Manish Jaiky retweeted
प्रधानमंत्री वही बनेगा इस देश में जिसके साथ उद्योगपति, मीडिया और जनता तीनों होंगे.
OBC SC ST समाज का PM बनने के लिए अभी 100 साल लगेंगे.
जब तक OBC SC ST समाज से कोई अडानी अंबानी जैसा उद्योगपति नही बनता बहुजन समाज से किसी का PM बनना मुश्किल है.
मीडिया भी अब पत्रकार नही, उद्योगपति ही कंट्रोल करते हैं.
OBC SC ST समाज को नौकरी के अलावा बिजनेस में भी ध्यान देना चाहिए. 4 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था में 80% अर्थव्यवस्था पर बहुजनों का आधिपत्य होना चाहिए.
🪳 जब जनता की समस्याएँ सुनने वाला कोई नहीं दिखता,
तो कॉकरोच भी राजनीति में उतर आते हैं!
कॉकरोच जनता पार्टी का संदेश चाहे व्यंग्य हो,
लेकिन बेरोज़गारी, महँगाई और युवाओं की आवाज़ जैसे मुद्दे वास्तविक हैं।
#CockroachJanataParty #CJP #Politics #YouthVoice
#cocroachjantaparty
अपने बड़े लक्ष्यों को छोटी सोच वाले लोगों से दूर रखें।
हर कोई आपकी अनुशासन, आपके सपने और आपकी मेहनत को नहीं समझ पाएगा —
और यह बिल्कुल ठीक है।
कुछ लोग छोटा सोचते हैं,
छोटी बातें करते हैं,
छोटे सपने देखते हैं…
और वे आपको भी उसी मानसिकता में खींचने की कोशिश करेंगे।
लेकिन आपका लक्ष्य ऊँचा है।
आप वह भविष्य बना रहे हैं जिसकी कल्पना भी वे नहीं कर सकते।
इसलिए अपने सपनों की रक्षा करें।
अपने आस-पास ऐसे लोगों को रखें जो विकास, मेहनत और महत्वाकांक्षा पर विश्वास करते हों।
आपकी मेहनत उनकी शंकाओं से ज़्यादा जोर से बोलेगी।
💪 बड़े लक्ष्य के लिए मजबूत मन चाहिए — छोटी सोच की मंजूरी नहीं।
नई दिल्ली: भारत सरकार द्वारा पुराने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को मिलाकर बनाए गए चार नई श्रम संहिताएँ (Labour Codes) एक बार फिर चर्चा में हैं। सरकार का दावा है कि इन संहिताओं का उद्देश्य उद्योगों व श्रमिकों दोनों के लिए नियमों को सरल, आधुनिक और एकीकृत बनाना है, लेकिन श्रमिक संगठनों और कई विशेषज्ञों का मानना है कि नए प्रावधानों से श्रमिक अधिकार सीमित हुए हैं और उद्योगों को अपेक्षाकृत अधिक छूट मिली है।
संसद द्वारा पारित इन चार संहिताओं में शामिल हैं — वेतन संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कामकाज की स्थिति संहिता 2020। सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि इन कानूनों से मजदूरों को एक समान वेतन व्यवस्था, बेहतर सुरक्षा और सामाजिक लाभ मिलेंगे। वहीं, श्रमिक संगठन इसे श्रमिकों पर बढ़ते बोझ और अधिकारों में कटौती के रूप में देख रहे हैं।
वेतन संहिता 2019
वेतन संहिता के तहत पूरे देश में एक समान फ्लोर वेज लागू करने की बात कही गई है। राज्यों को इससे नीचे न्यूनतम मजदूरी तय करने की अनुमति नहीं होगी। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि न्यूनतम वेतन निर्धारण प्रक्रिया में श्रमिकों की भागीदारी कम हो गई है और फ़्लोर वेज की परिभाषा अस्पष्ट है।
औद्योगिक संबंध संहिता 2020
इस संहिता को लेकर सबसे अधिक विवाद है। नए प्रावधानों के अनुसार 300 तक कर्मचारियों वाले उद्योग अब बिना सरकारी अनुमति के छंटनी और बंदी कर सकेंगे, जो पहले केवल 100 तक सीमित था। हड़ताल के अधिकार को भी कठोर नियमों के तहत रखा गया है, जिससे श्रमिक संगठनों को झटका माना जा रहा है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020
यह संहिता PF, ESI और मातृत्व लाभ सहित कई पुराने कानूनों को एकीकृत करती है। इसमें पहली बार gig workers और platform workers को सामाजिक सुरक्षा की परिभाषा में शामिल किया गया है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा लाभों का बड़ा हिस्सा स्वैच्छिक योगदान पर आधारित होने से इसकी प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
व्यावसायिक सुरक्षा व स्वास्थ्य संहिता
नई संहिता के तहत 12 घंटे तक की शिफ्ट की अनुमति दी गई है, हालांकि सप्ताह में कुल 48 घंटे की सीमा यथावत रखी गई है। बड़े उद्योगों में सुरक्षा अधिकारी अनिवार्य किए गए हैं, लेकिन छोटे उद्योगों पर निगरानी कम होने की आशंका जताई जा रही है।
श्रमिक संगठनों की चिंताएँ
मजदूर यूनियनों का कहना है कि नई संहिताओं से नौकरी की सुरक्षा कमजोर, यूनियन की ताकत कम और हड़ताल लगभग असंभव हो गई है। कार्यस्थल पर बढ़ते खतरे और लंबे कार्य घंटे को भी गंभीर समस्या के रूप में देखा जा रहा है।
उद्योगों के लिए राहत
उद्योग संगठनों ने नए कानूनों का स्वागत किया है। उनका मानना है कि एकल रजिस्ट्रेशन, कम अनुपालन और ज्यादा लचीले नियमों से निवेश वातावरण बेहतर होगा और रोजगार सृजन बढ़ेगा।
हालांकि चारों संहिताएँ पारित हो चुकी हैं, लेकिन इनका पूर्ण क्रियान्वयन अभी तक देशभर में लागू नहीं हुआ है। राज्यों के नियम तैयार होने बाकी हैं। श्रमिक समूहों का कहना है कि इन संहिताओं पर जल्दबाज़ी नहीं होनी चाहिए और मजदूर हितों को ध्यान में रखकर व्यापक सुधार किए जाने चाहिए।
समग्र रूप से देखें तो श्रम संहिताएँ भारत के श्रम ढांचे में बड़ा बदलाव लाने की क्षमता रखती हैं, लेकिन यह बदलाव कितनी संतुलित दिशा में जाएगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।
नई दिल्ली: भारत सरकार द्वारा पुराने 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को मिलाकर बनाए गए चार नई श्रम संहिताएँ (Labour Codes) एक बार फिर चर्चा में हैं। सरकार का दावा है कि इन संहिताओं का उद्देश्य उद्योगों व श्रमिकों दोनों के लिए नियमों को सरल, आधुनिक और एकीकृत बनाना है, लेकिन श्रमिक संगठनों और कई विशेषज्ञों का मानना है कि नए प्रावधानों से श्रमिक अधिकार सीमित हुए हैं और उद्योगों को अपेक्षाकृत अधिक छूट मिली है।
संसद द्वारा पारित इन चार संहिताओं में शामिल हैं — वेतन संहिता 2019, औद्योगिक संबंध संहिता 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कामकाज की स्थिति संहिता 2020। सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि इन कानूनों से मजदूरों को एक समान वेतन व्यवस्था, बेहतर सुरक्षा और सामाजिक लाभ मिलेंगे। वहीं, श्रमिक संगठन इसे श्रमिकों पर बढ़ते बोझ और अधिकारों में कटौती के रूप में देख रहे हैं।
वेतन संहिता 2019
वेतन संहिता के तहत पूरे देश में एक समान फ्लोर वेज लागू करने की बात कही गई है। राज्यों को इससे नीचे न्यूनतम मजदूरी तय करने की अनुमति नहीं होगी। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि न्यूनतम वेतन निर्धारण प्रक्रिया में श्रमिकों की भागीदारी कम हो गई है और फ़्लोर वेज की परिभाषा अस्पष्ट है।
औद्योगिक संबंध संहिता 2020
इस संहिता को लेकर सबसे अधिक विवाद है। नए प्रावधानों के अनुसार 300 तक कर्मचारियों वाले उद्योग अब बिना सरकारी अनुमति के छंटनी और बंदी कर सकेंगे, जो पहले केवल 100 तक सीमित था। हड़ताल के अधिकार को भी कठोर नियमों के तहत रखा गया है, जिससे श्रमिक संगठनों को झटका माना जा रहा है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020
यह संहिता PF, ESI और मातृत्व लाभ सहित कई पुराने कानूनों को एकीकृत करती है। इसमें पहली बार gig workers और platform workers को सामाजिक सुरक्षा की परिभाषा में शामिल किया गया है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा लाभों का बड़ा हिस्सा स्वैच्छिक योगदान पर आधारित होने से इसकी प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
व्यावसायिक सुरक्षा व स्वास्थ्य संहिता
नई संहिता के तहत 12 घंटे तक की शिफ्ट की अनुमति दी गई है, हालांकि सप्ताह में कुल 48 घंटे की सीमा यथावत रखी गई है। बड़े उद्योगों में सुरक्षा अधिकारी अनिवार्य किए गए हैं, लेकिन छोटे उद्योगों पर निगरानी कम होने की आशंका जताई जा रही है।
श्रमिक संगठनों की चिंताएँ
मजदूर यूनियनों का कहना है कि नई संहिताओं से नौकरी की सुरक्षा कमजोर, यूनियन की ताकत कम और हड़ताल लगभग असंभव हो गई है। कार्यस्थल पर बढ़ते खतरे और लंबे कार्य घंटे को भी गंभीर समस्या के रूप में देखा जा रहा है।
उद्योगों के लिए राहत
उद्योग संगठनों ने नए कानूनों का स्वागत किया है। उनका मानना है कि एकल रजिस्ट्रेशन, कम अनुपालन और ज्यादा लचीले नियमों से निवेश वातावरण बेहतर होगा और रोजगार सृजन बढ़ेगा।
हालांकि चारों संहिताएँ पारित हो चुकी हैं, लेकिन इनका पूर्ण क्रियान्वयन अभी तक देशभर में लागू नहीं हुआ है। राज्यों के नियम तैयार होने बाकी हैं। श्रमिक समूहों का कहना है कि इन संहिताओं पर जल्दबाज़ी नहीं होनी चाहिए और मजदूर हितों को ध्यान में रखकर व्यापक सुधार किए जाने चाहिए।
समग्र रूप से देखें तो श्रम संहिताएँ भारत के श्रम ढांचे में बड़ा बदलाव लाने की क्षमता रखती हैं, लेकिन यह बदलाव कितनी संतुलित दिशा में जाएगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।
मुस्कान के गर्भ में पल रहा बच्चा आखिर किसका है?
मुस्कान के गर्भस्थ शिशु के पितृत्व को लेकर कई तरह की चर्चाएँ सामने आ रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मुस्कान जैसी औरतों को चाहिए क्या?
जिस साहिल के साथ मिलकर मुस्कान ने सौरभ को मौत के घाट उतार दिया, उन दोनों में तो ज़मीन-आसमान का फर्क था!
सौरभ सभ्य, शिक्षित और विदेश में अच्छी नौकरी पर था, जबकि साहिल नशेड़ी, बेरोज़गार और आवारा था।
सौरभ एक संभ्रांत परिवार से आता था, जबकि साहिल का ठिकाना टूटी-फूटी दीवारों वाला घर था।
सौरभ नशे से कोसों दूर था, जबकि साहिल का कमरा शराब की बोतलों से भरा पड़ा था।
सौरभ देखने में स्मार्ट और सुलझा हुआ था, वहीं साहिल तो दूर से ही चरसी और लफंगे की तरह दिखता था।
इतना परफेक्ट इंसान छोड़कर एक घटिया शराबी का साथ? आखिर ऐसी औरतों की सोच में इतना ज़हर क्यों? क्या यह सिर्फ अंधा आकर्षण है या समाज में नैतिकता का पतन?
एक बार फिर यह घटना साबित करती है कि कभी-कभी प्यार नहीं, जुनून इंसान को अंधा बना देता है… और अंजाम? बर्बादी!
अरुणाचल प्रदेश की एक भारतीय महिला को चीन के अधिकारियों ने पूरे 18 घंटे शंघाई एयरपोर्ट पर बंधक बनाए रखा और ऊपर से हिम्मत देखिए,
उसे कह दिया कि - अरुणाचल प्रदेश तो चीन का हिस्सा है, भारतीय पासपोर्ट अवैध है, जाओ चीन का पासपोर्ट बनवाओ!
यह सरासर धौंस, बदतमीज़ी और भारत की संप्रभुता पर खुली चोट है।
अब सवाल ये है - क्या मोदी सरकार इस शर्मनाक हरकत पर चीन को लाल आँख दिखाएगी, या फिर हमेशा की तरह - हम चिंता व्यक्त करते हैं वाला बयान देकर मामला ठंडा कर देगी?
सपा प्रवक्ता मनोज यादव जी पर जातिगत टिप्पणी करना, उन्हें धमकी देना और गाली-गलौज करना अत्यंत निंदनीय कृत्य है।
टीवी डिबेट में भाजपा के प्रवक्ताओं द्वारा सपा नेताओं पर तरह-तरह की अभद्र टिप्पणियाँ की जाती हैं,
लेकिन जैसे ही एक सपाई ने जवाब दिया,
उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हुआ और मामला तूल पकड़ लिया।
विडियो में आप देख सकते हैं।
दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र | फिल्म डायरेक्टर करण जौहर ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया -
यह एक युग का अंत है... एक बहुत बड़ा मेगा स्टार... वह इंडियन सिनेमा के एक असली लेजेंड हैं और हमेशा रहेंगे...
वे सिनेमा के इतिहास के पन्नों में परिभाषित और समृद्ध रूप से मौजूद रहेंगे..."
#DharmendraDeol
बिहार में तेजस्वी यादव की सरकारी नौकरी नहीं चाहिए…
महाराष्ट्र की प्राइवेट नौकरी चाहिए — मज़े लो!
बिहारी बॉस: ऑफिस क्यों नहीं आती?
महिला कर्मचारी: मैं मराठी हूँ, ये महाराष्ट्र है… यहाँ तुम बिहारियों की नहीं चलेगी!
फिर राज ठाकरे की पार्टी के कुछ लोगों ने आकर उस बिहारी बॉस से मारपीट की और चले गए।
काश… महाराष्ट्र में BJP की सरकार होती तो ऐसे दुस्साहस की किसी की हिम्मत ही नहीं पड़ती! RJD का ये सारी बातें कहना है....
लोकतंत्र दस हज़ार रुपये में बिकता है,
यह बिहार में देखने को मिलता है।
#BiharElections
#NDA
Manish Jaiky retweeted
Election का विपक्ष को Boycot करना चाहिए ।
बिहार में वोट चोरी हुआ है ,
ECI को निष्पक्ष चुनाव करवाना होगा ।
#BiharElection2025
👇
दुलारचंद यादव ने अपनी कुर्बानी तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने या किसी यादव को विधायक बनाने के लिए नहीं दी थी।
उन्होंने अपनी जान धानुक (कुर्मी) समाज के एक युवा नेता पीयूष प्रियदर्शी को विधायक बनाने के लिए दी थी।
दुलारचंद यादव, जन सुराज के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के साथ चुनाव प्रचार में थे -
यानी वो जाति से ऊपर उठकर एक नए नेतृत्व को उभारने निकले थे।
पर राजनीति बड़ी बेरहम होती है...
हमेशा वही व्यक्ति मारा जाता है जो ईमानदार और कच्चे दिल वालों के साथ खड़ा रहता है।
एक तरफ़ NDA से अनंत सिंह, दूसरी तरफ़ सूरजभान सिंह,
और बीच में दुलारचंद यादव - एक नए लड़के के साथ खड़े थे।
अब सवाल ये है 👇
दुलारचंद यादव की हत्या हो गई,
पर क्या पीयूष प्रियदर्शी या प्रशांत किशोर ने बदले में एक पत्थर तक फेंका?
नहीं!
इतना लंबा काफिला, सैकड़ों समर्थक,
फिर भी न कोई वीडियो, न कोई फोटो सामने आया।
पीयूष खुद ने कहा कि “काफिले पर पत्थर चले”,
तो सवाल है -
इतने लोगों में किसी का कैमरा ऑन क्यों नहीं था?
आज के दौर में क्या कोई नेता बिना मोबाइल रिकॉर्डिंग के चलता है?
कहीं ये सत्य और सियासत के बीच की सबसे बड़ी चुप्पी तो नहीं?
खैर…
यादव कौम जज़्बाती है,
और चुनाव के वक्त चुप रहना ही समझदारी है।
एक कहावत भी है -
“यादव साठ साल तक खटिया सोनहाता है, लेकिन जब उठता है तो ज़मीन हिला देता है।”
#DularchandYadav #PiyushPriyadarshi #PrashantKishor #KhesariLalYadav #TejashwiYadav #BiharElections #Bihar2025
जो भी प्रत्याशी महागठबंधन से घोषित हो, उसे समय रहते स्वीकार कर लो साथियों।
वरना देर हो जाएगी, और फिर अगले 5 साल तक बस “जनुआ RJD लवर” बजाकर नाचते रहना पड़ेगा। 💚🟢💐✅
Manish Jaiky retweeted
ब्लूटिक वाले ऐसे साथी जिनके 500 से कम फॉलोअर हैं वो रीट्वीट करके कमेंट कर दें।
रात 11 बजे प्रमोशन किया जाएगा।
अभी कुछ दिन पहले हमने कहीं पढ़ा था कि सुधीर चौधरी करोड़ों के मालिक हैं।
अब उन्हें एक मदद का पत्र मिला है, और वे उसी को सोशल मीडिया पर डालकर लोगों से अपील कर रहे हैं।
अरे, आप तो इतने सक्षम हैं कि उस व्यक्ति की पूरी पढ़ाई का खर्चा खुद उठा सकते हैं।
अगर सोशल मीडिया से ही मदद मांगनी होती, तो वह व्यक्ति आपको पत्र क्यों लिखता?
एक लोकल यूट्यूबर भी उसकी समस्या को वायरल कर देता,
और मैं दावे से कहता हूँ - आपके अपील से ज़्यादा लोग उस लोकल यूट्यूबर की अपील पर भावुक होकर मदद कर देते।
मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि दर्शक आज के ज़माने में भी हाथ से लिख कर पत्र भेजते हैं।ये चिठ्ठी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में एक गरीब किसान की है जिसका बेटा कक्षा 8 में पढ़ता है।ये बच्चा बड़ा होकर वैज्ञानिक बनना चाहता है।लेकिन आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण बच्चे को पढ़ाई में परेशानी आ रही है।मैं आप सबसे मदद की अपील करता हूँ।हम चाहें तो इस गरीब किसान का सपना पूरा हो सकता है।
Manish Jaiky retweeted
नचनिया गवानिया को राजनीति से दूर रहना चाहिए।
#BiharElection2025


























