे संभव हुआ?
Kerala High Court
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क्या आप जानते हैं कि कुछ विशेष परिस्थितियों में हाई कोर्ट POCSO मामले में FIR रद्द करने की याचिका पर विचार कर सकता है? लेकिन क्या केवल समझौता पर्याप्त है?
इस Reel में जानिए:
⚖️ हाई कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियाँ
⚖️ आपसी समझौते का कानूनी महत्व
⚖️ नाबालिग की सहमति और कानून की स्थिति
⚖️ किन परिस्थितियों में FIR रद्द करने की मांग अस्वीकार हो सकती है?
LEGAL INSIGHT BY DR. ANTHONY RAJU
Advocate, Supreme Court of India
⚠️ LEGAL DISCLAIMER: केवल समझौते से POCSO केस स्वतः रद्द नहीं होता। निर्णय मामले के तथ्यों, साक्ष्यों और लागू कानून पर निर्भर करता है। यह वीडियो केवल कानूनी जागरूकता के लिए है।
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⚖️ **कानूनी जानकारी | चार्जशीट का कॉलम 12: नागरिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय की महत्वपूर्ण सुरक्षा**
**क्या FIR में नाम होने के बावजूद किसी व्यक्ति को पुलिस चार्जशीट में आरोपी के रूप में ट्रायल के लिए पेश नहीं कर सकती?** हाँ। लेकिन कॉलम 12 में नाम होने का कानूनी महत्व क्या है?
भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में चार्जशीट के कॉलम 12 में सामान्यतः उन व्यक्तियों का उल्लेख किया जाता है, जिन्हें जाँच के बाद पुलिस पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण मुकदमे के लिए नहीं भेजती।
🔹 **1. बिना पर्याप्त साक्ष्य के मुकदमे से सुरक्षा**
केवल FIR में नाम होने से कोई व्यक्ति दोषी नहीं हो जाता। जाँच एजेंसी को उपलब्ध साक्ष्यों का निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करना चाहिए।
🔹 **2. पुलिस की राय अंतिम नहीं है**
मजिस्ट्रेट पुलिस की राय से बँधा नहीं होता। यदि पुलिस रिपोर्ट और संबंधित रिकॉर्ड में पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद है, तो न्यायालय लागू कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कॉलम 12 में रखे गए व्यक्ति के विरुद्ध भी कार्यवाही कर सकता है।
🔹 **3. कॉलम 12 में नाम होना बरी होना नहीं है**
कॉलम 12 में नाम दर्ज होना न्यायालय द्वारा दोषमुक्त किए जाने के समान नहीं है। मामले की स्थिति, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर संबंधित व्यक्ति को आगे चलकर आरोपी के रूप में बुलाया जा सकता है।
🔹 **4. मानवाधिकार और निष्पक्ष जाँच**
निष्पक्ष जाँच में शिकायतकर्ता के अधिकारों के साथ-साथ आरोपी के अधिकारों की रक्षा भी आवश्यक है। आपराधिक कार्यवाही कानूनी रूप से प्रासंगिक साक्ष्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल संदेह, दबाव या अपुष्ट आरोपों पर।
⚖️ **महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत:** दोष सिद्ध होने तक निर्दोषता की धारणा और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया आपराधिक न्याय के महत्वपूर्ण आधार हैं। साथ ही, पर्याप्त कानूनी आधार होने पर न्यायालय स्वतंत्र रूप से अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकता है।
**कानूनी दृष्टिकोण:**
**Dr. Anthony Raju**
Advocate, Supreme Court of India
Chairman, All India Council of Human Rights, Liberties & Social Justice (AICHLS)
**अस्वीकरण:** यह पोस्ट केवल सामान्य कानूनी जागरूकता के लिए है, किसी विशेष मामले में कानूनी सलाह नहीं। सही कानूनी स्थिति मामले के तथ्यों, कार्यवाही के चरण, लागू कानून और न्यायिक निर्णयों पर निर्भर करती है। व्यक्तिगत मामले में योग्य अधिवक्ता से सलाह लें।
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⚖️ **SC/ST एक्ट में सजा हो गई? जानिए आपके पास क्या कानूनी रास्ते हैं!**
Helpline 8588872001
अगर किसी व्यक्ति को SC/ST एक्ट के मामले में सजा हो गई है, तो क्या वह कानूनी राहत के लिए आगे कदम उठा सकता है? **हाँ, कानून के अनुसार कुछ विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।**
इस Reel में जानिए:
✅ सजा के खिलाफ अपील कैसे की जा सकती है।
✅ अपील के दौरान जमानत के लिए कब आवेदन किया जा सकता है।
✅ कोर्ट के फैसले में कानूनी गलती होने पर क्या किया जा सकता है।
✅ किन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की जा सकती है।
⚖️ **याद रखें:** अपील करने से सजा अपने आप नहीं रुकती और जमानत मिलना भी निश्चित नहीं है। हर मामले में सही कानूनी कदम उठाना जरूरी है।
🎙️ **Dr. Anthony Raju**
Advocate, Supreme Court of India
📌 **DISCLAIMER | कानूनी अस्वीकरण**
यह वीडियो केवल सामान्य कानूनी जानकारी एवं जन-जागरूकता के लिए है, किसी विशेष मामले में कानूनी सलाह नहीं। कोई कानूनी कदम उठाने से पहले योग्य वकील से विशेषज्ञ सलाह लें। वीडियो देखने या साझा करने से वकील-मुवक्किल का संबंध स्थापित नहीं होता। किसी कानूनी परिणाम की गारंटी नहीं दी जाती।
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क्या है मक्खी जनता पार्टी?
नाम: Makkhi Janta Party (MJP)
चर्चा का कारण: 10 अक्टूबर 2026 की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की एक कथित टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर इस नाम से एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक पहल चर्चा में आई।
पृष्ठभूमि: इससे पहले बेरोजगार युवाओं से जुड़ी कथित टिप्पणी के विरोध में Cockroach Janta Party भी चर्चा में आई थी।
OFFICIAL ANNOUNCEMENT
MAKKHI JANTA PARTY (MJP)
Founder: Dr. Anthony Raju
Advocate, Supreme Court of India
A new voice for public accountability, democratic values, justice and the rights of ordinary citizens.
Founder & Leadership:
Dr. Anthony Raju
Advocate, Supreme Court of India
🌍🏆 A WORLD RECOGNITION OF A LEGAL LEGACY
Dr. Anthony Raju, Advocate, Supreme Court of India & Chairman, National Legal Aid Council, has been honoured with the prestigious World Record of Excellence – England 2025.
The honour recognises his outstanding dedication, exemplary leadership and unwavering commitment to the promotion and protection of Human Rights, along with his contributions towards Justice, Equality and Dignity for All.
📜 Awarded: 16 December 2025
📍 Venue: Bharat Mandapam, New Delhi, India
🏆 World Record of Excellence – England
A distinguished journey in law.
A legacy built on justice.
A life dedicated to humanity.
A recognition that crosses borders. ⚖️🌍
DR. ANTHONY RAJU — A LEGACY OF LAW, JUSTICE & HUMANITY.
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⚖️ PO / PROCLAIMED OFFENDER कैसे घोषित किया जाता है?
क्या पुलिस किसी व्यक्ति को सीधे PO घोषित कर सकती है?
नहीं।
Proclaimed Offender की प्रक्रिया सामान्यतः Court-driven judicial process है। केवल पुलिस के सामने उपस्थित न होने से कोई व्यक्ति अपने-आप PO नहीं बन जाता।
मुख्य प्रक्रिया
Warrant → Execution Attempt → Absconding/Concealment → Judicial Satisfaction → Proclamation → Minimum 30 Days → Proper Publication → Further Statutory Compliance
Defence को विशेष रूप से जांचना चाहिए:
• क्या valid warrant जारी हुआ?
• क्या warrant execute करने का वास्तविक प्रयास हुआ?
• क्या Court ने absconding/concealment पर judicial satisfaction दर्ज की?
• क्या proclamation कानून के अनुसार प्रकाशित हुई?
• क्या कम-से-कम 30 दिन का अवसर दिया गया?
• क्या PO declaration की सभी statutory conditions पूरी हुईं?
BNSS के बाद
1 July 2024 से BNSS लागू है। पुराने Section 82 CrPC का corresponding provision Section 84 BNSS है। इसलिए हर मामले में offence की तारीख और लागू procedural law की जांच आवश्यक है।
🛡️ Defence Point
PO order को केवल एक आदेश के रूप में नहीं, बल्कि उसकी पूरी procedural chain के साथ जांचना चाहिए। किसी mandatory procedural requirement में गंभीर कमी होने पर appropriate legal remedy उपलब्ध हो सकती है।
सवाल हमेशा यह होना चाहिए:
«“क्या PO घोषित करने की पूरी कानूनी प्रक्रिया वास्तव में पूरी हुई थी?”»
LEGAL NOTE
Dr. Anthony Raju
Advocate, Supreme Court of India
Chairman, All India Council of Human Rights, Liberties & Social Justice
Disclaimer: यह पोस्ट केवल सामान्य कानूनी जागरूकता के लिए है और किसी विशेष मामले में legal advice नहीं है। Case-specific advice के लिए संबंधित records की जांच आवश्यक है।
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कभी-कभी दान करने के लिए
मंदिर जाने की जरूरत नहीं होती…
बस किसी अस्पताल की ओर चले जाइए।
वहाँ आपको कोई माँ, कोई पिता,
कोई भाई या बहन
हाथ जोड़कर खड़ा मिल जाएगा।
उसकी आँखों में सिर्फ एक सवाल होगा—
“भगवान… कहीं से इलाज का इंतज़ाम हो जाए।”
ऐसे मरीजों और उनके परिवारों की मदद के लिए
दवाइयों, इलाज, जाँच, ऑपरेशन या अस्पताल के जरूरी खर्च में अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग कीजिए।
आपकी छोटी-सी मदद
किसी गरीब परिवार के लिए बहुत बड़ी राहत बन सकती है।
कभी वह मदद किसी बच्चे का इलाज करा सकती है,
कभी किसी माँ की साँसें बचा सकती है,
और कभी किसी पिता को अपने परिवार के पास वापस ला सकती है।
इसलिए जब भी दान करने का मन हो,
किसी जरूरतमंद मरीज का हाथ थामिए।
अस्पताल में मदद कीजिए।
इलाज के लिए संघर्ष कर रहे परिवार का सहारा बनिए।
क्योंकि मंदिर में दिया गया दान श्रद्धा है,
लेकिन किसी जरूरतमंद की जिंदगी बचाने में दिया गया सहयोग—इंसानियत है।
आइए, अस्पतालों में जरूरतमंद मरीजों की मदद का संकल्प लें।
आपकी छोटी मदद, किसी की बड़ी उम्मीद बन सकती है।
— Dr. Anthony Raju
Advocate, Supreme Court of India
Chairman, All India Council of Human Rights, Liberties & Social Justice
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🇮🇳 जब तक सूरज-चाँद रहेगा, GEN Z तेरी रक्षा करेगा! 🔥
संविधान रक्षा पार्टी — संविधान, न्याय और नागरिक अधिकारों की आवाज़। 🇮🇳⚖️
Dr. Anthony Raju
Advocate, Supreme Court of India
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Matrimonial Dispute में POCSO FIR?
Supreme Court ने महत्वपूर्ण safeguards बताए—Arrest, Expert Evaluation, Section 33 POCSO और Custody के संदर्भ में बड़ा legal insight.
Explained by Dr. Anthony Raju, Advocate, Supreme Court of India.
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⚠️ STRONG LEGAL DISCLAIMER
यह Reel केवल Legal Education & Awareness के उद्देश्य से है। यह किसी व्यक्ति या मामले के लिए legal advice नहीं है। प्रत्येक POCSO मामले का निर्णय उसके अपने facts, evidence और applicable law के आधार पर होता है।
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POCSO Case में FSL Evidence की Custody में एक गलती… Evidence पर सवाल खड़े कर सकती है!
POCSO मामलों में FSL रिपोर्ट और forensic evidence की custody/chain of custody बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। Evidence कहाँ से मिला, किसने सील किया, किसके पास रहा और FSL तक कैसे पहुँचा—इन सवालों का महत्व समझिए।
Legal Awareness by Dr. Anthony Raju, Advocate Supreme Court
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⚠️ LEGAL DISCLAIMER: यह वीडियो केवल सामान्य कानूनी जागरूकता एवं शैक्षिक उद्देश्य के लिए है। यह किसी विशेष मामले में legal advice, defence strategy या professional opinion नहीं है। प्रत्येक मामले के facts और evidence अलग होते हैं। उचित कानूनी सलाह के लिए योग्य अधिवक्ता से परामर्श लें।
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समय और भाग्य—सब अपनी जगह हैं, लेकिन इंसान की असली पहचान उसके कर्मों से होती है।
किस्मत का इंतज़ार मत करो,
कर्म करो और आगे बढ़ो।
अच्छा जीवन संयोग से नहीं,
अच्छे कर्मों, सही सोच और निरंतर प्रयासों से बनता है।
आज का आपका कर्म ही
कल का आपका भाग्य लिखता है।
इसलिए चलते रहिए, संघर्ष करते रहिए और नेक कर्म करते रहिए।
समय बदलेगा, रास्ते खुलेंगे और सफलता जरूर मिलेगी। 🙏
— Dr. Anthony Raju, Advocate Supreme Court
DOWRY DEATH | BAIL REJECTED — THIS IS THE REASON!
Dowry Death केस में Bail Reject क्यों हुई?
जानिए कोर्ट द्वारा माने गए महत्वपूर्ण कानूनी कारण।
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