सर या तो आपको कुछ पता नहीं है या आप जान बूझ कर ग़लत बोल रहे हैं...
राहुल गांधी को उनकी ही पार्टी के नेताओं ने आईना दिखा दिया.
कांग्रेस के सीनियर नेता आनंद शर्मा ने कहा कि जो लोग रिजीम चेंज का ख्वाब देख रहे हैं, वो लोकतंत्र का सही मतलब नहीं जानते, लोकतंत्र में सरकारें चुनी जाती हैं, रिजीम चेंज या तख्तापलट जैसी कोई चीज नहीं होती. जो लोग सरकार का विरोध कर रहे हैं,उन्हें निष्पक्ष चुनाव की मांग करनी चाहिए, न कि बेतुकी बात करनी चाहिए.
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि सत्ता परिवर्तन सिर्फ वोटों के जरिये होता है, इसलिए जो लोग भारत को नेपाल और बांग्लादेश बनाने की बात करते हैं, वो गलतफहमी के शिकार हैं.
आनंद शर्मा कांग्रेस के पुराने नेता हैं. शशि थरूर बाद के ज़माने के हैं. दोनों ने दुनिया देखी है. दोनों समझते हैं कि regime change की बात राहुल गांधी के असली मक़सद को expose कर देगी. वो ये भी जानते हैं कि भारत की जनता कभी भी ढाका जैसे ख़ून-ख़राबे को पसंद नहीं करेगी.
कांग्रेस के ज़्यादातर नेताओं की यही सोच है. वे कहते हैं कि उनकी पार्टी की सोच कभी लेनिनवादी, माओवादी नहीं रही, कांग्रेस का विचार कभी हिंसा से सरकार बदलने का नहीं रहा. पर इन लोगों के पास इस बात का जवाब नहीं है कि फिर राहुल गांधी नेहा बोरा और प्रशांत भूषण जैसे लोगों के साथ रहना क्यों prefer करते हैं? वह JNU के ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग का समर्थन क्यों करते हैं? उनके आसपास माओवादी लेनिनवादी सोच के लोग क्यों नज़र आते हैं?
absulutely right
किसी सत्ताधारी नेता की आत्म-मुग्धता की अपनी वजहें हो सकती हैं। सत्ता में होना ही उसे आत्म मुग्ध बनाने के लिए काफ़ी होता है। लेकिन अगर विपक्ष का कोई नेता आत्म-मुग्धता का शिकार हो जाए तो फिर जनता से जुड़ ही नहीं पाता। ऊपर ऊपर खेलते रह जाता है।
#उमासूक्ति
यह एक अच्छा फैसला है....
मेरी जानकारी के मुताबिक @yadavakhilesh की समाजवादी पार्टी, शरद पवार की NCP और DMK - इन तीनों में से कोई भी परिसीमन बिल पर सरकार का समर्थन नहीं करेगा। कौन अपना जनाधार खत्म करना चाहेगा!
ये खबर इसलिए फैल गई है ताकि लोगों का ध्यान भटक जाए....
चुनाव आयोग पर सवालों का जवाब माँगा जा रहा था, लेकिन उसकी जगह खबरें आ रही हैं कि अमित शाह ने विपक्ष को तोड़ने का इंतजाम कर लिया है! कांग्रेस को बड़ा झटका लगने वाला है! अखिलेश मान जाएंगे, पवार साथ आ जाएंगे, डीएमके सेट है और दूसरे दल भी कतार में हैं!
जरा रुकिए। इनमें खबर कितनी है और अटकल कितनी?
मेरे हिसाब से इस हलचल को देश की बहस का रुख मोड़ने की कोशिश के तौर पर देखना चाहिए। सवाल पूछा जा रहा था चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर। चर्चा शुरू हो गई मोदी-शाह की रणनीति और विपक्ष की कमजोरी पर। सरकार ने ही ये खबरें फैलवाई हैं, इसका प्रमाण हमारे पास नहीं है लेकिन इनसे राजनीतिक फायदा किसे मिल रहा है, यह समझना मुश्किल नहीं है।
अभी मामला सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे का नहीं है। सवाल यह भी है कि चुनाव आयुक्त चुने कैसे जाते हैं और अपने काम के लिए जवाबदेह किसके सामने हैं?
चुनने वाली समिति में प्रधानमंत्री हैं, प्रधानमंत्री के चुने हुए एक कैबिनेट मंत्री हैं और विपक्ष के नेता हैं। तीन लोगों में दो सरकार के। फिर विपक्ष के नेता की राय का सिवाय डिसेंट के क्या मतलब है? इसी व्यवस्था को अदालत में चुनौती दी गई है।
ऊपर से इसी कानून की धारा 16 है। यह मौजूदा और पूर्व चुनाव आयुक्तों को सरकारी कामकाज के दौरान किए गए कामों और कही गई बातों पर व्यक्तिगत दीवानी और आपराधिक मुकदमों से व्यापक सुरक्षा देती है। इसका मतलब यह नहीं कि आयोग के फैसले अदालत में चुनौती ही नहीं दिए जा सकते। सवाल यह है कि आयुक्तों की व्यक्तिगत जवाबदेही पर इतना बड़ा सुरक्षा कवच क्यों? इस प्रावधान की चुनौती पर भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और आयोग से जवाब माँगा है।
इन्हीं सवालों के बीच एकाएक कई कोनों से खबर आई कि सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों के लिए संसद की विशेष बैठक बुला सकती है। दूसरे दलों से संपर्क की खबर भी है। यहाँ तक बात खबर है। इसके आगे—कौन झुक गया, कौन टूट जाएगा और कांग्रेस को कितने वोल्ट का झटका लगेगा—इसकी अटकलों की भरमार है!
याद रखिए कि संविधान का 131वां संशोधन विधेयक अप्रैल में लोकसभा में जरूरी बहुमत नहीं जुटा पाया था। अब उसे दोबारा आगे बढ़ाने की तैयारी की खबरें हैं। पिछली हार का जिक्र गायब है और अगली जीत का ऐलान पहले ही हो रहा है ।
लोकसभा में 360 वोट भी हर हालत में जरूरी नहीं हैं। संविधान संशोधन के लिए कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक और उपस्थित होकर वोट देने वालों के कम-से-कम दो-तिहाई का समर्थन चाहिए। यानी कोई दल सरकार को वोट दे तो फायदा, मतदान से दूर रहे तो भी फायदा हो सकता है। इसलिए किसी से बातचीत की खबर आते ही उसके सारे सांसद सरकार के खाते में जोड़ देना गलत है।
DMK से बातचीत की खबर है, लेकिन उसका समर्थन तय नहीं है। पवार की पार्टी के आठ वोट भी पक्के नहीं हैं। अखिलेश मान गए, बेनीवाल का जाना तय है, कांग्रेस टूटने वाली है—इन दावों की सार्वजनिक पुष्टि कहाँ है? संपर्क होने और सौदा पूरा हो जाने में फर्क होता है।
हाँ, मानसून सत्र की बैठकें 13 अगस्त को स्थगित होने के बाद उसका औपचारिक सत्रावसान न होने की खबर सही है। लेकिन इससे यह कैसे साबित हो गया कि सरकार के पास बिल पास कराने के वोट आ गए हैं?
महिला आरक्षण और परिसीमन पर खुलकर चर्चा हो। सरकार नया प्रस्ताव सामने रखे। देश देखे कि किस राज्य की कितनी सीटें बढ़ेंगी और प्रतिनिधित्व का संतुलन कैसे बदलेगा। पार्टियाँ भी साफ बताएँ कि वे कहाँ खड़ी हैं।
लेकिन इन खबरों के शोर में चुनाव आयोग वाले सवाल दबने नहीं चाहिए।
आयुक्तों के चयन में सरकार का निर्णायक बहुमत क्यों? उनके लिए इतनी व्यापक कानूनी सुरक्षा क्यों? आयोग की निष्पक्षता पर उठे सवालों का जवाब कौन देगा?
संसद में सरकार कितने सांसद जुटा लेगी, यह पता चल जाएगा। फिलहाल सवाल यह है कि चुनाव आयोग जनता का भरोसा कैसे जुटाएगा। उसका जवाब विपक्ष में टूट की खबरें नहीं दे सकतीं।
सर, सारे सवाल विपक्ष से ही पूछे जाते हैं या जनता पर छोड़ दिए जाते हैं सरकार से कुछ नहीं पूछते गोदी मीडिया वाले
ये भी एक प्रकार का गुंडा राज है!
भाई इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? सरकार से पूछ ना! जनता को बता रहे हो कि दवा महँगी है, असली होने की भी गारंटी नहीं है- तो जनता अब करे क्या? दवा ख़ुद जाँचे, माफिया भी ख़ुद पकड़े और इलाज भी ख़ुद करे?
दवाओं के मानक और नियामक समन्वय के लिए CDSCO, निर्माण-बिक्री की निगरानी के लिए राज्य के औषधि विभाग और कीमतों के नियमन के लिए NPPA है- इनसे जवाब कौन माँगेगा?
अफ़सर हैं, स्वास्थ्य मंत्री हैं- उनसे पूछो कि ये सब उनकी निगरानी में कैसे हो रहा है? किस ज़िम्मेदार अफ़सर पर कार्रवाई हुई?
माफिया के ख़िलाफ़ मुहिम चला रहे हो। अब एक एपिसोड उन्हें रोकने की ज़िम्मेदारी उठाने वालों पर भी बनाओ। या सवाल पूछने की सारी हिम्मत सरकार का नाम आते ही ख़त्म हो जाती है?
मैम, ये गोदी मीडिया वाले सत्ता के गुलाम हैं...
एक लोक गायिका @nehafolksinger से इतनी नफरत की ABP न्यूज़ ने बिना चेक किये बिना पता लगाए नेहा सिंह राठौर को सेक्स रैकेट से जोड़ दिया...बड़े बड़े पत्रकार ज्ञान बांच रहे हैं कि सबको पत्रकारिता नहीं करनी चाहिए हर कोई माइक आईडी लेकर नहीं घूम सकता..भाई साहब अगर मेन स्ट्रीम की इतनी नीच पत्रकारिता है तो उससे अच्छा है की बच्चे ही पत्रकारिता संभालें..अगर पत्रकार और इन्फेलुसर के बीच लकीर होनी चाहिए तो दलाल और पत्रकार के बीच भी लकीर होनी चाहिए...है कोई माई का लाल ये लकीर खींचने वाला...
गोदी मीडिया....
देखिए घटिया पत्रकारिता का एक और नमूना.. कैसे बड़े बड़े चेहरों का फोटो लगाकर अराजक लिखा जा रहा है... @abplive क्या आप ज़िम्मेदारी से इन्हे अराजक मान रहे है या राजनीति के दबाव में ऐसा लिख रहे है..
गोदी मीडिया से यही उम्मीद है इसके अलावा कुछ नहीं....
Replying to @ABPNews
@ABPNews की ये ख़बर देखिए.
ये चैनल मुझे वेश्या और कॉल गर्ल बताना चाहता है.
मैं सरकार से सवाल पूछूँगी तो ये बिके हुए चैनल मुझे इस तरह से अपमानित करने का प्रयास करेंगे.
इस देश का महिला आयोग मर गया है क्या? @NCWIndia
इन गोदी चैनलों का भाजपा की दलाली से पेट नहीं भर रहा है. इन्हें अब बेटियों का सम्मान खाना है.
@narendramodi इस देश को आपने बेटियों के लिए नर्क बना दिया है.
तुम मुझे चंदा दो मैं तुम्हारा विज्ञापन करूंगा यही चल रहा है...





















