मेरे मुहल्ले में बड़ा कचरा-पात्र है,ख़ाली रहता है,उसके बाहर दस-बीस मीटर के घेरे में कचरा पड़ा रहता है।इसलिए लोग दुपहिया पर या कार में से कचरे की थैली दूर से ही फेंकते हैं,घेरा बढ़ता जाता है।ये घेरे पूरे देश को अपने घेरे में ले लेंगे और देश अमेरिकी डेटा सेंटर सिर पर उठाए नाचेगा।
Replying to @PrashantProhit
अजी जहाँ रखा होता है भारतीय कौन सा वहीं डालते हैं कचरा. बस उन्हें अपनी गाड़ी, घर से बाहर। कहीं भी फेंक देना होता है.
सफाई से है उन्हें दिक्कत.
बहुत बधाई @hridayeshjoshi और @ShyamMeeraSingh 👏👏👏
भगत सिंह भी।
तिलक भी।
गणेश शंकर विद्यार्थी भी।
न जाने ऐसे कितने ही थे।
आप प्रोटेस्टर नहीं हैं तो पत्रकार हो ही नहीं सकते।
Dear @theliverdoc this is not ‘that’ Indrani you intended (and should) block.😀
Dr Prashant Purohit retweeted
तुम्हारी भारतीयता स्त्री की त्वचा पर आकर क्यों दम तोड़ देती है, समीर? यह बदबू तो पूरे भारत की समीर में घुली हुई है, जो तुम्हारे विचारों के भीतर से आ रही है।
तुम्हारी टिप्पणी पढ़कर सबसे पहले यही सवाल उठता है कि तुम वामपंथ से नहीं, उस युवा स्त्री के साहस से घृणा करते हो, जो तुम्हारी नैतिकता की निर्धारित सीमाओं में रहने से इनकार करती है और लड़ने का साहस दिखाती है? क्योंकि तुम्हारे वाक्य में राजनीतिक आलोचना का एक भी तर्क नहीं है। वहाँ केवल घृणा की दुर्गंध है। और विडंबना देखिए, तुम दूसरों को बदबूदार बता रहे हो!
तुमने filthy, stinky and greasy जैसे शब्द इस्तेमाल किए हैं। क्या यही तुम्हारी महान भारतीय संस्कृति का भाषायी सौंदर्य है? क्या तुम्हारे संस्कार किसी स्वतंत्रचेता युवा स्त्री का सामना करते ही इतने असहाय हो जाते हैं कि तुम्हें उसके विचारों के बजाय उसकी देह, त्वचा और कथित अस्वच्छता पर उतरना पड़ता है?
तुम वामपंथ के आलोचक नहीं, स्त्री की त्वचा में उलझे हुए ऐसे चर्म कीट हो, जिन्हें त्वचा के नीचे धड़कती हुई स्वतंत्र चेतना दिखाई ही नहीं देती।
जिस भारतीयता के तुम स्वयंभू संरक्षक बने फिरते हो, उसकी परंपरा में गार्गी भी है, जिसने याज्ञवल्क्य की दार्शनिक सत्ता को प्रश्नों से चुनौती दी थी। मैत्रेयी भी है, जिसने संपत्ति के मुकाबले ज्ञान का पक्ष चुना था। अक्क महादेवी भी है, जिसने स्त्री की देह पर समाज के स्वामित्व को अस्वीकार कर दिया था। मीराबाई भी है, जिसने कुल-मर्यादा के ठेकेदारों के सामने समर्पण करने के बजाय अपनी स्वतंत्रता का मार्ग चुना।
और आधुनिक भारतीयता में सावित्रीबाई फुले हैं, जिन पर स्त्री-शिक्षा का विरोध करने वाले लोग कीचड़ और गोबर फेंकते थे। तुम्हारी टिप्पणी पढ़कर उसी इतिहास की याद आती है। तब स्त्री के रास्ते में गंदगी फेंकी जाती थी; आज स्त्री को गंदा कहकर उसकी गरिमा पर प्रहार किया जाता है। तरीक़ा बदल गया है, मानसिकता का वंशवृक्ष नहीं।
लेकिन भारतीय इतिहास को केवल गौरवगाथा बनाकर भी नहीं पढ़ा जा सकता। इसी समाज ने स्त्रियों को परदे, पितृसत्ता, बाल-विवाह, जातिगत अनुशासन और पुरुषों की स्वामित्व-भावना से बाँधे रखा। भारतीयता की वास्तविक नैतिक उपलब्धि इन बंधनों में नहीं, उनसे मुक्ति के संघर्ष में है।
भारतीयता का अर्थ किसी युवा स्त्री की त्वचा को घूरना नहीं, उसके व्यक्तित्व के सामने अपनी दृष्टि को सभ्य बनाना है।
वह युवा स्त्री तुम्हारे राजनीतिक विचारों से असहमत हो सकती है। वह वामपंथी हो सकती है, उदारवादी हो सकती है या किसी भी राजनीतिक विचारधारा को अस्वीकार कर सकती है। वह साहसिक हो सकती है, उन्मुक्त हो सकती है, अपने सौंदर्य और शरीर के प्रति निर्भीक हो सकती है। इनमें से किसी बात से तुम्हें उसके अपमान का अधिकार नहीं मिलता।
तुम्हारी समस्या यह है कि तुम्हें स्वतंत्र स्त्री असुविधाजनक लगती है। तुम उसकी निर्भीकता को अस्वच्छता, उसकी असहमति को अभद्रता और उसकी स्वायत्तता को नैतिक पतन की तरह प्रस्तुत करना चाहते हो।
तुम वामपंथ की आलोचना अवश्य करो। दक्षिणपंथ यह नहीं करेगा तो क्या करेगा? लेकिन फिर भी उसके सिद्धांतों, राजनीतिक अंतर्विरोधों और ऐतिहासिक विफलताओं पर जितने चाहो प्रश्न उठाओ। लेकिन एक युवा स्त्री के विरुद्ध घृणासूचक विशेषण इस्तेमाल करके तुम किसी विचारधारा को पराजित नहीं करते। तुम केवल अपनी बौद्धिक निर्धनता प्रदर्शित करते हो।
याद रखो, किसी स्त्री की त्वचा पर तुम्हारी टिप्पणी उसके चरित्र का नहीं, तुम्हारी चेतना के चरित्र का परिचय है।
और अंत में एक बात।
भारतीयता यदि सचमुच तुम्हारे भीतर जीवित है तो वह किसी साहसिक युवा स्त्री को देखकर भयभीत नहीं होगी। वह उसकी स्वतंत्रता में मनुष्य की गरिमा का उत्सव देखेगी।
क्योंकि स्त्री की स्वतंत्रता से डरने वाली संस्कृति महान नहीं हो सकती। और जिस पुरुष की सारी वैचारिक शक्ति किसी स्त्री को गंदा कहने में खर्च हो जाए, उसे राजनीतिक बहस नहीं, अपनी दृष्टि का उपचार चाहिए।
तुम्हें वामपंथ से वैचारिक असहमति है तो विचार लेकर आओ। त्वचा की जाँच करने वाले चर्म विशेषज्ञ बनकर नहीं। आप लोगों के पास अच्छी चीज़ों की आलोचना के अलावा है क्या? अरे, भारत में तो राम भी शिक्षा और नैतिक आचरण के लिए रावण की तरफ देखता है। और यहाँ रावण के से चरित्र जैसे लेकिन रावण के पांडित्य से कोसों दूर लोग ही आज की सीताओं पर कटाक्ष करते हैं।
स्त्री कोई सतह नहीं है, जिस पर तुम अपनी राजनीतिक घृणा की गंदगी पोत दो। वह एक संपूर्ण मनुष्य है। और उसकी गरिमा तुम्हारे पूर्वग्रहों से कहीं अधिक विराट है।
@NehaAisa
Great show today at Leicester @kunalkamra88 and @ShyamRangeela wish you have many more, wish us have many more. 👏👏👏
एम्बुलेंस ≠ महज़ मरीज़ ले जाने का वाहन
एम्बुलेंस = वाहन + ड्राइवर + जीवन-रक्षक उपकरण और दवाएँ + जीवन-रक्षा हेतु trained स्टाफ़
इनमें से एक भी चीज़ नहीं है तो बेकार है।
नीली/लाल बत्ती किसी और गाड़ी पर भी लगाई जा सकती है, ट्रैफ़िक में रास्ता तो उसे भी नहीं मिलेगा।
Indians need prevention from infectious diseases.
Look back at your vaccine policy. You need to add many more.
चंद्रबिंदु (अनुनासिक) महत्वपूर्ण है:
पाँचवाँ
माँ
और हाँ—
सौहार्द्र ✅
सौहार्द ❌
नवरात्रि का पांचवां दिन मां स्कंदमाता के पूजन-अर्चन को समर्पित है। ममता और वात्सल्य की देवी मां के आशीर्वाद से हर परिवार में सदैव स्नेह और सौहार्द बना रहे, यही कामना है।
youtube.com/watch?v=9-glq5Du…
Dr Prashant Purohit retweeted
Deleted scenes from Mr PM 🙂
Hate quoting such petty tweets , but sometimes people need to get a taste of their own medicine.
क़ासिद के आते-आते ख़त एक और लिख रखूँ,
मैं जानता हूँ वो जो लिखेंगे जवाब में।
~ ग़ालिब
क़ासिद = डाकिया
यत्र नार्यस्तु पूजयंते,
रमंते तत्र देवताः।
समझ आया अब इसका मतलब?
यानी जहाँ देखी भरी परात,
वहीं पे नाचे सारी रात।
नारियों को ज़बरदस्ती पूजकर देवी बनाओगे तो देवता आकर उन पर हक़ जताएँगे।
चन्द्रदेव-तारा और इंद्रदेव-अहिल्या के प्रसंग तो याद ही होंगे भक्तो?!

























