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हिंदुत्व का मुखौटा और सत्ता की राजनीति
नरेंद्र मोदी और भाजपा ने हिंदुत्व के नाम पर एक लंबी राजनीतिक यात्रा तय की। हिंदू अस्मिता, सुरक्षा और सम्मान के सवालों को चुनावी राजनीति के केंद्र में रखा गया और करोड़ों हिंदुओं का समर्थन हासिल किया गया। लेकिन अब सवाल भाजपा से ही पूछना होगा सत्ता के इतने वर्षों बाद हिंदुत्व के उस एजेंडे का क्या हुआ, जिसके नाम पर वोट माँगे गए थे?
मोदी को हिंदुत्व का सबसे बड़ा चेहरा बनाया गया। लेकिन हिंदुओं ने जो संघर्ष दशकों तक खुद लड़े, उनका राजनीतिक श्रेय मोदी और भाजपा ने अपने खाते में डाल लिया। सत्ता मिलने के बाद क्या वही भाजपा हिंदू हितों के हर मुद्दे पर उतनी ही दृढ़ दिखाई दी?
सत्ता में आए तो एससी-एसटी एक्ट को और मजबूत किया, गौसेवकों पर कार्रवाई हुई, जातीय राजनीति बढ़ी और जिन सवर्णों ने मोदी का सबसे मुश्किल दौर में भी अंध-समर्थन किया, उन्हीं की राजनीतिक अनदेखी होती गई।
दूसरी तरफ, जिन अंबेडकरवादी ताकतों ने दिन-रात मोदी और भाजपा को गालियाँ दीं, उन्हें साधने की राजनीति क्यों दिखाई देने लगी?
और यहीं से मोदी सरकार की राजनीति का दूसरा चेहरा सामने आता है।
जिस तुष्टिकरण की राजनीति के लिए कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को भाजपा वर्षों तक घेरती रही, क्या सत्ता में आने के बाद भाजपा ने भी चुनावी जरूरत के हिसाब से वही सामाजिक और जातीय समीकरण साधने शुरू नहीं कर दिए?
कभी हिंदुत्व का मुद्दा, कभी जातीय समीकरण, कभी सामाजिक न्याय, कभी अंबेडकर हर चुनाव में नए राजनीतिक प्रतीक और नए वोट-बैंक। सवाल यह है कि क्या विचारधारा अब भी केंद्र में है, या सत्ता में बने रहने के लिए हर संभव राजनीतिक समीकरण साधना ही भाजपा की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन चुका है?
अटल-आडवाणी की जिस वैचारिक विरासत के सहारे भाजपा ने अपनी पहचान बनाई, क्या मोदी के दौर में वह पहचान सत्ता-केंद्रित राजनीति में बदल गई है?
अगर हिंदुत्व केवल चुनाव के समय सबसे बड़ा मुद्दा बनता है और सत्ता मिलने के बाद राजनीतिक सुविधा के अनुसार पीछे चला जाता है, तो फिर भाजपा को यह स्पष्ट करना चाहिए कि हिंदुत्व उसकी विचारधारा है या चुनावी रणनीति?
और सबसे बड़ा सवाल—
पहले हिंदुओं को मुसलमानों के नाम पर एकजुट करो, फिर हिंदुओं को जातियों में बाँटो, फिर उन्हीं जातीय समीकरणों के आधार पर टिकट और सत्ता का गणित बनाओ और हर बार इसे राष्ट्रवाद या हिंदुत्व का नाम दे दो।
मोदी और भाजपा को अब इस सवाल से बचना नहीं चाहिए
हिंदुओं से वोट हिंदुत्व के नाम पर लिया गया था तो सत्ता में हिंदू हित प्राथमिकता पर क्यों नहीं दिखते?
हिंदू समाज को अब भाषण नहीं, हिसाब चाहिए।
क्योंकि सत्ता पाने के लिए हिंदुत्व का इस्तेमाल करना आसान है लेकिन सत्ता में रहकर उसी हिंदुत्व के सिद्धांतों पर कायम रहना असली परीक्षा है।
अब समय है सवाल पूछने का
किसी नेता का अंध-समर्थक मत बनो, लोकतंत्र का जागरूक नागरिक बने।
न मोदी सर्वोपरि हैं, न भाजपा सर्वोपरि है—सर्वोपरि जनता का हित, संविधान और देश है।
इसलिए सवाल पूछिए।
वादों का हिसाब माँगिए।
नीतियों की समीक्षा कीजिए।
और चुनाव के समय केवल नारे नहीं—काम, नीति और जवाबदेही को अपना पैमाना बनाइए।
शेर अब आदमखोर हो चुका है, जो उसे राजा बनाकर सिंहासन तक लाए थे, आज वही उसका शिकार बन रहे हैं।
अब सिंहासन पर चाहे सूअर बैठे या गीदड़, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता…
जब मुख्यमंत्री ही SC/ST एक्ट का दुरुपयोग कर सकता है, तो सोचिए आम जनता किस हद तक इसका दुरुपयोग कर रही होगी!
एक देश में दो कानून कब तक चलेंगे? संविधान सबको समान न्याय का अधिकार देता है, फिर कानून के दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए समान और सख्त नियम क्यों नहीं?
#SCSTAct
बीजेपी बलात्कारियों और भ्रष्टाचारियों से भरी पड़ी है!
बीजेपी के राज में सामान्य वर्ग के लोगों को न्याय मिलने की उम्मीद आखिर कैसे करें, जब न्याय भी जाति और वोट बैंक की राजनीति में उलझा नजर आता है?
वोट बैंक की राजनीति में किसी एक वर्ग को खुश करने के लिए अंबेडकर भक्त मोदी कुछ भी करेगा।
#Ankitabhandai
क्या चल रहा है इस देश में, भाई साहब? 💔
बहुत उम्मीदें थीं मोदी से, लेकिन आज देश के हालात देखकर निराशा होती है।
पलवल में SC/ST एक्ट के कथित दुरुपयोग को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। कुछ लोग निजी स्वार्थ के लिए पूरे देश में को SC/ST एक्ट का दुरुपयोग करके निर्दोष लोगों को झूठे मामलों में फँसा रहे हैं।
आख़िर ऐसे लोगो के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? उनके हौसले इतने बुलंद क्यों हैं?
#UGCRollback #SCSTAct
SHAME ON YOU, BJP
मोदी तुम शर्म करो! देश जवाब मांग रहा है।
अंकिता भंडारी को न्याय कब मिलेगा?
अंकिता को न्याय दो, दोषियों को सज़ा दो!
#JusticeForAnkitaBhandari #ShameOnBJP
कक्षा 12 में 88% स्कोर करने के बावजूद, अंकिता भंडारी केवल 10 हज़ार प्रति माह की नौकरी कर रही थी क्योंकि उनके उच्च जाति के पिता एक सिक्योरिटी गार्ड थे और उनकी मां एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता थीं।
अपनी दोस्त से उसके आख़िरी शब्द थे... मैं गरीब हो सकती हूं, लेकिन मैं खुद को 10000 रुपए में नहीं बेचूंगी 🥲
जय हो मोदी एक्ट की!
24 घंटे के भीतर दूसरी वारदात।
#SCSTAct
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मोदी जी, EWS के नाम पर सवर्णों को 10% का लॉलीपॉप तो दिया, लेकिन आर्थिक राहत, सस्ती शिक्षा और कोचिंग का क्या?
क्या सवर्णों को भी वही सुविधा मिल रही जो दूसरो को मिल रही?
सबके लिए आयोग है, बस सामान्य वर्ग के लिए कोई आयोग नही है। ऐसा भी नहीं है कि सामान्य वर्ग के लिए आयोग बना देने से सरकार का वोट बैंक खिसक जाएगा, लेकिन सच्चाई यही है कि सरकार की मंशा ही नही है।
MP में SC/ST आरक्षण 36% और OBC आरक्षण 14% है। OBC आरक्षण को 27% करने के लिए 50% की सीमा तोड़ने की लड़ाई चली, जिस पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी!
SC/ST आरक्षण कम करने की बात कोई नहीं करेगा, सामान्य वर्ग नाराज़ होता है तो हो जाए!
पक्ष हो या विपक्ष, दोनों को सामान्य वर्ग से कोई मतलब नहीं! न देश की चिंता, न मेरिट की परवाह, इन्हें सिर्फ़ कुर्सी से मतलब है।
India needs #MERIT now, more than ever
14 मुकदमे, 42 लाख का मुआवज़ा और हर महीने 42 अदालतों के चक्कर! सोचिए एक इंसान की ज़िंदगी पर क्या गुजरती होगी।
मोदी से नफ़रत की वजह सिर्फ़ इतनी है कि जिसको हमने इतना समर्थन दिया, उसी ने हमें सबसे बड़ा झटका दिया।
SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता के बावजूद कानून को और सख़्त करने वाले कदम उठाए गए। अब UGC के नए नियमों को लेकर भी वही डर और सवाल खड़े हो रहे हैं।
आख़िर कब तक एक देश में दो क़ानून चलेंगे ?
हमने बीजेपी को वोट दिया था बेहतर भविष्य के लिए, अपने ही भविष्य को लेकर डरने के लिए नहीं!













