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Sabeer Bhatia trolls businessmen, attacks economic policy and comments on everything under the sun.
Fine.
But the irony is brutal.
The man judging everyone else has spent nearly 30 years without building another company remotely comparable to the one he co-founded with Jack Smith.
Peak troll energy.
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एक समय था जब सबीर भाटिया की चर्चा तकनीकी दुनिया में होती थी। आज उनकी टिप्पणियां अर्थव्यवस्था, राजनीति, जीडीपी और कर सुधार तक पहुंच चुकी हैं।
कभी आर्थिक विकास पर सवाल, कभी विरासत कर का सुझाव और कभी देश की नीतियों पर टिप्पणी!
लेकिन क्या हर विषय पर राय रखने के साथ उसके सभी पहलुओं का अध्ययन भी जरूरी नहीं?
सोशल मीडिया पर विचार रखना आसान है, लेकिन राष्ट्रीय नीतियों पर सुझाव देते समय आंकड़ों, जमीनी परिस्थितियों और संभावित परिणामों को समझना भी जरूरी है।
आखिर राय और नीति में फर्क तो होता है!
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SABEER BHATIA: FROM HOTMAIL TO HOT TAKES
In 1997, Sabeer Bhatia and Jack Smith co-founded Hotmail, later acquired by Microsoft for a reported $400 million.
A remarkable achievement but a shared one.
Since then, ventures like Arzoo, Jaxtr, InstaColl and Live Documents have failed to replicate Hotmail's global success.
Yet today, Bhatia frequently offers opinions on India's economy, business and taxation, including his controversial 55% inheritance-tax proposal in 2026.
Criticising economic policies is everyone's right. But shouldn't those offering business lectures also face questions about their own entrepreneurial track record?
Only relevance now is targeting Adani, nothing else 🤡
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कहानी में नया मोड़ तब आया जब भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की चर्चा में थी।
मई 2025 में सबीर भाटिया ने जीडीपी के आधार पर विकास का जश्न मनाने पर सवाल उठाए।
उनकी दलील थी कि केवल जीडीपी बढ़ने से आम आदमी की जिंदगी बेहतर होने की गारंटी नहीं मिलती।
यह बहस निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है।
लेकिन क्या रोजगार, निवेश, बुनियादी ढांचा, उत्पादन और लोगों की आय जैसे दूसरे आंकड़ों को भी साथ रखकर चर्चा नहीं होनी चाहिए?
आखिर देश की प्रगति का पूरा आकलन एक ही आंकड़े से कैसे होगा?
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एक पिता ने वर्षों मेहनत करके कारोबार खड़ा किया। बेटे और बेटी ने उसी कारोबार को आगे बढ़ाने की तैयारी की।
लेकिन विरासत में मिलने वाली संपत्ति पर 55% कर का प्रस्ताव सामने आए, तो परिवार के सामने कई सवाल खड़े होंगे।
क्या कारोबार का कुछ हिस्सा बेचना पड़ेगा? क्या निवेश प्रभावित होगा? क्या अगली पीढ़ी कारोबार बढ़ाने के बजाय कर चुकाने की व्यवस्था में उलझ जाएगी?
सबीर भाटिया जी, क्या आपके प्रस्ताव में इन परिस्थितियों का भी समाधान शामिल है?
क्योंकि कारोबार केवल संपत्ति नहीं, कई परिवारों की आजीविका और कर्मचारियों का रोजगार भी होता है।
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फिल्म का पहला भाग सुपरहिट हो जाए तो दर्शक दूसरे भाग का इंतजार जरूर करते हैं!
सबीर भाटिया की Hotmail वाली कहानी भी कुछ ऐसी ही थी।
1996 में शुरुआत, 1997 में Microsoft के साथ बड़ा सौदा और फिर दुनियाभर में पहचान।
लेकिन उसके बाद Arzoo, Jaxtr, InstaColl और Live Documents जैसे कई प्रयासों के बावजूद Hotmail जैसा दूसरा ब्लॉकबस्टर सामने नहीं आया।
सवाल यह नहीं कि हर कारोबार सफल क्यों नहीं हुआ। सवाल यह है कि जब आज दूसरों की आर्थिक सफलता का विश्लेषण हो रहा है, तो अपनी अगली बड़ी कारोबारी उपलब्धि का जिक्र कब होगा?
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दूसरों की विरासत पर कर लगाने की चर्चा तो हो रही है, लेकिन कारोबारी विरासत का सवाल भी कम दिलचस्प नहीं!
सबीर भाटिया की पहचान Hotmail से बनी। Microsoft के अधिग्रहण ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई।
इसके बाद कई नए कारोबार शुरू हुए, लेकिन वैसी दूसरी सफलता नहीं मिली।
अब सवाल यह है कि क्या किसी उद्यमी की असली पहचान केवल उसकी पहली बड़ी उपलब्धि से तय होती है या उसके बाद किए गए कामों से भी?
विरासत केवल संपत्ति की नहीं होती, उपलब्धियों की भी होती है।
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कभी पहचान तकनीक और नवाचार से थी, आज चर्चा अर्थव्यवस्था, राजनीति और कर व्यवस्था पर टिप्पणियों की होती है!
सबीर भाटिया ने Hotmail के जरिए इतिहास रचा, इसमें कोई दो राय नहीं।
लेकिन भारत की आर्थिक नीतियों पर बड़े-बड़े सुझाव देने से पहले उनके पीछे के ठोस आंकड़े और व्यावहारिक समाधान भी सामने आने चाहिए।
पुरानी सफलता सम्मान दिला सकती है, लेकिन हर नई राय की विश्वसनीयता उसके तर्क और प्रमाण से तय होती है।
Hotmail की विरासत अपनी जगह, आज के दावों की कसौटी अपनी जगह!
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मान लीजिए किसी विद्यार्थी के रिपोर्ट कार्ड में एक विषय में शानदार अंक आएं, लेकिन बाकी विषयों का प्रदर्शन सामने ही न हो।
क्या उसे पूरे विद्यालय का परिणाम घोषित करने का अधिकार मिल जाएगा?
सबीर भाटिया की Hotmail वाली उपलब्धि निश्चित रूप से बड़ी थी। लेकिन उसके बाद के कारोबारी प्रयासों का मूल्यांकन भी उतना ही जरूरी है।
जब भारत की अर्थव्यवस्था, विकास और नीतियों पर सवाल उठाए जाते हैं, तो सवाल पूछने वाले के अपने अनुभव और उपलब्धियां भी चर्चा में आएंगी।
सर, रिपोर्ट कार्ड पूरा दिखाइए। सिर्फ सबसे अच्छे विषय के अंक क्यों?
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सबीर भाटिया की पहचान Hotmail से बनी, लेकिन सवाल है कि उसके बाद उनका कौन सा कारोबार दुनिया की तकनीकी दिशा बदल पाया?
Arzoo, Jaxtr, InstaColl और Live Documents जैसे कई उपक्रम शुरू हुए। नए विचार आए, नए प्रयास हुए, लेकिन Hotmail जैसी वैश्विक सफलता दोबारा नहीं मिली।
उद्यमिता में असफल प्रयास कोई अपराध नहीं है। हर नया कारोबार सफल हो, यह जरूरी भी नहीं।
लेकिन जब आप दूसरों की आर्थिक नीतियों और विकास मॉडल पर सवाल उठाते हैं, तो क्या अपनी कारोबारी उपलब्धियों का मूल्यांकन भी स्वीकार करेंगे?
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सबीर भाटिया ने भारत की आर्थिक प्रगति पर सवाल उठाए और फिर चर्चा में एक नया नाम सामने आया।
Infosys के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी Mohandas Pai ने भी उनसे सवाल किया कि विदेश में रहने वाले भाटिया ने भारत की आर्थिक वृद्धि में कितना योगदान दिया?
अब देखिए, बहस केवल जीडीपी तक सीमित नहीं रही।
हालांकि किसी को भारत की नीतियों पर बोलने के लिए देश में रहना जरूरी नहीं है, लेकिन आर्थिक योगदान और विकास पर सवाल उठाना भी चर्चा का हिस्सा हो सकता है।
दूसरों से सवाल पूछिए, लेकिन अपने विचारों पर उठने वाले सवालों को भी जगह दीजिए!
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55% विरासत कर!
सबीर भाटिया जी, यह राष्ट्रीय कर नीति का प्रस्ताव है या कोई इंस्टाग्राम पोल?
खेती की जमीन का क्या होगा? पुश्तैनी मकान का क्या होगा? परिवारों के वर्षों पुराने कारोबार का क्या होगा?
कर में छूट कितनी मिलेगी? निवेश पर क्या असर पड़ेगा? अगली पीढ़ी को पारिवारिक संपत्ति सौंपने का रास्ता क्या होगा?
इतने बड़े आर्थिक बदलाव के लिए केवल एक आंकड़ा बता देना पर्याप्त नहीं है।
देश की कर व्यवस्था कोई सोशल मीडिया प्रयोग नहीं है। इसके लिए विस्तृत आर्थिक मॉडल और जमीनी हकीकत को समझना भी जरूरी है।
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Hotmail के बाद सबीर भाटिया की एक और नई पारी शुरू हुई!
कभी अर्थव्यवस्था पर टिप्पणी, कभी राजनीतिक विश्लेषण, कभी कर सुधार का सुझाव और कभी कॉरपोरेट जगत की आलोचना!
लगता है तकनीकी उद्यमी के बाद अब एक ऑल-इन-वन विचार मंच भी लॉन्च हो चुका है।
मई 2025 में जीडीपी के आधार पर भारत की आर्थिक प्रगति का जश्न मनाने पर सवाल उठाए गए और अक्टूबर 2026 में 55% विरासत कर का प्रस्ताव चर्चा में आ गया।
लेकिन सवाल वही है।
हर बड़े विचार के पीछे ठोस आंकड़े और व्यावहारिक योजना भी है या सिर्फ एक नया हॉट टेक?
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दूसरों की अर्थव्यवस्था का रिपोर्ट कार्ड बनाने से पहले अपना रिपोर्ट कार्ड भी तो खोलिए, सबीर भाटिया जी!
Hotmail की सफलता शानदार थी। Microsoft के साथ बड़ा सौदा भी हुआ।
लेकिन उसके बाद Arzoo, Jaxtr, InstaColl और Live Documents जैसे उपक्रमों का क्या हुआ?
कौन सा नया कारोबार Hotmail जैसी वैश्विक पहचान बना पाया?
असफलता कोई अपराध नहीं है। हर उद्यमी को नए प्रयोग करने का अधिकार है।
लेकिन जब आप दूसरों की आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन करते हैं, तो लोग आपकी कारोबारी यात्रा का हिसाब क्यों न मांगें?
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1996 में Hotmail की शुरुआत और 1997 में Microsoft द्वारा अधिग्रहण। सबीर भाटिया की यह उपलब्धि तकनीकी इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
लेकिन उसके बाद लगभग तीन दशक बीत चुके हैं। तकनीक बदल गई, कारोबार करने के तरीके बदल गए और दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में पहुंच गई।
तो सवाल सीधा है।
आज सबीर भाटिया की पहचान उनकी नई तकनीकी उपलब्धियों से बन रही है या अब भी Hotmail की पुरानी सफलता ही सबसे बड़ा परिचय है?
इतिहास का सम्मान कीजिए, लेकिन वर्तमान उपलब्धियों पर भी चर्चा होनी चाहिए।






















