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भारत के समाजवादी आंदोलन के इतिहास को ईमानदारी से देखने पर एक असहज सवाल सामने आता है कि क्या समाजवादियों ने वास्तव में सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के मूल ढांचे को बदलने की लड़ाई लड़ी, या उनका संघर्ष सत्ता प्राप्ति तक ही सिमित रहा?
राममनोहर लोहिया का गैर-कांग्रेसवाद कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ने की रणनीति था 1967 में इसी रणनीति के तहत समाजवादी दलों और जनसंघ सहित वैचारिक रूप से अलग-अलग दलों ने कई राज्यों में संयुक्त सरकारें बनाईं।
जेपी आंदोलन ने भ्रष्टाचार और सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया। लेकिन इसी दौर में RSS और जनसंघ भी जनता पार्टी की व्यापक विपक्षी एकता का हिस्सा बने कुछ इतिहासकारों का तर्क है कि इस साझेदारी ने जनसंघ/RSS को व्यापक राजनीतिक वैधता और राष्ट्रीय मुख्यधारा में जगह बनाने में मदद की।
समाजवादियों का भारत में कट्टर हिन्दुत्ववादी संगठनों को स्थापित करने व मजबूती देने में बड़ा योगदान रहा है, कांग्रेस के साथ ही भारत के समाजवादियों ने कभी भी व्यवस्था परिवर्तन की राजनीति नहीं की, ये हमेशा अवसर वादी रहे चाहे वह लोहिया, जेपी रहे हो या आज के समाजवादी हो, वह सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे हैं न कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं!
जो लोग दशकों से समाजवादी विचारधारा, सामाजिक न्याय, पिछड़ों-दलितों-अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व और संगठन के लिए पार्टी में संघर्ष कर रहे, उनकी राजनीतिक और वैचारिक पूंजी का मूल्यांकन किस कसौटी पर होगा?
क्या राज्यसभा उन लोगों के लिए नहीं होनी चाहिए जो संसद के उच्च सदन में समाजवादी विचारों, सामाजिक न्याय, आरक्षण, जातीय जनगणना, शिक्षा, रोजगार और वंचित समाज की आवाज़ को मजबूती से रख सकें?
समाजवादी पार्टी की राज्यसभा सीट सिर्फ ग्लैमर, पैसे और रसूख वाले लोगो के लिए सुरक्षित है PDA के नाम पर वोट लेने वाले लोग, रामगोपाल यादव, धनराज नाथवानी, बृजभूषण शरण सिंह जैसे बाहुबली और कॉर्पोरेट के लोगों को उच्च सदन भेज रहे हैं जिनका समाजवादी विचारों से कोई वास्ता नहीं है पार्टी और विचारधारा के लिए संघर्ष करने वाले समाजवादी चिंतक, लेखक और विचारक इनके लिए कोई महत्त्व नहीं रखते है?
समाजवादी विचारों, जातीय जनगणना व आरक्षण विरोधी रसूखदारों, फिल्मी सितारों और बिजनेसमैन को ये कथित समाजवादी राज्यसभा क्यों भेज रहे हैं, क्या पार्टी के लिए दिन रात काम करने वाले बुद्धिजीवी, चिंतक और संघर्ष करने वाले समाजवादी सिर्फ इस्तेमाल होने और संघर्ष करके खत्म होने के लिए हैं क्या भारत के समाजवादी अब सिर्फ परिवारवादी, ग्लैमर और कॉर्पोरेट की पार्टी बनकर रह गये हैं ?
#PDA समाज के जिन लोगों ने सीने पर बुलेट और घरों पर बुलडोजर का दंश झेलकर सपा को 03 लोकसभा सदस्य से 37 सदस्य तक पहुंचाया उस समाज के लोगों को क्या मिला दरअसल ये लोग सिद्धांतो व विचारों पर आधारित पार्टी नहीं बल्कि ग्लैमर, कॉर्पोरेट और परिवार की कंपनी चला रहे हैं जिसमें समाज का सिर्फ शोषण दमन हो रहा है!
#SamajwadiParty #AkhileshYadav
जागो पंच मासिक पत्रिका एंव यूट्यूब चैनल के प्रधान संपादक अचल सिद्धार्थ को लखनऊ पुलिस कमिश्नर के द्वारा परेशान किया जा रहा है यूट्यूब चैनल के वीडियो को डिलीट करने का दबाव बनाया जा रहा है!
प्रश्न है कि क्या अब लिखने-बोलने के लिए पुलिस प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ेगी?
#JagoPanch
“रहबा संस्कृत से पास, ब्राम्हण करिहीं न तोहपे विश्वास, उनके माथा में बाटा तू चमार हो!
— काशीनाथ यादव के बिरहा से प्रेरित
#KashinathYadav #Birha #BahujanDiscourse
बिहार, मोकामा विधायक- अनंत सिंह कैमरे के सामने कह रहे है ? कि... मर्डर कराए..
सवाल उठता है कि कहां हैं संवैधानिक संस्थाएं?
#bihar #Anantsingh
दिल्ली में आज ऐसी कोई खास खबरें हैं जो सोशल मीडिया के हिसाब से, हैरान करने वाली है?
@grok विस्तार से बताओ l
#cjp_protrst #jantar_Mantar
सारनाथ स्तूप : शांति और अध्यात्म का प्रतीक
यह वही पावन स्थान है जहां महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश (धर्मचक्रप्रवर्तन) दिया था l
#SarnathStupa #Buddha #Varanasi #IndianHeritage #IncredibleIndia #TravelDiaries
UPPSC वर्ष 2020, 2021, 2022 में EWS कोटे से कुल 196 चयनित अभ्यर्थियों में :-
ब्राह्मण - 98 ठाकुर - 63 अन्य - 35 (भूमिहार, कायस्थ, बनिया, शेख, सैयद, पठान)
EWS सवर्ण आरक्षण पर ब्राम्हण और ठाकुर जातियों का 82% कब्जा
#EWS_सरलीकरण #EWS
भारतीय संविधान में आरक्षण का उद्देश्य केवल गरीबी दूर करना नहीं, बल्कि सदियों से जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और अवसरों से वंचित समुदायों को शिक्षा तथा सरकारी सेवाओं में उचित प्रतिनिधित्व दिलाना भी है। लेकिन 2019 में लागू EWS आरक्षण ने सामाजिक न्याय की अवधारणा पर एक नई बहस खड़ी कर दी है।
सवाल गरीबों को अवसर देने का नहीं, बल्कि आर्थिक कमजोरी और हजारों वर्षों के ऐतिहासिक सामाजिक वंचना को एक ही कसौटी पर रखने का है अक्टूबर 2026 के बसावन इंडिया में प्रकाशित उत्तर प्रदेश PCS के EWS कोटे के आंकड़े इस बहस को गंभीर बनाते हैं।
बसावन इंडिया ने की टीम ने वर्ष 2020 में EWS कोटे के 76 चयनित अभ्यर्थियों में 44 ब्राह्मण और 24 क्षत्रिय। वर्ष 2021 में 76 में से 27 ब्राह्मण और 30 क्षत्रिय तथा वर्ष 2022 में 44 में से 27 ब्राह्मण और 9 क्षत्रिय चयनित अभ्यार्थियों का डाटा प्रस्तुत किया है इन तीनों वर्षों को मिलाकर कुल 196 चयनित अभ्यर्थियों में 98 ब्राह्मण और 63 क्षत्रिय चयनित हुए हैं। अर्थात प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, लगभग 82 प्रतिशत चयनित अभ्यर्थी इन दोनों जाति-वर्ग से हैं।
ये आंकड़े EWS कोटे के भीतर जातिवार हिस्सेदारी का सवाल खड़ा करता हैं सामाजिक न्याय संबंधी विचारों की रोशनी में आरक्षण को केवल आर्थिक सहायता की योजना नहीं माना जा सकता। हजारों वर्षो का जातिगत भेदभाव और ऐतिहासिक वंचना की समस्या केवल आय बढ़ने से समाप्त नहीं हो जाती। अगर ऐसा होता तो आर्थिक सम्पन्न लोगों को सामाजिक भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता।
यह बात सही है कि कुछ सवर्ण ग़रीब हैं यानी EWS हैं लेकिन उसके लिए सरकार की हजारों करोड़ ग़रीबों की मनरेगा जैसी योजनाएँ हैं, आरक्षण कोई गरीबी हटाओ योजना नहीं है, आरक्षण तो प्रतिनिधित्व के लिए है, सवर्ण का प्रतिनिधित्व तो पहले से ही आबादी से कई गुना ज़्यादा है। गरीब सवर्णों को छात्रवृत्ति, निःशुल्क कोचिंग, फीस में छूट और आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए लेकिन सवाल यह है कि आर्थिक कमजोरी दूर करने के लिए बनाई गई व्यवस्था को हजारों वर्षों के ऐतिहासिक वंचना और सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने वाले आरक्षण के समान्नत्र समानांतर नहीं रखा जा सकता।
103वें संविधान संशोधन के तहत लागू EWS आरक्षण को सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 में बहुमत से संवैधानिक वैधता दी थी। इसके लिए माननीय न्यायालय ने इन्द्रा साहनी के जजमेंट (50% से अधिक आरक्षण हो जाने) का हवाला नहीं दिया न ही 10% EWS सवर्ण आरक्षण के लिए कोई डाटा माँगा!
समानता केवल कागज पर नहीं, अवसरों में भी दिखनी चाहिए EWS पर बहस गरीबों के विरुद्ध नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण अवसरों के पक्ष में होनी चाहिए। आर्थिक गरीबी और जातिगत वंचना अलग-अलग समस्याएं हैं; इनके समाधान के लिए भी प्रभावी और स्पष्ट नीतियां जरूरी हैं।
यदि EWS आरक्षण का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को अवसर देना है, तो सरकार को पारदर्शी आंकड़ों के माध्यम से बताना चाहिए कि इसका लाभ किन वर्गों तक पहुंच रहा है। साथ ही, SC, ST और OBC समाज के आर्थिक रूप से गरीबों को EWS आरक्षण का लाभ कब मिलेगा?
#EWS #Reservation
नरेंद्र मोदी आरएसएस की सरकार CJP आंदोलन से कितनी असहज है, इसकी झलक इस वीडियो में साफ़ देखी जा सकती है!
#CJP #JantarMantar2_0
भारतीय समाज में जाति का प्रभाव केवल विवाह, सामाजिक संबंधों, भूमि या रोजगार तक सीमित नहीं है ऐतिहासिक रूप से शिक्षा, ज्ञान के संस्थानों, साहित्यिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक संसाधनों तक पहुँच में घोर असमानताएँ व्याप्त हैं। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में यह सवाल प्रासंगिक है कि साहित्यिक प्रतिष्ठा किस प्रकार निर्मित होती है, किन लेखकों को पाठ्यक्रम में जगह मिलती है और किनकी रचनाएँ साहित्यिक विमर्श के केंद्र तक नहीं पहुँच पातीं।
सवर्णों से भरी गंगा’ शीर्षक से बसावन इंडिया के यह सवाल अंततः हिंदी साहित्य के किसी एक पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं है। यह इस बात की पड़ताल है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था अपने समाज की विविधता, ऐतिहासिक असमानताओं और संवैधानिक मूल्यों को किस हद तक प्रतिबिंबित करती है।
पत्रिका में प्रकाशित आँकड़े संबंधित पाठ्यपुस्तक में प्रतिनिधित्व की जाँच करने का आधार प्रस्तुत करते हैं पुस्तक में लेखकों की सूची, सामाजिक वर्गीकरण और पाठ्य सामग्री यह निर्धारित किया है कि प्रतिनिधित्व की असमानता कितनी व्यापक है और उसके पीछे कौन-से संस्थागत कारण काम कर रहे हैं।
जो संघी ताकतें ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, डॉ. आंबेडकर और पेरियार के विचारों को ‘जहर’ बताकर खारिज कर रही हैं, वे अब विश्वविद्यालयों में समीक्षा और पुनर्मूल्यांकन के नाम पर बहुजन महापुरुषों के विचारों को पाठ्यक्रमों से हटाकर महापुरुषों के विचारों से दूर करने की असफल साजिश कर रहे हैं यदि पाठ्यक्रमों में इन विचारकों का उल्लेख केवल औपचारिक बना दिया जाए, उनके संघर्षों की धार को कमजोर कर दिया जाए या उनके वैज्ञानिक, तर्कवादी और सामाजिक न्याय के संदेश को छिपा दिया जाए, तो यह शिक्षा में समावेशन नहीं, बल्कि वैचारिक विरूपण होगा।
फुले, सावित्रीबाई फुले, आंबेडकर और पेरियार ने शिक्षा को मुक्ति, समानता और आत्मसम्मान का साधन माना। इसलिए युवाओं को उनके विचारों से दूर करने के बजाय उनके मूल लेखन, आंदोलनों और सामाजिक संदर्भों से आलोचनात्मक रूप से परिचित कराना चाहिए। विद्यार्थियों को यह समझना जरूरी है कि जाति-विरोध, स्त्री शिक्षा, तर्कवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक समानता किसी एक दल या सरकार की देन नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक संघर्षों का परिणाम हैं।
यदि संविधान सभी नागरिकों को समानता और गरिमा का अधिकार देता है, तो शिक्षा व्यवस्था का दायित्व है कि वह इन मूल्यों को केवल पुस्तकों में लिखे सिद्धांतों तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें अपने व्यवहार और निर्णयों में भी प्रतिबिंबित करे।
डॉ. आंबेडकर के सामाजिक न्याय के व्यापक दृष्टिकोण से प्रेरणा लेते हुए शिक्षा को ऐसी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है, भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार देता है। लेकिन क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था भी इन संवैधानिक मूल्यों को पूरी तरह प्रतिबिंबित करती है? क्या हिंदी की पाठ्यपुस्तकें भारत के सभी सामाजिक समुदायों की साहित्यिक परंपराओं, ऐतिहासिक अनुभवों और वैचारिक योगदानों को उचित स्थान देती हैं? या पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया में कुछ विशेष सामाजिक समूहों का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक बना हुआ है? इसमें जन्म किसी व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता, सामाजिक प्रतिष्ठा या ज्ञान तक पहुँच का निर्धारक न बने।
ब्राह्मण साहित्यकारों की रचनाएँ भारतीय साहित्य की धरोहर हैं तो दलित, आदिवासी, पिछड़े व पासमंदा तथा अन्य वंचित समुदायों का साहित्य भी भारतीय साहित्य की धरोहर हैं किसी की उपस्थिति समस्या नहीं है; समस्या तब है, जब किसी की अनुपस्थिति को सामान्य मान लिया जाए।
हिंदी पाठ्यपुस्तकों का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को परीक्षा के लिए तैयार करना नहीं होना चाहिए। उन्हें ऐसी पीढ़ी तैयार करनी चाहिए जो जातिगत श्रेष्ठता और हीनता के विचारों पर प्रश्न उठाए, विविधता का सम्मान करे, फुले, आंबेडकर और पेरियार जैसे सामाजिक क्रांतिकारियों के विचारों को समझे और समानता, तर्क तथा मानवीय गरिमा को अपने सामाजिक जीवन का आधार बनाए।
#CasteRepresentation #DalitLiterature #BasawanIndia
बहुजन इतिहास के नज़रिए से 14 अक्टूबर का दिन का विशेष महत्व है. इसी दिन 1956 को डॉ अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को अपनाया और 22 प्रतिज्ञा की.लेकिन किसी भी अखबार में इस ऐतिहासिक घटना को प्रकाशित नहीं किया जबकि इस घटना को सामाजिक जातिगत के खिलाफ़ एक ऐतिहासिक प्रतिरोध के रूप में देखी जानी चाहिए।
1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं रखूँगा और न ही उनकी पूजा करूँगा।
2. मैं राम और कृष्ण, जिन्हें ईश्वर का अवतार माना जाता है, में कोई विश्वास नहीं रखूँगा और न ही उनकी पूजा करूँगा।
3. मैं गौरी, गणपति तथा हिन्दू धर्म के अन्य देवी-देवताओं में कोई विश्वास नहीं रखूँगा और न ही उनकी पूजा करूँगा।
4. मैं ईश्वर के अवतार में विश्वास नहीं रखूँगा।
5. मैं यह नहीं मानूँगा कि बुद्ध, विष्णु के अवतार थे। मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार मानता हूँ।
6. मैं श्राद्ध नहीं करूँगा और न ही पिंडदान दूँगा।
7. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और शिक्षाओं के विरुद्ध कोई आचरण नहीं करूँगा।
8. मैं ब्राह्मणों द्वारा कोई भी धार्मिक संस्कार नहीं करवाऊँगा।
9. मैं सभी मनुष्यों की समानता में विश्वास रखूँगा।
10. मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा।
11. मैं बुद्ध द्वारा बताए गए आर्य अष्टांगिक मार्ग का पालन करूँगा।
12. मैं बुद्ध द्वारा बताई गई दस पारमिताओं का पालन करूँगा।
13. मैं सभी प्राणियों के प्रति दया और करुणा रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा।
14. मैं चोरी नहीं करूँगा।
15.मैं झूठ नहीं बोलूँगा।
16. मैं व्यभिचार नहीं करूँगा।
17. मैं मदिरा तथा अन्य मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा।
18. मैं अपने दैनिक जीवन में आर्य अष्टांगिक मार्ग का पालन करने तथा करुणा और मैत्री का अभ्यास करने का प्रयास करूँगा।
19. मैं हिन्दू धर्म का त्याग करता हूँ, जो मानवता के लिए हानिकारक है तथा मानवता की उन्नति और विकास में बाधक है, क्योंकि यह असमानता पर आधारित है। मैं बौद्ध धम्म को अपने धर्म के रूप में स्वीकार करता हूँ।
20. मेरा दृढ़ विश्वास है कि बुद्ध का धम्म ही सच्चा धम्म है।
21. मेरा विश्वास है कि मुझे आज नया जीवन प्राप्त हुआ है।
22. मैं गंभीरतापूर्वक घोषणा करता हूँ और प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज से मैं अपना जीवन बुद्ध के सिद्धांतों, शिक्षाओं और उनके धम्म के अनुसार व्यतीत करूँगा।
जय भीम!
नमो बुद्धाय!
OBC समाज की हक़मारी कब तक..?
#OBCRESEVATION
अंधभक्ति की चाल यही है—भीड़ जिस दिशा में जा रही हो, बिना सोचे-समझे उसी दिशा में चल पड़ो!
“सब कर रहे हैं” किसी गलत काम को सही नहीं बना देता।
भीड़ का हिस्सा बनना आसान है, सवाल पूछने की हिम्मत रखना मुश्किल।
अंधभक्त भीड़ का अनुसरण करते हैं, जागरूक नागरिक तर्क और विवेक का।
सोचिए, सवाल पूछिए ?
#BlindFaith #ThinkForYourself #जागरूक_नागरिक
"आज विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस (10 अक्टूबर) है. आकड़े बताते हैं कि हर चौथा व्यक्ति बीमार है. शोध यह भी बताते है कि मानसिक बीमारी की सबसे ज्यादा शिकार एससी एसटी ओबीसी समाज है जिसका सबसे बड़ा जिम्मेदार ब्राह्मणवादी व्यवस्था है?"
प्रोफेसर विक्रम
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
@ProfvikramAU
जेन Z- 2 में दिल्ली के हालात बसावन इंडिया के स्पेशल करेस्पांडेंट नितिन की विशेष रिपोर्ट!
#JusticeForZenG #JantarMantar
"भारत में अघोषित इमरजेंसी लागू जिस तरह से जेन जी और अन्य नेताओं को डिटेन किया गया है, वह हिटलर के दौर का इतिहास दोहराया जा रहा है, लोकतांत्रिक सरकार में तानाशाही रवैया का कोई जगह होना ही नहीं चाहिए।"
प्रोफेसर विक्रम
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
@ProfvikramAU
#jantarmanatr #Delhi #CJP_Protest
राजनीतिक सत्ता और कॉरपोरेट पूँजी का गठजोड़ कैसे देश की आर्थिक नीतियों, सार्वजनिक संसाधनों और अवसरों के वितरण को प्रभावित करता है?
#Narendra_modi #Gautam_adani
दिल्ली जंतर-मंतर 2.0 आंदोलन में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए आयी ZEN G बेटियों के साथ गाज़ियाबाद हिन्दू गौ रक्षक दल के रविंद्र गुज्जर अपने सहयोगियों को साथ लेकर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ व अभद्रता कर रहा है।
पुलिस उक्त प्रकरण का संज्ञान लेकर इन असामाजिक
तत्वों के विरुद्ध कार्यवाही सुनिश्चित करें।
@DelhiPolice @Uppolice @dgpup #JusticeForZenG @ghaziabadpolice
















