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यह पक्षी इस्कॉन मंदिर वृंदावन में रोजाना खिचड़ी परसाद खाने आता रहता है और वहां ब्रह्मचारी भक्तों से हरे कृष्णा बोलता है। देखा जाए पक्षी की यह जाति इंसान की तरह नहीं बोलती हा कुछ तोता बोल लेते है। पर यह पक्षी बोल रहा है।।देखे ध्यान से और जपें हरे कृष्णा हरे राम
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ॐ क्या है? – नाम नहीं, नाद है**
`ॐ` को ‘प्रणव’, ‘ओंकार’, ‘उद्गीथ’, ‘तारक मंत्र’ कहते हैं। ये कोई शब्द नहीं, ‘ध्वनि’ है – ब्रह्मांड की पहली ध्वनि।
वेद कहते हैं – "सृष्टि से पहले कुछ नहीं था, सिर्फ़ अंधकार। फिर एक कंपन हुआ – ॐ। उसी कंपन से आकाश बना, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी।"
**विज्ञान भी मानता है:** बिग-बैंग के समय जो ‘कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड’ ध्वनि रिकॉर्ड हुई, उसकी फ्रीक्वेंसी 7.83 Hz है – यही पृथ्वी की ‘शुमान रेजोनेंस’ है। और आश्चर्य – ॐ का उच्चारण करने पर हमारी जीभ-तालु से यही 7.83 Hz निकलती है।
इसलिए ॐ को ‘अनाहत नाद’ कहते हैं – जो बिना दो चीज़ों के टकराए पैदा होता है। ये दिल की धड़कन है ब्रह्मांड की।
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मैं ध्यान हूँ, मौन हूँ, एकांत हूँ, होश हूँ
में मगन खोया सा,जागरूकता अतंर आकाश हूँ ,
शांति, तृप्ति, आनंद, प्रेम में ही हर प्यास हूँ,
में निरस, निर्गुण, रंगहीन, निर्दोष, निर्विकार, निर्विचार अवस्था हूँ... शाश्वत, खालिपन और मुक्ति हूँ 🥰...
मुझे नहीं पता में कौन हूँ क्या हूँ क्यों हूँ, में सबका ज्ञाता हूँ, होकर भी नही हूँ , नहीं होकर भी हूँ 😅
जब हम सहस्रार चक्र में पहुंचते हैं तो समय शून्य हो जाता है।
हमारे सहस्रार चक्र में एक स्थान है शून्य चक्र,
जब हम कुण्डलिनी साधना के दौरान सहस्त्रार चक्र के नजदीक पहुंचने लगते हैं तो हमारे विचारों में लगने वाला सामान्य समय अचानक कम होने लगता है। जैसे-जैसे हम उस केंद्र के पास जाने लगते हैं तो हमारे विचारों का प्रवाह बहुत तेज होने लगता हैं। एक सेकंड में एक मिनट के विचार निकलने लगते हैं। शून्य समय में विचार बहुत तेज चलने लगते हैं या फिर अनंत हो जाते हैं।
कुंडलिनी साधना में बहुत ही गहरी साधना है। शून्य चक्र या बिंदु का ज़िक्र परंपरागत सात चक्रों में सीधे नहीं मिलता, पर योगतंत्र में सहस्रार के भीतर "निर्वाण चक्र", "महाशून्य" या "ब्रह्मरंध्र" के आसपास एक सूक्ष्म केंद्र होता है। जो समय, मन और अहंकार के पार की अवस्था है।
कुंडलिनी साधना के दौरान जैसे-जैसे चेतना सहस्रार/शून्य की ओर उठती है, मन की सामान्य गति टूट जाती है। एक सेकंड में एक मिनट के विचार वाला अनुभव "काल-संकोच" जैसा है। समय सापेक्ष लगने लगता है। ये ध्यान की गहरी अवस्थाओं में आम है।
साधना के दौरान अगर घबराहट होती है और अगर साधना रुकती है तो कुंडलिनी का रुकना शरीर-मन का सुरक्षा तंत्र है। जब ऊर्जा और चेतना सामान्य क्षमता से तेज़ बहने लगती है, तो नाड़ी तंत्र घबरा जाता है। घबराहट, धड़कन, पसीना - ये संकेत हैं कि सिस्टम ओवरलोड हो रहा था। कुंडलिनी का रुक जाना खुद को बचाने का तरीका है।
"शून्य" का अर्थ है विचारों का तेज़ होना नहीं, विचारों का मिट जाना।
जैसे नदी समुंदर में मिलकर नदी नहीं रहती। गति इतनी बढ़ जाती है कि वो रेखा से हटकर बिंदु बन जाती है। फिर बिंदु भी मिट जाता है। इसे "निर्विकल्प समाधि" कहते हैं। वहाँ विचार नहीं, सिर्फ बोध रहता है। एक सेकंड में अनंत विचार नहीं, विचार-शून्यता होती। काल का अनुभव ही खत्म हो जाता।
कुंडलिनी साधना के दौरान अगर घबराहट के बावजूद टिके रहते, तो अहंकार गल जाता है। "मैं" का भाव छूट जाता और गहरी शांति एवं एकत्व का बोध हो जाता है।
अगर कुंडलिनी साधना के दौरान घबराहट को शरीर सह न पाए तो कुंडलिनी मूलाधार में वापस गिर जाती है। कई बार साधक को महीनों असंतुलन का सामना करना पड़ता है।
कुंडलिनी साधना के दौरान अगर सब कुछ ठीक रहा तो सहज उत्थान होता है और साधक में ऊर्जा सहस्रार को पार कर पूरे शरीर में फैल जाती, "सहजावस्था" आती है।
शून्य केंद्र पर जबरदस्ती पहुँचना खतरनाक हो सकता है। बिना गुरु, बिना नाड़ी-शुद्धि, बिना प्राणायाम की तैयारी के ये अनुभव साइकॉसिस जैसा लग सकता है। घबराहट आई, इसका मतलब शरीर ने कह दिया "अभी नहीं"। ये गलत नहीं, सही सिग्नल है।
मूलाधार, स्वाधिष्ठान पर ज्यादा काम करो। दौड़ना, नंगे पैर मिट्टी पर चलना, भारी भोजन।
कुंडलिनी जागरण साधना अकेले करना जोखिम भरा है। किसी अनुभवी गुरु के सानिध्य में कीजिए जो ऊर्जा को समझता हो।
साधना के दौरान घबराहट आई तो रुक जाना ही समझदारी थी। सिद्धियों के पीछे मत भागो। तैयारी पहले, अनुभव बाद में।
इस अवस्था को पतंजलि "असम्प्रज्ञात समाधि" कहते हैं - जहाँ द्रष्टा, दृश्य और दर्शन एक हो जाते हैं। वहाँ समय नहीं बचता, इसलिए विचार तेज़ या धीमे का सवाल ही नहीं रहता।
क्या तुम्हारे गुरु हैं जो इस मार्ग पर तुम्हें गाइड कर रहे हैं........?
आज बस इतना ही......
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चैतन्य की चार अवस्थाएँ
मनुष्य केवल यह स्थूल शरीर नहीं है। उसके भीतर चेतना की एक अखण्ड धारा प्रवाहित होती रहती है।
ऋषियों ने उस चेतना की चार अवस्थाएँ बताई हैं।
जागृत — जहाँ इन्द्रियाँ बाह्य जगत का अनुभव करती हैं।
स्वप्न — जहाँ मन स्वयं अपना संसार रच लेता है।
सुषुप्ति — जहाँ न जगत रहता है, न अहंकार; केवल गहन विश्रांति रहती है।
तुरीय — जो इन तीनों का साक्षी है, शुद्ध चैतन्य स्वरूप।
जन्म और मृत्यु भी उसी चेतना के प्रवाह में घटित होने वाले परिवर्तन मात्र हैं। जैसे रात्रि के पश्चात पुनः प्रभात होता है, वैसे ही देह परिवर्तन के पश्चात चेतना पुनः नवीन यात्रा आरम्भ करती है।
साधना का वास्तविक उद्देश्य बाह्य जगत से पलायन नहीं, अपितु उस साक्षी को पहचानना है, जो जागृत में भी उपस्थित है, स्वप्न में भी, और सुषुप्ति में भी।
जब साधक यह जान लेता है कि
“मैं शरीर नहीं, मन नहीं, अपितु शुद्ध चैतन्य हूँ,”
तभी तुरीय के द्वार उद्घाटित होने लगते हैं।
दृश्य बदलते रहते हैं, परन्तु साक्षी चिरस्थिर रहता है।
॥ हरिः ॐ ॥
।। जय सनातन।।
क्या केवल किसी चीज़ को देखने से उसकी वास्तविकता बदल सकती है… सुनने में यह असंभव लगता है… लेकिन विज्ञान और अध्यात्म दोनों एक ऐसे रहस्य की ओर संकेत करते हैं जहाँ देखना केवल देखना नहीं रह जाता… बल्कि एक शक्ति बन जाता है। विज्ञान की दुनिया में इसे द्रष्टा प्रभाव कहा जाता है… और अध्यात्म की भाषा में इसे साक्षी भाव कहा गया है। पहली दृष्टि में ये दोनों बिल्कुल अलग लगते हैं… लेकिन जितना गहराई में उतरते हैं, उतना ही महसूस होता है कि दोनों किसी एक ही गहरे सत्य की ओर इशारा कर रहे हैं। विज्ञान कहता है कि सूक्ष्म स्तर पर किसी कण को देखने मात्र से उसका व्यवहार बदल जाता है… अर्थात देखने वाला केवल बाहर खड़ा दर्शक नहीं है… उसकी उपस्थिति स्वयं परिणाम को प्रभावित कर सकती है। वहीं अध्यात्म हजारों वर्षों से कहता आया है कि जब मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को साक्षी बनकर देखने लगता है, तो भीतर परिवर्तन शुरू हो जाता है। यहाँ सबसे गहरी बात यह है कि दोनों ही जगह पहचान बदलती है। विज्ञान में देखने वाला प्रयोग का हिस्सा बन जाता है… और अध्यात्म में मनुष्य अपने विचारों से हटकर देखने वाला बन जाता है। साक्षी भाव का अर्थ है बिना प्रतिक्रिया दिए, बिना निर्णय किए, केवल देखना। जैसे आकाश बादलों को देखता है… बादल आते हैं, जाते हैं… लेकिन आकाश उनसे चिपकता नहीं। उसी प्रकार जब व्यक्ति अपने मन को साक्षी बनकर देखने लगता है, तो धीरे-धीरे वह समझने लगता है कि वह विचार नहीं है… वह उन्हें देखने वाली चेतना है। और यही बिंदु भीतर की स्वतंत्रता की शुरुआत है। क्योंकि सामान्य अवस्था में मनुष्य हर विचार से जुड़ जाता है… क्रोध आया तो स्वयं को क्रोधित मान लेता है… दुख आया तो स्वयं को दुखी मान लेता है। लेकिन साक्षी भाव में धीरे-धीरे यह बदलता है। अब वह देखता है कि क्रोध उठ रहा है… दुख अनुभव हो रहा है… अर्थात पहचान विचारों से हटकर चेतना में आने लगती है। अब द्रष्टा प्रभाव और साक्षी भाव पूरी तरह एक ही चीज़ हैं या नहीं… यह कहना आसान नहीं। लेकिन दोनों एक गहरे संकेत अवश्य देते हैं कि देखने वाले की अवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण है। अध्यात्म कहता है कि जिस चेतना से आप जीवन को देखते हैं… वही आपके अनुभवों की गुणवत्ता निर्धारित करती है। यदि भीतर भय है… तो संसार भयपूर्ण प्रतीत होगा। यदि भीतर शांति है… तो वही संसार अलग अनुभव होगा। यही कारण है कि दो व्यक्ति एक ही परिस्थिति में होकर भी बिल्कुल अलग अनुभव करते हैं। अब साक्षी भाव का अभ्यास कैसे करें… सबसे पहले अपने विचारों को देखना प्रारंभ कीजिए। उन्हें रोकने का प्रयास मत कीजिए… केवल देखिए कि वे कैसे आते हैं और चले जाते हैं। दूसरा… भावनाओं को महसूस कीजिए… लेकिन उनमें डूबिए मत। तीसरा… दिन में कुछ समय अपनी श्वास पर ध्यान दीजिए। क्योंकि श्वास आपको वर्तमान में लाती है… और वर्तमान ही साक्षी भाव का द्वार है। धीरे-धीरे आप अनुभव करेंगे कि आपके भीतर एक ऐसी स्थिर उपस्थिति है… जो हर अनुभव को देख रही है… लेकिन स्वयं कभी नहीं बदलती। और शायद यही वह स्थान है जहाँ विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे को स्पर्श करते हैं। दोनों यह संकेत देते हैं कि देखने वाला उतना साधारण नहीं है जितना हम समझते हैं। संभव है वास्तविक परिवर्तन बाहर की दुनिया को बदलने से पहले देखने वाले की चेतना में होता हो… और जब देखने वाला बदलता है… तब अनुभव की पूरी दुनिया बदलने लगती है…
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गुरु से काम नहीं चलेगा सद्गुरु की शरण में जाएँ |
*सद्गुरु हमारे अंतःकरण में निवास करता है यह "प्रकाश" केवल रोशनी नहीं, बल्कि सही मार्ग की प्रेरणा है, जिसे ऋतम्भरा प्रज्ञा भी कहा गया है। सद्गुरु का उपदेश बाहरी गुरु की तरह विविध और भौतिक नहीं होता, बल्कि एक ही मूल संदेश देता है—अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर चलने का।...
🔹 जीवात्मा क्या होती है? (श्रीकृष्ण–अर्जुन संवाद के आधार पर)🍁
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच जो संवाद हुआ, उसमें “जीवात्मा” का गहरा रहस्य बताया गया है।
👉 जीवात्मा वह शाश्वत (नित्य) आत्मा है जो हर जीव के भीतर निवास करती है।
यह न जन्म लेती है, न मरती है
शरीर बदलता है, लेकिन आत्मा नहीं
जैसे इंसान पुराने कपड़े छोड़कर नए पहनता है, वैसे ही आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरा धारण करती है
📖 श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं:
“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः…”
अर्थात आत्मा को कोई हथियार काट नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती।
👉
हम शरीर नहीं, आत्मा हैं
मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है, अंत नहीं
🔸
जीवन और मृत्यु के बीच जो सत्य छुपा है, वही है जीवात्मा।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है।
जब हम इस सत्य को समझ लेते हैं, तब डर, मोह और भ्रम अपने आप समाप्त हो जाते हैं।
जीवन का असली अर्थ तब सामने आता है—अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा से निभाना।
✨ हम शरीर नहीं, आत्मा हैं… और आत्मा अमर है।
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**विशुद्धि चक्र की शक्ति : कंठ में छुपा ब्रह्मांड का द्वार**
*जब आपकी वाणी ही वरदान बन जाए*
विशुद्धि चक्र सिर्फ "गला" नहीं है। यह 72,000 नाड़ियों का जंक्शन है, जहां से आपकी चेतना शब्द बनकर ब्रह्मांड में जाती है। ऋषि कहते हैं - "जिसका विशुद्धि जागृत, उसकी वाणी वेद के समान।" यह चक्र आपको इंसान से "स्रष्टा" बनाता है। क्योंकि सृष्टि की शुरुआत भी "शब्द" से हुई थी - "नाद ब्रह्म"।
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विशुद्धि चक्र की शक्ति का रहस्य: क्यों है ये सबसे खास?**
सेतु चक्र**: 7 चक्रों में विशुद्धि बीच में है। नीचे के 3 चक्र - मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर - पशु प्रवृत्ति, भावना, अहंकार के हैं। ऊपर के 2 चक्र - आज्ञा, सहस्रार - देवत्व, ज्ञान के हैं।
विशुद्धि वो "फ़िल्टर" है जो पशु को देवता बनाता है। यहां आकर काम, क्रोध, लोभ "शुद्ध" होकर करुणा, सत्य, रचनात्मकता बनते हैं। इसलिए नाम "विशुद्धि" - विशेष शुद्धि।
आकाश तत्व का केंद्र**: पंच तत्वों में आकाश सबसे सूक्ष्म है। यह सब तत्वों को जगह देता है। आपका विशुद्धि जागृत हो तो आप "स्पेस" बन जाते हैं - दूसरों की बात सुनने की जगह, नए विचार आने की जगह, ब्रह्मांड की ध्वनि सुनने की जगह।
कर्म का बीज**: गीता में कृष्ण कहते हैं - "अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्"। यानी ऐसी वाणी जो उद्वेग न करे, सत्य हो, प्रिय हो, हितकारी हो - वो तप है। विशुद्धि की शक्ति से आपकी हर बात "तप" बन जाती है।
वाक्य से राक्षस कांप गए।
- **सीता जी से संवाद**: इतने मधुर शब्द कि सीता जी को पुत्र जैसा विश्वास हुआ।
- **रावण की सभा**: निर्भय होकर धर्म का उपदेश। ये वाक् सिद्धि है।
**B. सरस्वती माता**: वीणा की झंकार = नाद ब्रह्म। जो सरस्वती की कृपा पा ले, उसकी जिह्वा पर सरस्वती बैठ जाती है। कालिदास गूंगा था, माँ की कृपा से "महाकवि" बना।
**C. नीलकंठ शिव**: दुनिया का विष पीकर भी "शिव" बने रहे। ये विशुद्धि की सबसे बड़ी शक्ति - नकारात्मकता को पॉजिटिव में बदलना। आज ट्रोल, गाली, ऑफिस पॉलिटिक्स = कलयुग का हलाहल। जागृत विशुद्धि वाला सब पचा लेता है।
सुकरात**: जहर का प्याला पीने से पहले बोला - "मृत्यु से नहीं डरता, असत्य से डरता हूं"। ये विशुद्धि का बल है।
4. विशुद्धि चक्र बंद है तो क्या होता है? शक्ति का उल्टा रूप**
**शक्ति का श्राप बन जाना**:
| बंद विशुद्धि | परिणाम |
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| **झूठ बोलना** | धीरे-धीरे आत्मा की आवाज सुनना बंद, Intuition खत्म |
| **गाली, चुगली** | वाणी की शक्ति नष्ट, बोला हुआ उल्टा पड़ता है |
| **बात मन में रखना** | थायरॉइड, टॉन्सिल, सर्वाइकल, डिप्रेशन |
| **बहुत बोलना** | ऊर्जा लीक, लोग सीरियस नहीं लेते, सम्मान कम |
| **दूसरों को टोकना** | दिव्य श्रवण बंद, सिर्फ अपना ही शोर सुनाई देता है |
**कलयुग की बीमारी**: आज 80% लोगों का विशुद्धि ब्लॉक है। कारण - बचपन से "चुप रहो", सोशल मीडिया पर ट्रोल का डर, 9-5 जॉब में "Yes Boss" बोलने की मजबूरी। नतीजा - थायरॉइड महामारी, एंग्जायटी, वॉयस इश्यू 7. विशुद्धि चक्र जागरण के 9 शारीरिक संकेत**
1. **गले में गुदगुदी**: जप करते समय चींटी चलने जैसा लगे
2. **आवाज बदलना**: ज्यादा गंभीर, मधुर या भारी हो जाना
3. **नीले रंग का आकर्षण**: अचानक नीले कपड़े, आकाश अच्छा लगना
4. **सपने**: नीला कमल, आकाश, पक्षी, सरस्वती दिखना
5. **संगीत प्रेम**: भजन, राग, बांसुरी से रोमांच होना
6. **सच से बेचैनी**: झूठ बोलते ही गला सूखना, घबराहट
7. **कान में ॐ**: मेडिटेशन में भंवरे/शंख जैसी आवाज
8. **गर्दन दर्द फिर आराम**: पहले ब्लॉक खुलने से दर्द, फिर हल्कापन
9. **लोगों का ध्यान**: आप बोलो तो पिन-ड्रॉप साइलेंस हो जाए
ये संकेत दिखें तो समझो शक्ति जाग रही है। डरो मत, अभ्यास जारी रखो।
8. सावधानियां: शक्ति का दुरुपयोग मत करो**
विशुद्धि की शक्ति "परमाणु ऊर्जा" जैसी है। गलत इस्तेमाल से खुद का नाश:
1. **श्राप मत दो**: गुस्से में बोला शब्द लग जाता है। कर्म वापस आता है।
2. **गुरु निंदा मत करो**: विशुद्धि सीधा गुरु तत्व से जुड़ा है। निंदा से 12 साल ब्लॉक।
3. **डींग मत हांको**: "मैं ज्ञानी हूं" बोलते ही शक्ति क्षीण। मौन रहो।
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अधिक मास* _( पुरुषोत्तम मास)_ महिमा.
17 मई से 15 जून तक
जप, ध्यान, सत्संग* विशेष ,पुण्यदायी है
धरती पर शयन, पत्तल में भोजन और ब्रह्मचर्य व्रत पालन से विशेष पुण्य होता है
रोज दोपहर को 🍲भोजन से पहले
श्रीमद्भगवद्गीता जी के 15 वें अध्याय का पाठ करें
तो 💰लक्ष्मी माता विशेष 🙌🏼प्रसन्न होती हैं l
दीप दान करें* - मंदिर, गुरु द्वार, पीपल देव में
जो व्यक्ति चतुर्मास में अथवा अधिक मास ( पुरूषोत्तम ) में भगवान को कनरे के पुष्प अर्पित करता है*, उस पर लक्ष्मी जी की कृपा बनी रहती हैं ।उसे आरोग्य एवं शांति की प्राप्ति होती है तथा उसके संकट दूर होते हैं
10, 000 वर्ष गंगा स्नान करने से जो पुण्य मिलता है वही पुण्य* _इस पुरुषोत्तम मास में *सूर्योदय से पूर्व* स्नान करने से प्राप्त होता है
इस माह में केवल ईश्वर के उद्देश्य से* जो जप, सत्संग व सत्कथा-श्रवण, हरिकीर्तन, व्रत, उपवास, स्नान, दान या पूजनादि किये जाते हैं, *उनका अक्षय फल होता है और व्रती के सम्पूर्ण अनिष्ट नष्ट हो जाते हैं
इस मास में श्रीमद्भगवद्गीता जी के 15वें अध्याय का अर्थसहित प्रेमपूर्वक पाठ* _करना और 🐂गायों को घास व दाना खिलाना चाहिए । इस मास में आँवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करना अधिक प्रसन्नता और स्वास्थ्य देता है
पुरुषोत्तम मास में जप, सत्संग, ध्यान, पुण्यकर्म, आत्म-चिंतन आदि करना विशेष लाभकारी है। न* _इस मास में मांगलिक कार्य विवाह, नामकरण, जनेऊ संस्कार गृहप्रवेश आदि वर्जित हैं
अधिक मास में आँवले और तिल का उबटन शरीर पर मलकर स्नान करना और आँवले के वृक्ष के नीचे भोजन करना* - _यह भगवान श्री पुरुषोत्तम को अतिशय प्रिय है, साथ ही स्वास्थ्यप्रद और प्रसन्ताप्रद भी है।_ *यह व्रत करने वाले लोग बहुत पुण्यवान हो जाते हैं
अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में तुलसी पूजन से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है*_जिससे घर में सुख-समृद्धि, धन और आरोग्य आता है। इस दौरान सुबह जल अर्पित करना और शाम को घी का दीपक जलाना अत्यंत फलदायी है, जो घर से नकारात्मकता दूर करता है
अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में भगवान विष्णु के सामने *तुलसी की सूखी लकड़ी का दीपदान करना अत्यंत पवित्र और 1000 गुना अधिक फलदायी* माना गया है, जो कार्तिक मास के बराबर पुण्य देता है।
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जय श्रीराम
11 मई 2026 मंगल का मेष राशि में प्रवेश
11 मई को मंगल ग्रह मेष राशि और अश्विनी नक्षत्र में गोचर करेगा, जिसका सिंह, कन्या, तुला और वृश्चिक राशियों पर विशेष प्रभाव पड़ेगा। इस गोचर से रुके हुए काम पूरे होंगे, शिक्षा में सफलता मिलेगी और आत्मविश्वास बढ़ेगा, हालांकि वाणी पर नियंत्रण रखना होगा।
राशियों पर प्रभाव (2026)
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A- मेष राशि आत्मविश्वास बढ़ेगा, रुके कार्य पूरे होंगे।
B- वृषभ/कर्क/तुला/मकर/मीन: इन राशियों को मानसिक अशांति, आर्थिक नुकसान या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिए सावधान रहना चाहिए।
C- मिथुन/सिंह/धनु/कुंभ: करियर में तरक्की और आर्थिक लाभ मिलने की संभावना है।
इस गोचर पर खास प्रभाव सिंह, कन्या, तुला और वृश्चिक राशियों पर पड़ेगा। रुके हुए काम पूरे होंगे। शिक्षा के क्षेत्र में कोई खुशखबरी मिलेगी। वाणी पर काबू रखें। आत्मविश्वास में वृद्धि देखने को मिलेगी। मंगलदेव का मेष राशि और अश्विनी नक्षत्र में गोचर का समय 4 राशियों के लिए कैसा रहेगा।
इन चार राशियों पर शुभ प्रभाव
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1. सिंह राशि
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मंगलदेव आपके नवम भाव (भाग्य और धर्म का क्षेत्र) में गोचर कर रहे हैं। भाग्य का सहयोग मिलने से आपके रुके हुए काम पूरे होंगे। लंबी दूरी की यात्रा या शिक्षा के क्षेत्र में शुभ परिणाम प्राप्त होंगे। आप पूरे साहस के साथ अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ेंगे, बस घर के सदस्यों के साथ तालमेल बनाए रखें।
उपाय: अपने पिता या गुरुजनों का आशीर्वाद लें और फिजूलखर्ची से बचें।
2. कन्या राशि
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मंगलदेव आपके अष्टम भाव (आयु और परिवर्तन का क्षेत्र) में गोचर कर रहे हैं। यह समय जीवन में कुछ अचानक बदलाव ला सकता है। मानसिक रूप से थोड़े उतार-चढ़ाव महसूस हो सकते हैं। वाणी पर नियंत्रण रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि आपकी कड़ी भाषा रिश्तों पर बुरा असर डाल सकती है।
उपाय: जोखिम भरे कार्यों और झगड़ों से खुद को दूर रखें। मंगलवार को लाल वस्त्र का दान करें।
3. तुला राशि
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मंगलदेव आपके सप्तम भाव (विवाह और साझेदारी का क्षेत्र) में गोचर कर रहे हैं। यह गोचर आपके दांपत्य जीवन और व्यापारिक साझेदारियों पर प्रभाव डालेगा। जीवनसाथी के साथ वर्चस्व की लड़ाई से बचें। करियर में आपको तरक्की के नए मौके मिलेंगे और आपके आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होगी।
उपाय: रिश्तों में शांति बनाए रखें और नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करें।
4. वृश्चिक राशि
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मंगलदेव आपके षष्ठ भाव (रोग, ऋण और शत्रु का क्षेत्र) में गोचर कर रहे हैं। यह स्थिति आपको अपने विरोधियों और प्रतियोगिताओं में जीत दिलाएगी। आप पहले से अधिक ऊर्जावान और लक्ष्य के प्रति समर्पित रहेंगे। कार्यक्षेत्र में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बहस से बचें और अपने अनुशासन पर ध्यान दें।
उपाय: प्रतिदिन उगते सूर्यदेव को जल चढ़ाएं और विवादों से दूर रहें।
ज्योतिषविद् वरुण शास्त्री
इन चार राशियों पर अशुभ प्रभाव
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1- कर्क राशि: करियर और घर में बढ़ सकता है तनाव
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कर्क राशि वालों के लिए मंगल का यह गोचर मानसिक अशांति ला सकता है। कार्यस्थल पर सहकर्मियों या बॉस के साथ वाद-विवाद होने की आशंका है। वाणी पर नियंत्रण न रखने से बनते काम बिगड़ सकते हैं। इस दौरान माता के स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता बनी रह सकती है।
2. तुला राशि वैवाहिक जीवन और पार्टनरशिप में दरार
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तुला राशि के जातकों के लिए मंगल का प्रभाव रिश्तों में कड़वाहट घोल सकता है। जीवनसाथी के साथ छोटी-छोटी बातों पर बड़ा झगड़ा होने के योग हैं। अगर आप पार्टनरशिप में बिजनेस कर रहे हैं, तो पैसों के लेनदेन को लेकर पारदर्शिता रखें, वरना बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
3. मकर राशि: प्रॉपर्टी विवाद व एक्सीडेंट का डर
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मकर राशि वालों को इस गोचर के दौरान वाहन चलाते समय बेहद सावधान रहना चाहिए। चोट लगने या दुर्घटना होने की संभावना है। घर-परिवार में संपत्ति को लेकर विवाद गहरा सकता है। घरेलू सुख- सुविधाओं में कमी महसूस होगी और बेमतलब के खर्चों से बजट बिगड़ सकता है।
4. मीन राशि: धन हानि और वाणी दोष
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मीन राशि के जातकों के लिए मंगल का मेष में जाना 'धन हानि' के संकेत दे रहा है।आपकी कटु वाणी आपके अपनों को नाराज कर सकती है। निवेश के लिए यह समय बिल्कुल सही नहीं है, पैसा डूबने का खतरा है। आंखों या पेट से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं परेशान कर सकती हैं।
(मंगल के इस गोचर में शुभ फल बढ़ाने और अशुभ फल से बचने हेतु श्री महाबली हनुमान जी की आराधना करनी चाहिए। इस समय बड़ा मंगल मास भी चल रहे है।
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दूसरों को बदलने की कोशिश अक्सर टकराव पैदा करती है, लेकिन उन्हें समर्थ बनाने की शुभभावना जीवन में शान्ति लाती है। *जब हम किसी की कमियों पर ध्यान देने के बजाय उनकी आत्मिक शक्ति को पहचानते हैं, तब हमारा व्यवहार स्वतः सहयोगी बन जाता है
सच्चा दान उपदेश देने में नहीं, बल्कि अपने गुणों, अपनी स्थिरता और अपने शुभ संकल्पों से दूसरे को सशक्त बनाने में है
जब हमारी दृष्टि सुधारने की नहीं, समर्थ करने की होती है, तब सामने वाली आत्मा भी स्वयं को बदलने की प्रेरणा पाती है
यही रूहानी दान है, जो बिना शब्दों के भी गहराई से कार्य करता है
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हृदय के भाव
कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध को रोकने के लिए भगवान कृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर गए थे दुर्योधन ने कृष्ण को प्रभावित करने के लिए बहुत बड़ी तैयारी की थी उसने सोने की थालियों में छप्पन प्रकार के व्यंजन बनवाए और सोचा कि कृष्ण इन सुख-सुविधाओं से प्रसन्न हो जाएंगे।
जब कृष्ण सभा में पहुँचे, तो दुर्योधन ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। लेकिन कृष्ण ने बड़ी विनम्रता और स्पष्टता से कहा
दुर्योधन, भोजन के केवल दो कारण होते हैं—या तो खिलाने वाले के मन में प्रेम हो, या खाने वाले को बहुत भूख हो। यहाँ न तो तुम्हें मुझसे प्रेम है और न ही मुझे भूख है
इसलिए तुम्हारा यह अहंकारी भोजन मुझे स्वीकार नहीं
दुर्योधन के राजमहल को छोड़कर कृष्ण सीधे महात्मा विदुर के घर पहुँचे। विदुर जी उस समय घर पर नहीं थे, केवल उनकी पत्नी सुलभा (विदुरानी) घर पर थीं जब उन्होंने देखा कि साक्षात द्वारिकाधीश उनके द्वार पर खड़े हैं, तो वे सुध-बुध खो बैठीं
वे इतनी भावुक हो गईं कि उन्हें समझ नहीं आया कि भगवान का स्वागत कैसे करें उनके पास न तो बैठने के लिए कोई कीमती आसन था और न ही खिलाने के लिए कोई पकवान
विदुरानी जी ने भगवान को बिठाया और घर में रखे हुए कुछ केले लेकर आईं भगवान कृष्ण ने कहा, "काकी, मुझे बड़ी भूख लगी है, जल्दी से कुछ खाने को दो
भगवान की भूख का सुनकर विदुरानी और भी व्याकुल हो गईं वे कृष्ण के चेहरे को एकटक निहारते हुए केले छीलने लगीं प्रेम की अतिशयता और तल्लीनता में उन्होंने केला तो फेंक दिया और छिलका कृष्ण के हाथ में दे दिया
भगवान कृष्ण भक्त के उस प्रेममयी पागलपन को देख रहे थे। उन्होंने बिना कुछ कहे बड़े चाव से वह छिलका खाना शुरू कर दिया। वे ऐसे खा रहे थे जैसे उन्होंने इससे अधिक स्वादिष्ट वस्तु कभी चखी ही न हो
इतने में विदुर जी घर आए और यह दृश्य देखकर चौंक गए। उन्होंने चिल्लाकर कहा, "अरी ओ पगली! यह तू क्या कर रही है? साक्षात भगवान को केले के छिलके खिला रही है
विदुरानी होश में आईं और अपनी भूल पर लज्जित होकर रोने लगीं। विदुर जी ने तुरंत केले का गूदा (फल) कृष्ण की ओर बढ़ाया। कृष्ण ने एक ग्रास खाया और मुस्कुराकर कहा
विदुर जी, इस केले में वह स्वाद कहाँ, जो काकी के उन छिलकों में था! वह छिलके केवल छिलके नहीं थे, वे शुद्ध प्रेम में डूबे हुए थे
यह *कथा* हमें 'प्रेम-लक्षणा भक्ति' का परिचय देती है.
निष्कपटता:* भगवान को दिखावा पसंद नहीं है
*शरणागति:* विदुरानी के पास कुछ नहीं था, लेकिन जो था (प्रेम), वह पूर्ण था
ईश्वर का स्वभाव:* भगवान भक्तों के दोष नहीं देखते, वे केवल उनके हृदय के भाव को ग्रहण करते हैं
इसीलिए भक्त गाते हैं
सबसे ऊँची प्रेम सगाई, दुर्योधन की मेवा त्यागी, साग विदुर घर खाई
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राहु महादशा, अन्तरर्दशा क्या राजयोग देगी
राहु कई जातक/जातिकाओ पर वर्तमान महादशा समय मे चल रही होगी तो भविष्य में अब कुछ जातको पर आने वाली होगी पहले तो यह स्पष्ट कर दूं कि राहु जो राजयोग देता है वह बहुत ज्यादा लाभ वाला राजयोग होता है और बहुत कम समय मे बहुत कुछ हासिल करा देगा क्योंकि राहु जब राजयोग में होता है तब सभी ग्रहों की राजयोग कारक शक्ति को यह अपने अंदर समाहित कर लेता है और वर्तमान युग राहु का ही है
आज सब काम ऑनलाइन होते है जो कि ऑनलाइन, इंटरनेट राहु है, पलक छपकते ही बहुत अच्छी कामयाबी, पलक छपकते ही ज़िन्दगी चमक जाना, यह राहु से मिलने वाले राजयोगों का ही कमाल होता है अन्य किसी ग्रह में इतनी शक्ति नही की राजयोग पलक छपकते दे सके,मतलब बहुत जल्द सर्व सुख जैसे मकान, वाहन, संपत्ति ,धन, ऐश्वर्य, प्रतिष्ठत रोजगार आदि राजयोग देता है।अब राजयोग मतलब जब भी केंद्र और त्रिकोण के स्वामी आपस मे बैठे होंगे और राहु केतु इनके साथ शुभ सम्बन्ध में होंगे या राहु कुंण्डली में जिस राशि मे बैठा हो, उस राशि का स्वामी राजयोग बनाकर बैठा हो और राहु केतु दोनों शुभ स्थिति में हो तब राहु और राहु की महादशा-अन्तरदशाये बहुत बड़े स्तर पर राजयोग के उपरोक्त फल दिलाता है
अब राहु कैसे और अपनी दशा में कैसे राजयोग किन जातक/जातिकाओ को देता है इस बात को उदाहरण से समझते है
उदाहरण अनुसार वृष लग्न
वृष लग्न में जैसे शुक्र शनि सम्बन्ध बनने से यह राजयोग बनेगा,अब राहु इन्ही शुक्र शनि के साथ राजयोग में शुभ स्थिति में बैठ जाये जैसे शनि शुक्र राहु 11वे भाव मे जाकर बैठ जाये तब ऐसी स्थिति में व्यक्ति ने जो सपने देखे होते है उससे अच्छा राजयोग सुख मिलेंगे क्योंकि राहु यहां लग्नेश शुक्र+भाग्येश-कर्मेश शनि के साथ प्रबल राजयोग में है.
उदाहरण अनुसार कन्या लग्न
कन्या लग्न में दसवे भाव मे बैठा हो मिथुन राशि का,मिथुन राशि मे राहु उच्च होकर बलवान भी होता है, अब राहु का राशि स्वामी(मिथुन राशि) बुध राजयोग बनाकर शुक्र या शनि के साथ हो या शुक्र शनि दोनों के साथ हो या गुरु के साथ को और बुध से बनने वाला राजयोग पीड़ित या अशुभ किसी भी तरह न हो और न राहु से बुध से बनने वाला राजयोग पीड़ित हो रहा हो तब राहु इतना शक्तिशाली उच्च राजयोग देगा की फर्श से अर्श तक जातक जाएगा, राजनीति/व्यापार आदि से बड़ी सफलता , बड़ा राजयोग सुख मिल जाता है क्योंकि राहु राजनीति है और राजनीति के घर 10वे भाव मे है और राहु राशि स्वामी बुध राजयोग ने होने से राहु राजयोग बहुत बड़े स्तर पर देगा
कुंभ लग्न में केंद्र त्रिकोण स्वामी शुक्र और त्रिकोण स्वामी बुध एक साथ बैठे हो राजयोग बनाकर और अब राहु भी बुध शुक्र के साथ बैठ जाये या इनके दृष्टि सम्बन्ध बना ले , जैसे शुक्र बुध राहु दूसरे भाव(धन भाव) मे बैठ जाये तब यहाँ एक तो राहु आर्थिक रूप से बहुत ज्यादा उन्नति देगा और बड़े स्तर का राजयोग देकर जातक की किस्मत ही चकमायेगा क्योंकि धन के घर मे राजतोग बनाकर शुक्र बुध के साथ यहाँ राहु बैठा हैं
राहु या केतु कुंण्डली मे राजयोग बनाकर बैठे होते है तब राहु केतु का थोड़ा उपाय करते रहने से राजयोग ज्यादा मात्रा में फलित होता है क्योंकि राहु केतु जिन ग्रहों के साथ राजयोग में बैठें हो यदि उन ग्रहों की राशियों को पीड़ित करेंगे तो बिघ्न थोड़ा फल में कर देते है इस कारण राहु राजयोग में हो तब बहुत बड़े स्तर पर राजयोग मिलते है दूसरी बात आज के इस युग मे सभी ज्यादातर चीजे उपभोग की राहु के अधिकार में ही है जैसे ऑनलाइन काम , मोबाइल वर्क , मकान आदि की बनाबट, रोजगार आदि इस कारण आज के समय मे असली राजयोग राहु के सहयोग से मिलता है जिनकी कुण्डली मे राहु राजयोग में है और जिनकी कुंडली मे राहु राजयोग में नही है और राहु के बिना राजयोग है तब बिना राहु वाले राजयोगों की अपेक्षा राहु से बनने वाले राजयोग वाले जातक जातिक जीवन मे ज्यादा चमकते है
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How the Gunas Quietly Control Human Behaviour
The Gita and Sankhya teachings state that behaviour is not entirely self directed... It is shaped by the constant interplay of three forces… the gunas.
Sattva… the quality of clarity and balance
It produces calmness, understanding, compassion, and stable judgement
Rajas… the quality of activity and desire
It drives ambition, restlessness, comparison, and constant movement
Tamas… the quality of inertia and obscuration
It produces laziness, confusion, resistance, and dullness
Every thought, emotion, and action arises under the influence of these three
When Sattva dominates… actions are thoughtful and aligned
When Rajas dominates… actions become driven and reactive
When Tamas dominates… actions become careless or absent
The sense of “I am choosing freely” is often incomplete
Choices are conditioned by the current state of the gunas
This is why the Gita says… the gunas act upon the gunas... Yet the deluded self thinks… I am the doer
Spiritual growth is not suppressing action
It is understanding and refining the gunas
What appears as personality... is the shifting dominance of sattva, rajas, and tamas.
Observe the gunas... and behaviour becomes intelligible
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Karmanye Vādhikāraste” (Gita 2.47) Action Without Attachment Explained
This verse teaches one of the most profound principles of the Bhagavad Gita… you have a right to action, but not to the fruits of action
It does not ask you to stop acting, but to stop binding your identity to outcomes
Attachment to results creates anxiety, fear, and disappointment, because the outcome is never fully in your control
Action, however, is always in your hands. When you shift focus from results to right effort, the mind becomes steady and free from agitation
Act with full sincerity and skill… but let go of the need to control the result. This is not indifference… it is inner freedom
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हनुमान चालीसा वहीं दीपक हैं जो अंधकार में रास्ता दिखाता है
सत्ता जब अहंकार में डूब जाती है, तब उसे यह भान नहीं रहता कि संत को बंदी बनाया जा सकता है…
पर उसकी भक्ति को नहीं
यह घटना उस युग की है, जब दिल्ली की गद्दी पर अकबर का शासन था और भारत की आत्मा में राम नाम की धारा बह रही थी। उस धारा के सबसे प्रखर प्रवाह थे — गोस्वामी तुलसीदास जी
तुलसीदास जी कोई दरबारी कवि नहीं थे, वे किसी राजा की प्रशंसा के लिए नहीं लिखते थे
वे तो राम के दास थे — और राम ही उनके राजा थे।
एक बार अकबर के कानों तक यह बात पहुँची कि तुलसीदास जी ने मृत व्यक्ति को जीवित कर दिया है।
दरबारियों ने इसे चमत्कार कहा,
पर अकबर के मन में जिज्ञासा नहीं,
अहंकार जाग उठा
उसने संदेश भिजवाया —तुलसीदास को हमारे दरबार में उपस्थित किया जाए
तुलसीदास जी ने विनम्रता से मना कर दिया
उन्होंने कहा —मैं किसी राजा के दरबार में नहीं जाता, मैं तो केवल राम के चरणों में बैठता हूँ
यह उत्तर अकबर को चुभ गया
जिस सत्ता ने बड़े-बड़े राजाओं को झुकाया था,
वह एक संत की अस्वीकृति सहन न कर सकी
आदेश हुआ —तुलसीदास को बलपूर्वक बंदी बनाकर दरबार में लाया जाए
दरबार में पहुँचते ही अकबर ने कहा —सुना है, तुम चमत्कार करते हो, मुर्दों को जिंदा कर देते हो, हमें भी कोई चमत्कार दिखाओ
तुलसीदास जी शांत थे
उनके मुख पर न भय था, न गर्व
उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा मैं कोई चमत्कार नहीं करता, मैं तो केवल राम नाम का जप करता हूँ और यदि कोई चमत्कार है,
तो वह राम नाम में है… मुझमें नहीं
यह सुनकर अकबर क्रोधित हो उठा।
जिस राजा ने स्वयं को खुदा का साया समझ लिया था,
उसे यह स्वीकार न था कि कोई शक्ति उससे ऊपर भी हो सकती है
आदेश हुआ इसे जेल में डाल दिया जाए।
तुलसीदास जी को फतेहपुर सीकरी की कारागार में बंद कर दिया गया
अंधेरी कोठरी
बेड़ियाँ
पर मन पूरी तरह स्वतंत्र।
जहाँ एक साधारण मनुष्य टूट जाता,
वहीं तुलसीदास जी ने राम नाम का दीप जला लिया।
उसी कारागार में,
उनके हृदय से एक अनुपम स्तुति का प्रवाह फूटा
हनुमान चालीसा
कहा जाता है कि वे प्रतिदिन केवल एक चौपाई लिखते थे।
एक चौपाई… एक दिन
पूरी श्रद्धा, पूरी एकाग्रता के साथ
कारागार की दीवारें मंत्रों से गूँजने लगीं।
राम नाम का कंपन वातावरण में फैलने लगा
और जैसे-जैसे चालीसा पूर्णता की ओर बढ़ी,
वैसे-वैसे फतेहपुर सीकरी में विचित्र घटनाएँ होने लगीं
अचानक एक दिन
हजारों की संख्या में बंदर नगर में आ गए।
छतों पर… महलों में
सेनाओं के बीच
किसी के वश में नहीं
दरबार में हड़कंप मच गया
सैनिक असहाय थे
हथियार बेकार हो चुके थे
तब अकबर के एक विवेकशील सलाहकार ने कहा जहाँ बंदरों का ऐसा उत्पात हो,वहाँ यह हनुमान जी की लीला हो सकती है।राजन्, यह किसी संत का अपमान है
अकबर के अहंकार पर पहली बार भय छाया,उसे समझ आया कि जिसे उसने बंदी बनाया है,वह कोई साधारण मनुष्य नहीं
तुरंत आदेश हुआ —तुलसीदास को मुक्त किया जाए
जैसे ही तुलसीदास जी को कारागार से बाहर लाया गया,
उसी क्षण
सारे बंदर शांत होकर
नगर छोड़कर चले गए
न कोई युद्ध
न कोई रक्तपात
केवल राम नाम की विजय
अकबर स्तब्ध था
उस दिन उसे समझ आया कि
सत्ता तलवार से चलती है,
पर संसार भक्ति से चलता है
हनुमान चालीसा पूर्ण हो चुकी थी और उसके साथ यह सत्य भी स्थापित हो चुका था कि —जो राम का दास है, उसे कोई बाँध नहीं सकता
आज भी जब संकट आते हैं
जब चारों ओर अंधकार होता है
तो हनुमान चालीसा वही दीपक है
जो रास्ता दिखाता है
यह केवल एक रचना नहीं
यह अनुभव है
यह रक्षा कवच ह
यह राम कृपा का साक्षात स्वरूप है
जय श्री राम जय बजरंग बली
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अर्जुन के रथ से उतरने के पश्चात भगवान श्री कृष्ण रथ से उतरे और कुछ देर मौन रहे, फिर वह धीरे से अर्जुन के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें रथ से दूर ले गए। उसके पश्चात जो घटा वह उन सर्वज्ञ भगवान श्री कृष्ण के लिए तो परिचित था, परंतु अर्जुन के लिए विस्मयकारी, अकल्पनीय एवं आश्चर्यजनक था। अनायास ही रथ से अग्रि की लपटें निकलने लगीं और वह एक भयंकर विस्फोट करते हुए जलकर खाक हो गया
अर्जुन देख रहे थे जो रथ इतने अजेय महारथियों के अंत की कहानी का प्रत्यक्षदर्शी था, आज वह पल भर में नष्ट हो गया। अर्जुन देख रहे थे उस रथ से जुड़े अतीत को, इसी रथ से पूज्य पितामह की देह को अस्त्रों से बींध दिया था। इसी रथ से अनगिनत महारथियों का वध किया था। इसी रथ पर बैठकर उनके प्रिय सखा ने उन्हें गीता का उपदेश दिया था। आज वह राख की ढेरी बन चुका थl
इस घटना से हतप्रभ अर्जुन ने भगवान कृष्ण से कहा, ‘‘हे कान्हा! आपके उतरते ही यह रथ पल भर में भस्मीभूत हो गया। ऐसे कैसे हो गया? इसके पीछे क्या रहस्य है
भगवान कृष्ण बोले, ‘‘हे पार्थ! यह रथ तो बहुत पहले ही नष्ट हो चुका था, इस रथ की आयु तभी समाप्त हो गई थी जब पितामह भीष्म ने इस पर अपने दिव्यास्त्र का प्रहार किया था। इस रथ में इतनी ताकत नहीं थी कि भीष्म पितामाह के अचूक दिव्यास्त्रों को झेल सके। इसके पश्चात इसकी आयु फिर क्षीण हुई, जब इस पर द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महारथियों के भीषण दिव्यास्त्रों का पुन:-पुन: प्रहार होता रहा। यह रथ अपनी मृत्यु का वरण तो कब का कर चुका था
अर्जुन, आश्चर्यमिश्रित भाव से बोले, ‘‘हे कान्हा! यह रथ इतने पहले मृत्यु का वरण कर चुका था, तो फिर यह इतने समय तक चला कैसे? कैसे इतने दिनों तक आपके हाथों सकुशल कार्य करता रहा
भगवान कृष्ण बोले, ‘‘यह सत्य है कि इस दिव्य रथ की आयु पहले ही समाप्त हो चुकी थी, परंतु यह रथ मेरे संकल्प से चल रहा था। इसकी आयु की समाप्ति के पश्चात भी इसकी आवश्यकता थी, इसलिए यह चला। धर्म की स्थापना में इसका महत्ती योगदान था, अत: संकल्पबल से इसे इतने समय तक खींच लिया गया
भगवान कृष्ण आगे बोले, ‘धनंजय! भगवान का संकल्प अटूट, अटल और अखंड होता है। यह संकल्प संपूर्ण सृष्टि में जहां कहीं भी लग जाता है, वहां अपना प्रभाव दिखाता है और यह प्रभाव संदेह से परे अवश्य ही पूर्ण परिणाम देने वाला होता है जैसे ही संकल्प पूर्ण होता है, संकल्प की शक्ति वापस भगवान के पास चली जाती है और उसका समय एवं प्रभाव समाप्त हो जाता है। ठीक इसी प्रकार इस रथ पर मेरा संकल्प-बल कार्य कर रहा था और उसके समाप्त होते ही जो हुआ, वह तुमने देखा
भगवान कृष्ण आगे बोले, ‘इसीलिए हे अर्जुन! हम सबको भगवान के हाथों यंत्र बनकर अपना कार्य करना चाहिए। यंत्र का कार्य होता है-यंत्री के हाथों में अपना सर्वस्व समर्पण कर देना और उसके आदेशों का पालन करना। इससे कर्तापन का अहंकार समाप्त हो जाता है और जीवन का विकास होता है जिसका जितना योगदान है, उतना ही करना चाहिए और शेष यंत्री के हाथों में छोड़ देना चाहिए। यही जीवन के विकास का रहस्य है
चलो! अपने शिविर की ओर चलें।’’ भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन पैदल ही शिविर की ओर बढ़ गए
जय श्री कृष्ण
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भगवान श्री कृष्ण क्यों बने अर्जुन के सारथी
पीतांबरधारी चक्रधर भगवान श्री कृष्ण महाभारत युद्ध में सारथी की भूमिका में थे। उन्होंने अपनी यह भूमिका स्वयं चयन की थी
अपने सुदर्शन चक्र से समस्त सृष्टि को क्षण भर में मुट्ठी भर राख बनाकर उड़ा देने वाले या फिर समस्त सृष्टि के पालनकर्ता भगवान श्री कृष्ण महाभारत में अपने प्रिय सखा धनुर्धारी अर्जुन के सारथी बने थे। इस बात से अर्जुन को बड़ा ही अटपटा लग रहा था कि उसके प्रिय सखा कृष्ण रथ को हांकेंगे
सारथी की भूमिका ही नहीं, अपितु महाभारत रूपी महायुद्ध की पटकथा भी उन्हीं के द्वारा लिखी गई थी और युद्ध से पूर्व ही अधर्म का अंत एवं धर्म की विजय वह सुनिश्चित कर चुके थे। उसके बाद भी उनका सारथी की भूमिका का चयन करना अर्जुन को असहज कर देने वाला था
भगवान श्री कृष्ण सारथी के संपूर्ण कर्म कर रहे थे। एक सारथी की भांति वह सर्वप्रथम पांडुपुत्र अर्जुन को रथ में सम्मान के साथ चढ़ाने के साथ फिर आरूढ़ होते थे और अर्जुन के आदेश की प्रतीक्षा करते थे। हालांकि अर्जुन उन्हीं के आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन के अनुरूप चलते थे, परंतु भगवान कृष्ण अपने इस अभिनय का संपूर्ण समर्पण के साथ निर्वहन करते थे
युद्ध के अंत में वह पहले अर्जुन को उतारकर ही रथ से उतरते थे। भगवान कृष्ण अर्जुन से युद्ध के पूर्व बोले थे, ‘‘हे परंतप अर्जुन! युद्ध की विजय सुनिश्चित करने के लिए भगवती दुर्गा से आशीष लेना उपयुक्त एवं उचित रहेगा। भगवती दुर्गा के आशीर्वाद के पश्चात ही युद्ध प्रारंभ करना चाहिए
सारथी के रूप में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को एक और सलाह दी थी, ‘‘हे धनुर्धारी अर्जुन! मेरे प्रिय हनुमान जी का आह्वान करो। वह महावीर हैं, अजेय हैं और धर्म के प्रतीक हैं। उन्हें अपने रथ की ध्वजा पर आरूढ़ होने के लिए उनका आह्वान करो
अर्जुन ने यही किया था। सारथी की भूमिका में ही भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाओं ने बीच परम रहस्यमयी गीता का गान किया था
भगवान श्री कृष्ण ने सारथी के रूप में अर्जुन के पराक्रम को निखारा ही नहीं, कठिन से कठिनतम क्षणों में उनको सुरक्षित एवं संरक्षित कर अपनी भूमिका को सार्थक किया था। इसलिए तो भीष्म पितामह, अर्जुन को आशीर्वाद देकर बोले, ‘‘हे प्रिय अर्जुन! जिसके सारथी स्वयं भगवान श्री कृष्ण हों, उसे कैसी चिंता! तुम्हारी विजय सुनिश्चित है। तुम ही विजयी होगे-विजयीभव
सारथी भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को धर्म का पाठ तब पढ़ाया जब महादानी सूर्यपुत्र कर्ण के रथ के पहिए धरती में धंस गए थे और तब कर्ण, अर्जुन को धर्म एवं नीति का पाठ पढ़ा रहा था
उस समय भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से बोले, ‘‘हे पार्थ! कर्ण किस मुंह से धर्म की बात कर रहा है। द्रौपदी के चीरहरण के समय, अभिमन्यु के वध के समय, भीम को विष देते समय, लाक्षागृह को जलाने के समय उसका धर्म कहां चला गया था? यही क्षण है कर्ण को समाप्त करने का
भगवान श्री कृष्ण के मार्गदर्शन से ही कर्ण का अंत संभव हो सका। सारथी के रूप में ही भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से जयद्रथ का वध करने के लिए व्यूह रचना की थी और अर्जुन जयद्रथ का वध कर सके थे
भगवान श्री कृष्ण ने सारथी की भूमिका का इस खूबी से निर्वाह किया था कि अर्जुन को लग रहा था यदि कान्हा के हाथों में घोड़ों की लगाम न होती तो पता नहीं मेरा क्या होता? यहां भगवान के दृश्य हाथों में घोड़ों की लगाम थी और अदृश्य हाथों में महाभारत के महायुद्ध की समग्र डोर
महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था। कुरुक्षेत्र में भगवान कृष्ण रथ पर बैठे थे। भगवान कृष्ण के अधरों पर एक निश्छल मुस्कान सदा की भांति बिखरी हुई थी जो आज कुछ और भी गहरी हो गई थी। आज उनके हाव-भाव एवं व्यवहार में कुछ परिवर्तन था
अर्जुन के भी व्यवहार में आज कुछ परिवर्तन था उसमें भी तनिक अहंकार झलक रहा था..अर्जुन के हाव भाव देख कर भगवान श्री कृष्ण समझ गए अर्जुन में युद्ध जीतने के उपरांत अहम आगया है कि मैने ये महाभारत जीता है।
भगवान श्री कृष्ण सदा की भांति रथ से अर्जुन से पहले नहीं उतरे और अर्जुन से बोले, ‘‘पार्थ! रथ से उतर जाओ। इस पर अर्जुन थोड़ा ठिठका और बोला रथ से तो सारथी पहले उतरता है
भगवान श्री कृष्ण ने कहा यदि में पहले उतर गया तो तुम उतर नही पाओगे इसलिए कहता हूं पहले उतर जाओ
अर्जुन थोड़ा सहमा और उतर गया और उसने देखा उसके उतरने के उपरांत ही रथ पर से हनुमान जी का ध्वज भी हवा में उड़ गया
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परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान है, जिसे 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र बनने के साथ शुरू किया गया।
Eve Marosh (सावित्री ) एक सैनिक पत्नी ने डिजाइन किया ।
इसका प्रतीक इंद्र के वज्र से प्रेरित है, जो अडिग वीरता का प्रतीक माना जाता है। 🪖🇮🇳
जय हिन्द जय हिन्द की सेना 🇮🇳🇮🇳🇮🇳
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✨यदि आप #दुखी_ है तो✨
✨#अतीत_ में जी रहे है✨
✨#चिंतित है तो भविष्य में✨
✨और शांत है तो #वर्तमान मे✨
#शुभ_प्रभात_वंदन 🌅❣️🪷🙏
फॉलो:👉@VT45g96279 🔁
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महोदय इस प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए जांच किया जाए तथा दोषी संबंधित स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्यवाही किया जाए ।
@myogiadityanath @CMOfficeUP @DM_Bhadohi
#bhadohi
भ्रष्टाचार पर लगाम लगाया जाए
जनपद भदोही में जिलाधिकारी महोदय का ही आदेश का पालन नहीं हो पाना एक प्रकार से शिक्षा विभाग में हो रहे भ्रष्टाचार को दर्शाता है । भदोही नगर के चकसैफ स्थित फकीर अली मेमोरियल पब्लिक स्कूल में टीसी के नाम पर अवैध वसूली चल रहा है । इतना ही नहीं लगभग भदोही जिले के अनेक स्कूलों में अवैध वसूली चल रही है ।किंतु दुर्भाग्य है कि जिलाधिकारी महोदय का आदेश प्राइवेट स्कूल नहीं मान रहा है । खुले आम अभिभावकों का आर्थिक शोषण किया जा रहा है। अतः महोदय इस प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए जांच किया जाए तथा दोषी संबंधित स्कूल प्रबंधन के खिलाफ कार्यवाही किया जाए ।
#bhadohi
@myogiadityanath
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हरियाणा की 19 वर्षीय धाकड़ छोरी काम्या ने 18 घंटे समुद्र में 58 KM तैरकर बनाया रिकॉर्ड
19-year-old Kamya from Haryana created a record by swimming 58 km in the sea for 18 hours. ❤️























