महाड़ सत्याग्रह का यह सौवां साल है। वर्ष 1927 में डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में पीने के लिए पानी पर हक का सत्याग्रह नहीं होता तो क्या 1930 में महात्मा गांधी दांडी मार्च यानी नमक सत्याग्रह के लिए प्रेरित होते? पढ़ें, अनिल चमड़िया का यह आलेख
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जिस तरह दुर्गा की आराधना करने वालों को अपनी आस्था के प्रदर्शन का अधिकार है, उसी तरह महिषासुर को अपना पूर्वज मानने वाले समुदायों को भी अपनी सांस्कृतिक स्मृति व्यक्त करने का अधिकार है। बता रहे हैं गिरिजेश्वर प्रसाद
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दीक्षा भूमि नागपुर समागम में फॉरवर्ड प्रेस के स्टाल G-111A पर आप सभी प्रबुद्ध पाठकों का स्वागत (तारीख 19-21 अक्टूबर, 2026) – at Delhi, India
1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान विस्थापित हुए सिंधी शरणार्थियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की स्थिति सामाजिक, आर्थिक और कानूनी रूप से अत्यधिक जटिल और संवेदनशील थी। बता रहे हैं जितेंद्र मेघवाल
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दीक्षा भूमि नागपुर समागम में फॉरवर्ड प्रेस के स्टाल G-111A पर आप सभी प्रबुद्ध पाठकों का स्वागत (तारीख 19-21 अक्टूबर, 2026) – at Nagpur, India
रामजी यादव की कहानी ‘लोकविद्याधर’ लोककला के क्षरण, पारंपरिक कारीगर जातियों के रोजगार-संकट, बाजार के अमानवीय दबाव और जाति-वर्ग से निर्मित सामाजिक दूरी को एक ही कथासूत्र में पिरोती है। बता रहे हैं अरुण नारायण
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Unike the Ramayana or the Mahabharata, my novel draws on the world’s oldest city – Harappa – in the Sindhu river basin that existed around 3000 BCE, as proven by excavations and DNA studies, writes Kancha Ilaiah Shepherd
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अभी हाल तक प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एक फोटोग्राफर की तस्वीर लगी थी, जिसमें दिखता था कि आम प्रदर्शनकारी संसद परिसर के अंदर संसद सदस्यों के लिए लोकसभा और राज्यसभा के जाने वाले मुख्य दरवाजे के बाहर खड़े होकर नारे लगा रहे हैं। बता रहे हैं अनिल चमड़िया
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डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रकाशित कृतियां भाषा-विज्ञान, साहित्यालोचना, इतिहास-बोध, लोकसंस्कृति तथा बहुजन विमर्श के विविध आयामों को अपने आप में समेटी हुईं हैं। बता रहे हैं हरेराम सिंह
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#Deeksha_Diwas #Ambedkar
Ambedkar combined fearless and trenchant criticism of religion with a deep sympathy and understanding of it, writes Prathama Banerjee forwardpress.in/2017/05/ambe… – at Delhi, India
REPOST #Deeksha_Diwas #Ambedkar Ambedkar said that religious conversion had to be realized on real foundations, and without public consensus, conversion of any sort couldn’t be implemented, writes Aniket Gautam forwardpress.in/2024/10/how-… – at Noida, India
REPOST #Deeksha_Diwas #Ambedkar Babasaheb Ambedkar took on a mission to embrace Buddhism through multiple ceremonies, which took a heavy, irreparable and devastating toll on his health, writes Dr S.P.V.A Sairam forwardpress.in/2025/10/how-… – at Noida, India
राष्ट्रपति के अधिकारिक भाषण को तैयार करने में राष्ट्रपति का कार्यालय मुख्य रूप से शामिल होता है। लेकिन एक नागरिक के रूप में राष्ट्रपति की प्रतिक्रिया की भाषा शिकायत व आरोप का खंडन नहीं करने के रूप में भी हो सकती है। बता रहे हैं अनिल चमड़िया
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Rupi Soren used to run her household with the help of her mother-in-law, Sonamani, and the wife of Shibu’s elder brother, Rajaram. Whether it was police raids or threats by moneylenders, she faced them stoutly, says Vinod Kumar forwardpress.in/2026/10/obit…
अगर विश्वविद्यालय में दिखाई देने वाला जातिवाद आसमान से नहीं टपका है, बल्कि यह समाज में मौजूद जातिवाद का ही विस्तार है, तो फिर जाति के प्रश्न को समाज और परिवार तक ले जाने में उपन्यासकार उदय प्रकाश ने क्यों दिलचस्पी नहीं ली? पढ़ें, अभय कुमार की यह समालोचना
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लगभग सभी धर्म राजसत्ता से सांठ-गांठ कर, शक्ति-केंद्रों में बदलते चले गए। जैन तथा बौद्ध धर्म ने भी यही किया। आजीवक पिछड़ते गए। सच तो यह है कि इस स्पर्धा में वे कभी थे ही नहीं। पढ़ें, ओमप्रकाश कश्यप के आलेख का पहला भाग
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बैठक में मांग की गई कि वर्ष 2027 की जनगणना में ओबीसी के लिए स्वतंत्र एवं पृथक कॉलम शामिल किया जाए। इसके अलावा जातियों की ड्रॉप-डाउन सूची तैयार की जाए, ताकि जातिवार आंकड़ों का व्यवस्थित संकलन हो सके। पढ़ें, यह खबर
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डॉ. आंबेडकर के मुताबिक, यह अजीब बात है कि भारत में व्यापारी समुदाय को होने वाली परेशानियों को कम करने के लिए कोई गंभीर कोशिश नहीं की गई। कागज़ी मुद्रा में सुधार या स्वतंत्र कोषागार प्रणाली को खत्म करने से हालात बेहतर हो सकते थे ...
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REPOST #DeathAnniversary
ऐसे समय में जब बसपा का जनाधार न्यून होता जा रहा है, कांशीराम की नीतियों के बारे में सोचना आवश्यक हो जाता है। कांशीराम द्वारा ‘इंडिया न्यूज़’ के पत्रकार रजत शर्मा को दिए एक इंटरव्यू की याद आती है। पढ़ें, रवि संभरवाल का यह आलेख
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कवि सवाल करता है कि ‘फिर चमारीखेड़ा के नाम में ऐसा क्या चुभ गया, जो लोगों को रास नहीं आता’। तथाकथित ऊंची जाति वालों को यह नाम लगातार चुभता रहा, क्योंकि उन्हें अपने गांव का नाम चमारीखेड़ा बतलाना पड़ता था। पढ़ें, डॉ. सिद्धार्थ रामू की यह समीक्षा
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