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Calm mind. Royal vibe. Powerful future.
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Ankit Yadav retweeted
I hope the concerns surrounding the detention of SP National President Shri Akhilesh Yadav ji and other leaders are resolved at the earliest.
Peaceful expression and democratic dialogue are an important part of our democracy.
@yadavakhilesh @samajwadiparty
Ankit Yadav retweeted
जैसे सत्ताधारी, वैसे अधिकारी!
नैतिकता की सीमा लांघकर, निजता का अतिक्रमण करनेवाली उप्र सरकार की पुलिस का ये ‘अपशब्द वचनीय मौखिक शारीरिक व्यवहार’ किससे प्रेरित है, ये सब जानते हैं।
अब पुलिस का ये ही कहना बाक़ी है कि ‘हम किसी नियम-क़ानून को मानने के मूड में नहीं है।
सुमित जी, “मेहनत करो और आगे बढ़ो” वाली बात सुनने में अच्छी लगती है, लेकिन समाज और प्रतियोगिता को इतना सरल समझना ही आपकी पहली भूल है।
आरक्षण मेहनत का विकल्प नहीं है, अवसर और प्रतिनिधित्व की संवैधानिक व्यवस्था है। आरक्षित वर्ग का अभ्यर्थी परीक्षा देता है, पढ़ता है, चयन प्रक्रिया से गुजरता है और नौकरी मिलने के बाद वही काम करता है जो पद की जिम्मेदारी है। इसलिए “कटोरा लेकर आरक्षण माँगना” कहना तर्क नहीं, सिर्फ उपहास है।
और एक बात—अगर आरक्षण सचमुच “मेहनत न करने का रास्ता” होता, तो आरक्षित वर्ग के लाखों विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों क्यों लगाते?
आरक्षण का सवाल यह नहीं है कि मेहनत कौन करता है; सवाल यह है कि अवसर और प्रतिनिधित्व में ऐतिहासिक असमानता कितनी है।
तुम्हें आरक्षण पसंद नहीं है तो संविधान और आँकड़ों से बहस करो।
“भीख”, “कटोरा” और “नल्ला” बोलकर तुम आरक्षण को नहीं, अपनी दलील की कमजोरी को उजागर कर रहे हो।
और हाँ, मेहनत पर इतना भरोसा है तो आरक्षण को देखकर रोज़ परेशान होने की बजाय अपनी मेहनत पर भरोसा रखो। 😂
Replying to @AnkitEditorial
Tum log mehnat karke aage kyu nahi ate..kab tak bhikhariyon ki tarah hath failaoge..Photo to aisa upload kiye jaise Raja ho...aur Katora leke Arakshan ki bhikh mang rhe..nasho me khoon ki jagah paani behata hai kya., Pakka dava hai tum Arakshan ke baad bhi nalle hi ghum rahe hoge
पांडे जी, अपने श्राप पर इतना ही भरोसा है तो आरक्षण भी श्राप देकर खत्म करवा दीजिए। 😂
वहाँ श्राप क्यों नहीं चलता?
या फिर मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इस पर श्राप आसान है और संविधान पर बात आते ही पसीना छूटने लगता है?
2027 का फैसला जनता करेगी—
आप श्राप देते रहिए, जनता अपना हिसाब वोट से करेगी।
जो ये हिम्मत कर सकेगा कहने की...
“आरक्षण था, आरक्षण है और आरक्षण रहेगा”
यक़ीनन वो ही हमारे वोट और समर्थन पाने का अधिकार समझे। जो अगर मगर वाली भाषा बोलेगा वो अपना रास्ता नाप ले।
सीधी सी एक बात है तुम्हारे लिए बोलोगे तो हमसे उम्मीद भी रखो, अगर तुम्हें चुप्पी साधना है तो फिर गए।........... @iamAshwiniyadav
आरक्षण के सवाल पर तस्वीर अब काफी साफ दिखाई दे रही है।
अखिलेश यादव और चंद्रशेखर आज़ाद ने आरक्षण के विरोध में उठ रही आवाज़ों के खिलाफ खुलकर अपना रुख रखा है और इसे प्रतिनिधित्व तथा सामाजिक न्याय से जोड़कर देखा है।
दूसरी ओर, जो नेता स्वयं को पिछड़े वर्गों की राजनीति का प्रतिनिधि बताते हैं—संजय निषाद, ओमप्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल और जयंत चौधरी—उनसे भी जनता का सीधा सवाल है:
जब आरक्षण के स्वरूप और अधिकार पर बहस चल रही है, तब आपकी स्पष्ट राजनीतिक स्थिति क्या है?
सिर्फ पिछड़े वर्गों के नाम पर राजनीति करना पर्याप्त नहीं है।
जिस मुद्दे पर आपके समर्थकों के अधिकार प्रभावित होने की बात हो रही हो, उस पर स्पष्ट आवाज़ भी सुनाई देनी चाहिए।
नेताओं की असली परीक्षा पद और भाषणों में नहीं,
मुश्किल समय में उनके मुद्दों पर खड़े होने से होती है।
लंबे समय से संविधान प्रदत्त हिस्सेदारी की व्यवस्था यानी आरक्षण के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। अब इसी मुहिम को “आरक्षण में सुधार” जैसे शब्दों की आड़ में आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है।
कान खोलकर सुन लो—आरक्षण कोई खैरात नहीं है। यह सदियों से सामाजिक भेदभाव और वंचना झेलते समाज को संविधान द्वारा दिया गया प्रतिनिधित्व का अधिकार है।
भारत सरकार व लखनऊ दरबार में बैठे सत्ताधीशों, कान खोलकर सुन लो—आरक्षण व्यवस्था में किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। आरक्षण पर हमला यानी सामाजिक न्याय पर हमला है और सामाजिक न्याय से समझौता आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) किसी भी कीमत पर नहीं करेगी।
हम यह भी देख रहे हैं कि इस पूरे माहौल को बनाने में मीडिया की बड़ी भूमिका है। हमारे हितों के विपरीत विचार रखने वाले लोगों को बार-बार बुलाकर एकतरफा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन याद रखिए—हमारे सब्र का इतना इम्तिहान मत लीजिए। अगर हमारी आवाज को लगातार दबाने और नजरअंदाज करने की कोशिश की गई, तो जनता लोकतांत्रिक तरीके से इसका जवाब देगी।
हम जानते हैं कि मेनस्ट्रीम मीडिया में हमारा पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, लेकिन हमारी आवाज को दबाया नहीं जा सकता। मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर निष्पक्षता, संतुलन और जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका निभानी होगी।
और आरक्षण का विरोध करने वालों को आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) खुली बहस के लिए आमंत्रित करती है।
अगर आपके पास आरक्षण के खिलाफ तर्क और तथ्य हैं, तो सामने आइए। बहस हो—तर्क से, तथ्यों से और संविधान के दायरे में।
जय भीम! जय भारत! जय मंडल!
जय संविधान! जय आरक्षण!
रमेश जी, “यदुवंशी” होने और आरक्षण पाने में आपको विरोधाभास कहाँ दिख गया? 😂
यदुवंशी होना वंश/परंपरा की पहचान है, जबकि आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा प्रतिनिधित्व से जुड़ी संवैधानिक व्यवस्था है। दोनों को मिलाकर तर्क बनाने से इतिहास नहीं बदल जाता।
और “तुम्हें आरक्षण मिलना ही नहीं चाहिए” कहने से पहले बताइए—संविधान ने आपको यह अधिकार किस अनुच्छेद में दिया कि आप तय करें कि किसे संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए और किसे नहीं?
पहले संविधान पढ़िए, फिर किसी की पात्रता पर फैसला सुनाइए।
मिल कहाँ रहा है? 😂
अरे शर्मा जी, पोस्ट मेरी है और दर्द आपका—इतनी जल्दी क्यों तड़प रहे हो?
हाथ तोड़ने की बात पर इतना घबरा रहे हो तो आरक्षण पर बहस छोड़कर पहले अपना तर्क मजबूत करो।
हक़ की बात है, तुम्हारे घर की जागीर नहीं—मिलना तो पड़ेगा।
“0% contribution, 1000% entitlement” लिखने से आँकड़े नहीं बन जाते। पहले आँकड़े लाओ। 😂
भारत सरकार के पास ऐसा कोई जाति-वार आँकड़ा नहीं है कि SC/ST/OBC ने 0% टैक्स दिया। उल्टा FY 2024-25 में देश में ₹22.08 लाख करोड़ का GST जमा हुआ और सरकार खुद बताती है कि GST का अंतिम भार उपभोक्ता पर पड़ता है। यानी रोज़मर्रा की खरीदारी करने वाला व्यक्ति भी कर देता है।
और सबसे मज़ेदार बात—आरक्षण कोई “फ्रीबी” नहीं है। आरक्षित वर्ग का व्यक्ति सरकारी नौकरी में चयनित होता है तो उसे वेतन मिलता है क्योंकि वह काम करता है, मुफ्त में सरकारी खजाना नहीं लूटता।
अगर आपका दावा है कि “हम टैक्स देते हैं और ये लोग खाते हैं”, तो पहले जाति के आधार पर टैक्स देने वालों और लेने वालों का सरकारी आँकड़ा दिखाइए।
वरना “0% contribution” सिर्फ ट्विटर का गणित है—भारत सरकार का आँकड़ा नहीं।
टैक्स देने का दावा करके किसी नागरिक के संवैधानिक अधिकार को भिखारी वाली भाषा में पेश करना बंद करो। पहले तथ्य लाओ, फिर तंज करो।
Replying to @AnkitEditorial @AnilYadavmedia1
Pay your own bills parasite instead of living on freebies sponsored by direct taxpayers
Jitna abadi utna tax
0% contribution
1000% entitlement
Bhaag
“पिछड़ा है तो औकात में बोल”—बस यही एक लाइन बता देती है कि बहस संविधान पर नहीं, तुम्हारी सोच पर हो रही है। 😂
आरक्षण किसी के बाप की दी हुई जागीर नहीं है। अनुच्छेद 15(4) और 16(4) में इसका संवैधानिक आधार है, और OBC आरक्षण के संदर्भ में मंडल आयोग की सिफारिशें 1980 में आईं, जिन्हें 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने लागू किया।
अब “वी.पी. सिंह ने तुम्हारे बाप को दिया” वाली बचकानी बात छोड़ो। वी.पी. सिंह किसी के बाप की निजी संपत्ति बाँट नहीं रहे थे, संवैधानिक व्यवस्था के तहत पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व की बात लागू कर रहे थे।
और रही “सरकार का हाथ तोड़ने” की बात—मैंने किसी व्यक्ति का हाथ तोड़ने की बात नहीं की। मैंने साफ कहा था कि जो हाथ आरक्षण के अधिकार को छूने की कोशिश करेगा, उसका राजनीतिक जवाब दिया जाएगा।
तुमने बहस में संविधान का एक शब्द नहीं लिखा,
बस जाति और औकात पर उतर आए।
इसलिए अगली बार मेरे तर्क का जवाब देना—
मेरी जाति का नहीं।
क्योंकि जब तर्क खत्म हो जाता है, तभी “औकात” शुरू होती है।
निशिकांत जी, लॉलीपॉप किसे मिला और किसने पकड़ा—ये जनता तय करेगी, ट्विटर पर घोषणा करने से नहीं।
PDA में ‘P’ को लेकर तंज करने से पहले ये याद रखिए कि आरक्षण कोई अखिलेश जी की निजी घोषणा नहीं, संविधान में दिया गया प्रावधान है।
आपको PDA का पंडित दिखे या न दिखे, जिनके प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी की बात हो रही है, वे यहीं हैं और अपना हक़ भी जानते हैं।
और रही लॉलीपॉप की बात—
जनता को लॉलीपॉप समझने वालों को चुनाव में अक्सर असली जवाब मिल जाता है।
ब्रो को अपने मंत्रालय में भले ही अपनी चलती न हो, लेकिन सुर्खियों में आने का रास्ता खूब मालूम है। 😂
कल तक जंतर-मंतर पर आरक्षण समाप्त करने की मांग करने वाले हर्ष दुबे के समर्थन में खड़े होकर ब्रो ने ऐसा तीर छोड़ा है, जो सीधे SC, ST और OBC के हिस्से की ओर जाता दिखाई दे रहा है।
मंत्रालय के कामकाज से पर्याप्त सुर्खियाँ नहीं मिलीं तो सोचा—चलो आरक्षण के मुद्दे पर ही अपना नाम चमकाया जाए।
लेकिन ब्रो शायद भूल गए कि कैमरे के सामने बैठने से जनसमर्थन नहीं मिलता और किसी आंदोलन के साथ खड़े हो जाने से जनता की सहमति नहीं मिल जाती।
आरक्षण किसी मंत्री की कृपा नहीं, संवैधानिक व्यवस्था है।
जिन करोड़ों लोगों के अधिकारों की बात हो रही है, वे किसी की राजनीतिक सुर्खियों के लिए अपना हिस्सा छोड़ने वाले नहीं हैं।
तीर तो ब्रो ने छोड़ दिया है…
अब जनता बताएगी कि निशाना सही था या ब्रो ने खुद के पैर पर चला दिया। 😏
मैडम, PDA में ‘P’ सिर्फ एक अक्षर नहीं, बल्कि उस समाज की आवाज़ है जिसे लंबे समय तक सत्ता, अवसर और प्रतिनिधित्व में उसका उचित हिस्सा नहीं मिला।
अखिलेश जी की बात का सार भी यही है कि आरक्षण किसी की कृपा नहीं, प्रतिनिधित्व और बराबरी का सवाल है।
‘आरक्षण सुधार’, ‘समीक्षा’, ‘क्रीमीलेयर’ जैसे शब्दों की आड़ में अगर आरक्षण की मूल भावना को ही कमजोर किया जाएगा, तो सवाल उठेंगे ही।
और एक बात साफ है—
जिस समाज की आबादी जितनी है, लोकतंत्र में उसकी भागीदारी और प्रतिनिधित्व भी उसी अनुपात में होना चाहिए।
PDA की राजनीति किसी के खिलाफ नहीं, हिस्सेदारी, सम्मान और बराबरी की लड़ाई है।
इसलिए आरक्षण पर बहस होनी चाहिए तो तथ्यों और संविधान के आधार पर हो—ऐसे शब्दों के सहारे नहीं, जिनका इस्तेमाल आरक्षण को धीरे-धीरे कमजोर करने के लिए किया जा सके।
हक़ की आवाज़ को राजनीति कहकर दबाया नहीं जा सकता।
PDA सिर्फ नारा नहीं, सामाजिक न्याय की मांग है।
पहली बात, यादव 1990 से पहले General में थे—इससे ये साबित नहीं होता कि OBC आरक्षण संविधान के बाहर की चीज़ है। आरक्षण का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 15(4) और 16(4) में है। इसलिए “नेताओं ने अपने मन से दे दिया” कहना सही नहीं है।
दूसरी बात, OBC की पहचान सिर्फ यादव जाति के नाम पर नहीं हुई थी। मंडल आयोग ने सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व जैसे पहलुओं का अध्ययन करके सिफारिशें दी थीं। बाद में उन्हीं सिफारिशों के आधार पर केंद्र में OBC आरक्षण लागू हुआ।
और अगर आपका तर्क ये है कि “नेताओं ने वोट बैंक के लिए किया”, तो राजनीतिक मंशा और संवैधानिक वैधता दो अलग चीजें हैं। किसी सरकार के फैसले के पीछे राजनीति हो सकती है, लेकिन उससे संविधान में मौजूद प्रावधान खत्म नहीं हो जाता।
इसलिए बहस करनी है तो ये बताइए—
क्या संविधान का अनुच्छेद 16(4) गलत है?
क्या सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़े वर्गों को अवसर देने का सिद्धांत गलत है?
या सिर्फ इसलिए आरक्षण गलत है क्योंकि इसे 1990 में लागू किया गया?
तारीख बदलने से संवैधानिक प्रावधान गलत नहीं हो जाता। तर्क संविधान और तथ्यों पर होना चाहिए, सिर्फ “वोट बैंक” बोल देने पर नहीं।
Replying to @AnkitEditorial @AnilYadavmedia1
Ladte ladte yadav ji rastal me chale gye 1990 ke pahle general me the aap dusri bat kaun sambhidhan me likha hai reservation wo bhi naukri me netaon ne apne man se de diya vote bank ke chakar me
आरक्षण भीख नहीं, हक़ है।
घर में अगर 4 भाई हैं, तो बाप की संपत्ति बाँटते समय ये नहीं देखा जाता कि कौन ज्यादा योग्य है या किसने ज्यादा कमाया—हक़ इसलिए मिलता है क्योंकि वह परिवार का हिस्सा है।
इसी तरह लोकतंत्र और देश के संसाधनों में हर उस वर्ग की हिस्सेदारी होनी चाहिए जो इस समाज का हिस्सा है। अगर किसी वर्ग को ऐतिहासिक रूप से शिक्षा, अवसर और प्रतिनिधित्व में पीछे रखा गया है, तो उसे बराबरी तक पहुँचाने के लिए आरक्षण दिया जाता है।
आरक्षण किसी की मेहनत छीनने का नाम नहीं है, बल्कि उन लोगों को अवसर देने का माध्यम है जिन्हें लंबे समय तक अवसरों से दूर रखा गया।
और हाँ—
“योग्यता” की बात करने से पहले ये भी पूछो कि योग्यता दिखाने का मौका सबको बराबर मिला था या नहीं?
जिसे सदियों तक दौड़ में पीछे रखा गया, उसे बराबर की शुरुआत देने को भीख कहना ही असली अन्याय है।
आरक्षण पर बहस करनी है तो आँकड़ों और संविधान के आधार पर करो,
जातिगत अहंकार के आधार पर नहीं।
हक़ माँगने वाला भिखारी नहीं होता।
हक़ छीनने वाला भी दानी नहीं होता।
Replying to @AnkitEditorial @AnilYadavmedia1
भीख हक होता है ये किसने बोल दिया बे। तुम तो ऐसे ना थे।भाई तुम पूरी दुनिया से झूठ बोल लो पर अपने-आप से तो नहीं बोलो। दिल पे हाथ रखके कहो कि ये भीख नहीं है।भीमटे तो हो नहीं कि लाॅजिक से कोई वास्ता ही नहीं।भगवान कृष्ण के वंशज कहां भीख पे उतर आए।अपने आत्म सम्मान के साथ जियो यार।
नेता जी @jayantrld
BJP के साथ चल रहे हो, मंत्री भी बन गए…
अब आरक्षण पर भी कुछ बोलोगे या सिर्फ बकतोली करते रहोगे?
गन्ना किसान और ऊर्जा स्वाधीनता की बात अच्छी है, लेकिन आरक्षण का मुद्दा भी देश का है।
BJP सपोर्टर होने के नाते साफ-साफ बोलो…
वरना जनता कहेगी – सिर्फ बकतोली!
जो हाथ आरक्षण को छूना चाहेगा,
वो हाथ तोड़ दिया जाएगा!
आरक्षण हमारा हक है, हमारी लड़ाई है।
इसे छीनने की कोशिश करने वालों को याद रहे—
हम एकजुट हैं, हम जागृत हैं!
#आरक्षण_बचाओ
#AarakshanBachao
अखिलेश जी बिल्कुल सही कह रहे हैं!
‘आरक्षण सुधार’ के नाम पर ‘आरक्षण समाप्ति’ का षड्यंत्र पीडीए समाज के खिलाफ एक गहरी साजिश है।
आरक्षण किसी की इच्छा का विषय नहीं, यह पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) का हक है – जो उन्हें सदियों के शोषण और वंचना के बाद मिला है।
भाजपा और उनके साथी समय-समय पर ‘समीक्षा’, ‘सुधार’ या ‘क्रीमीलेयर’ जैसे अस्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल कर आरक्षण का विरोध करते हैं। ये सब सदियों से शोषित-वंचित लोगों के अधिकार की हकमारी के अलग-अलग मुखौटे हैं।
आरक्षण था, आरक्षण है, आरक्षण रहेगा!
जय पीडीए! जय सामाजिक न्याय!
#आरक्षण_बचाओ
‘आरक्षण सुधार’ के नाम पर ‘आरक्षण समाप्ति’ का षड्यंत्र पीडीए समाज के ख़िलाफ़ एक और गहरी साज़िश है। आरक्षण पीडीए का अधिकार है किसी की इच्छा का विषय नहीं।
भाजपा व उनके संगी-साथी समय-समय पर जिस तरह कभी ‘समीक्षा’ तो कभी ‘सुधार’ जैसे अस्पष्ट शब्दों का प्रयोग कर आरक्षण का विरोध करते हैं या कभी ‘क्रीमीलेयर’ की बात करते हैं या ‘आरक्षण त्यागने’ की सलाह देते हैं, वो सदियों से शोषित-वंचित लोगों को मिले आरक्षण के अधिकार की हक़मारी की लगातार की जा रही कोशिश के अलग-अलग मुखौटे हैं।
आरक्षण था, आरक्षण है, आरक्षण रहेगा!
Ankit Yadav retweeted
‘आरक्षण सुधार’ के नाम पर ‘आरक्षण समाप्ति’ का षड्यंत्र पीडीए समाज के ख़िलाफ़ एक और गहरी साज़िश है। आरक्षण पीडीए का अधिकार है किसी की इच्छा का विषय नहीं।
भाजपा व उनके संगी-साथी समय-समय पर जिस तरह कभी ‘समीक्षा’ तो कभी ‘सुधार’ जैसे अस्पष्ट शब्दों का प्रयोग कर आरक्षण का विरोध करते हैं या कभी ‘क्रीमीलेयर’ की बात करते हैं या ‘आरक्षण त्यागने’ की सलाह देते हैं, वो सदियों से शोषित-वंचित लोगों को मिले आरक्षण के अधिकार की हक़मारी की लगातार की जा रही कोशिश के अलग-अलग मुखौटे हैं।
आरक्षण था, आरक्षण है, आरक्षण रहेगा!
**यूपी के सरकारी स्कूलों में यूट्यूबर्स और बाहरी लोगों पर बैन**
यूपी के सरकारी स्कूलों में अब यूट्यूबर्स और बाहरी लोगों की एंट्री पर पाबंदी लगने लगी है। अयोध्या के BSA ने फरमान जारी कर दिया—बिना अनुमति फोटो-वीडियो बनाया तो कार्रवाई।
अयोध्या से पहले आजमगढ़, बलिया, बस्ती, बलरामपुर, शामली और आगरा में भी ऐसे ही आदेश आ चुके हैं।
कारण बताया जा रहा है कि पढ़ाई प्रभावित हो रही है और शिक्षक की इज्जत जाती है।
मजे की बात ये है कि पढ़ाई डिसटर्ब होने की शिकायत उन्हीं स्कूलों से आ रही है, जहां सालों से पढ़ाई नाम की चीज होती ही नहीं। खाली क्लासरूम, गायब टीचर, और बुनियादी सुविधाओं की कमी—ये सब जब कैमरे में कैद हो जाता है तो अचानक “पढ़ाई प्रभावित” का रोना शुरू हो जाता है।
सवाल ये है—असल में पढ़ाई बचाई जा रही है या सिर्फ हकीकत छिपाई जा रही है?