also highly contagious is kindness,patience,love, enthusiasm,and a positive attitude Don’t wait to catch it from others Be the carrier

Joined November 2011
।। विजयादशमी ।। "देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निःशेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥ (“श्रीदुर्गासप्तशती”) नवरात्रि की शक्ति-साधना का पूर्णफल है - विजयादशमी। उपर्युक्त मन्त्र में भगवती को "जगदात्मशक्ति" कहा गया है, अर्थात् वह आत्मशक्ति जिससे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। भाष्यकार भगवत्पाद आद्य शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के आलोक में इस महापर्व का मर्म है- अविद्या पर विद्या की और अहंकार पर आत्मबोध की विजय। प्रभु श्रीराम की रावण पर विजय इसका बाह्य प्रतीक है और इसका आन्तरिक अर्थ है - देहाभिमान रूपी रावण का अन्त। श्रुति "राम" पद को ही परब्रह्म का वाचक कहती है ! "रमन्ते योगिनोऽनन्ते नित्यानन्दे चिदात्मनि। इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ।।" (“रामपूर्वतापनीयोपनिषद्”) श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में रावण-वध के उपरान्त स्वयं ब्रह्मा जी प्रभु श्रीराम की स्तुति करते हुए कहते हैं - "सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः। वधार्थं रावणस्येह प्रविष्टो मानुषीं तनुम् ।।" (श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण, युद्धकाण्ड) अर्थात्, आप ही भगवान विष्णु हैं और सीता जी साक्षात् लक्ष्मी हैं; रावण-वध के लिए ही आपने मानव-देह में प्रवेश किया है। अद्वैत की दृष्टि में शिव और शक्ति की भाँति राम और सीता भी ब्रह्म और उसकी शक्ति के रूप में अभिन्न हैं। जिस पराम्बा की आराधना नौ रात्रियों में हुई, वही सीता रूप में श्रीराम की लीला की आधारशक्ति हैं। रावण के दस शीश दस इन्द्रियों की बहिर्मुख वृत्तियों के प्रतीक हैं। कठोपनिषद् इस आन्तरिक संग्राम का रहस्य बताता है - "आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ ।। (“कठोपनिषद्”) जब विवेकवती बुद्धि सारथी बनकर मन की रास थाम लेती है, तभी इन्द्रियरूपी अश्व वश में होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण भी यही आदेश देते हैं - एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ।। (“श्रीमद्भगवद्गीता”) ब्रह्मसूत्र का प्रथम सूत्र है - “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा"। भगवत्पाद अपने भाष्य में "अथ" का अर्थ स्पष्ट करते हैं : नित्यानित्यवस्तुविवेक, इहामुत्रार्थभोगविराग, शमदमादि षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व, इस साधनचतुष्टय की प्राप्ति के अनन्तर ही ब्रह्मजिज्ञासा का अधिकार होता है। विजयादशमी पर होने वाले शस्त्र-पूजन का आध्यात्मिक अर्थ यही है कि विवेक और वैराग्य ही साधक के सच्चे शस्त्र हैं। यही आत्मविजय जब व्यक्ति से समाज और राष्ट्र के जीवन में उतरती है, तब राष्ट्रधर्म की स्थापना होती है। राष्ट्र की महत्ता केवल बाह्य सामर्थ्य में नहीं, अपितु नागरिकों के आत्मसंयम, शुचिता, सेवा और त्याग में निहित है। हमारे राष्ट्र का ध्येयवाक्य भी उपनिषद् की ही देन है - "सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।" (“मुण्डकोपनिषद्”) अतः दशहरा पर्व केवल रावण-दहन का प्रतीक नहीं ही न रहे =; आत्मविजय और राष्ट्रविजय का शंखनाद बने । आइए ! संकल्प करें कि अपने अंतस् के अज्ञान-तम को आत्मज्ञान के प्रकाश से परास्त कर अपना जीवन भारतमाता के परम् वैभव स्वरूप सिद्धि और राष्ट्रोत्कर्ष निमित्त समर्पित करेंगे। "विजयादशमी" की अनन्त शुभकामनाएँ। #विजयादशमी #दशहरा #शारदीय_नवरात्रि #सनातन_संस्कृति #HariharAshram #PrabhuPremiSangh #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes – at Haridwar, India
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।। "माँ सिद्धिदात्री" ।। सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि । सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ।। "शारदीय नवरात्रि" की "नवमी तिथि" साधना की पूर्णता और "माँ सिद्धिदात्री" की चैतन्यमयी कृपा का महापर्व है। लोक में वे अष्टसिद्धियों की प्रदात्री कही जाती हैं, किन्तु भाष्यकार भगवत्पाद आद्य शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के आलोक में उनकी सर्वोच्च देन है "आत्मसिद्धि", वह बोध जिसमें साधक स्वयं को ब्रह्म से अभिन्न जान लेता है। देव्युपनिषद् में स्वयं भगवती का उद्घोष है; "अहं ब्रह्मस्वरूपिणी ।
 मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत् ।।" भगवत्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य विरचित सौन्दर्यलहरी का प्रथम श्लोक शिव और शक्ति के इसी अभेद को प्रकट करता है - शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः "प्रभवितुं न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि । अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ।।" शक्ति से युक्त होकर ही शिव सृष्टि में समर्थ होते हैं; जैसे अग्नि और उसकी दाहकता पृथक् नहीं, वैसे ही ब्रह्म और उसकी शक्ति अभिन्न हैं। श्रीललितासहस्रनाम माँ के इसी अद्वय स्वरूप का गान करता है - "एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता । अन्नदा वसुदा वृद्धा ब्रह्मात्मैक्यस्वरूपिणी ।।" जो स्वयं "ब्रह्मात्मैक्यस्वरूपिणी" हैं, उनकी उपासना का परम फल भी जीव और ब्रह्म के ऐक्य का बोध ही है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण सिद्धि का वास्तविक अर्थ बताते हैं - "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ।।" “श्रीमद्भगवद्गीता” वास्तविक सिद्धि चमत्कार नहीं, तत्त्वबोध है। भगवत्पाद विवेकचूडामणि में कहते हैं - "चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये। वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किञ्चित्कर्मकोटिभिः ।।" नवरात्रि के नौ दिनों का व्रत, जप और पूजन चित्तशुद्धि का साधन है, और नवमी उस निर्मल चित्त में आत्मविचार द्वारा "वस्तुसिद्धि", अर्थात् परमतत्त्व के साक्षात्कार की तिथि है। माँ का "मणिद्वीप" यही चिदाकाश है, जहाँ साधक आत्मानन्द में प्रतिष्ठित होता है। नवमी तिथि पर "अज्ञानध्वान्तदीपिका" माँ सिद्धिदात्री की उपासना साधक को उसके भावानुसार सिद्धि प्रदान करती है; और सब सिद्धियों में श्रेष्ठ वह सिद्धि है, जो अविद्या को हरकर आत्मा को उसके सच्चिदानन्द स्वरूप में प्रतिष्ठित कर दे। #सिद्धिदात्री #शारदीय_नवरात्रि
#सनातन_संस्कृति #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes – at Haridwar, India
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There are 193 UN members. No one else is bothered. What is Turkey’s compulsion? Other Islamic countries don’t raise this issue of India’s sovereignty either. Turkey seems to take its Islamic vocation very earnestly. Turkey’s record of bombing and persecuting the Kurds is atrocious . Now you are illegally occupying parts of Syria too. The Kashmir issue was last raised in the UNSC in 1957. For 62 years it wasn’t raised until in 2019 Pakistan with China’s support raised it after India abrogated Art 370. It was a closed door meeting and no statement was issued. Proved a damp squib. As a former diplomat you would ne expected to be better informed. We are aware that Turkey is today a big hub of anti- Indian propaganda in league with Pakistan.
Sayın Sibal, Keşmir'i BM Genel Kurulunda dile getirilmesinden rahatsızsınız ama Keşmir 1948'den beri BM Güvenlik Konseyi'nin gündeminde. 47 sayılı karar ortada. Kıbrıs'ı BM'de konuşmak isterseniz de buyurun. Ada 1964'ten beri BM gündeminde ve Kıbrıs Türklerinin 1963-74 arasında yaşadığı katliamları konuşmaktan en az çekinecek ülke Türkiye'dir. Kürt meselesine gelince, Türkiye'de özerkliği bir gecede kaldırılıp interneti 18 ay kısıtlanan bir bölge yok. @KanwalSibal
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I’ve always thought emergency medicine is the most difficult specialty. Not just to train for, but to practice. No appointment, no history, no time, and every gap in the healthcare system eventually walks through your door at 2:00 am. Dr @grahamwalker just announced he’s leaving the bedside after 20 years. His essay, “Always Open. Already Full,” explains why. The ER is the only part of healthcare that can’t say no, so it absorbs everything upstream, and the people working there absorb the rest. Worth reading if you work with, or depend on, an ED.
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।। माँ महागौरी ।। "श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ।।" "शारदीय नवरात्रि" की अष्टमी भगवती "माँ महागौरी" की आराधना का पावन अवसर है। शंख, चन्द्र और कुन्दपुष्प के समान उनकी शुभ्र कान्ति साधक को अन्तःकरण की निर्मलता, निष्कपटता और प्रशान्ति का सन्देश देती है। अद्वैत वेदान्त के आलोक में इस गौरिमा का चिन्तन उस ज्ञानप्रकाश के प्रतीक रूप में किया जा सकता है, जिसमें राग-द्वेष की मलिनता क्षीण होती है और आत्मस्वरूप के अनुसन्धान की पात्रता विकसित होती है। भगवद्पाद भाष्यकार भगवान आदि शंकराचार्य के अद्वैत-सिद्धान्त में आत्मा नित्यशुद्ध, स्वप्रकाश और असंग है। अशुद्धि अन्तःकरण में होती है; आत्मा उससे कभी लिप्त नहीं होती। अतः साधना आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए नहीं, उसके नित्यनिर्मल स्वरूप को आच्छादित करने वाले अज्ञान की निवृत्ति के लिए है। श्रद्धा, निष्काम कर्म और भगवदुपासना चित्त को निर्मल तथा एकाग्र बनाते हैं; गुरु और श्रुति के उपदेश से उदित आत्मज्ञान बन्धन के मूल अज्ञान का निरसन करता है। श्रीललितासहस्रनाम भगवती के इसी पारमार्थिक स्वरूप का उद्घोष करता है - “नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा।” वे नित्यनिर्मल, नित्यज्ञानस्वरूपा, दोषरहिता और अखण्ड हैं। महागौरी की उपासना में इन नामों का स्मरण साधक को देहाभिमान से ऊपर उठकर अपने भीतर विद्यमान चैतन्य के प्रति सजग करता है। उनकी शुभ्रता का आध्यात्मिक सन्देश है - जीवन में पवित्रता, व्यवहार में करुणा और दृष्टि में अभेद। भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य द्वारा विरचित सौन्दर्यलहरी भगवती की वन्दना है - "शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यङ्कनिलयां भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ।।" यहाँ परमशिव के साथ विराजमान पराम्बा का ध्यान ‘चिदानन्दलहरी’ के रूप में किया गया है। अद्वैतदृष्टि से इसका मनन शिव और शक्ति की अभिन्नता की ओर उन्मुख करता है। माँ की आराधना का अन्तर्मुखी उत्कर्ष उसी अखण्ड चैतन्य का बोध है, जिसमें उपासक और उपास्य का पारमार्थिक भेद निवृत्त हो जाता है। दुर्गासप्तशती की नारायणीस्तुति में यही जगज्जननी समस्त मंगलों की अधिष्ठात्री हैं - "सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ।।" यह शरणागति अहंकार के समर्पण और भगवदाश्रय की साधना है। जब आराधना क्षमा, संयम, सत्य और सर्वभूतहित में अभिव्यक्त होती है, तब पूजा का पुष्प जीवन के आचरण में खिलता है। कल्याणी "माँ महागौरी" के अनुग्रह से हमारा अन्तःकरण निर्मल हो, विवेक प्रखर हो और भक्ति ज्ञान में पर्यवसित हो। उनके श्रीचरणों में यही प्रार्थना है कि अविद्या का आवरण निवृत्त हो तथा अपने नित्यशुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मस्वरूप का बोध हो। यही महागौरी-आराधना की अद्वैतपरक परिणति है। #महागौरी #सनातन_संस्कृति #शारदीय_नवरात्रि #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes #Adi_Shankracharya – at Haridwar, India
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Astonishing post. Wants India to congratulate someone who has a long record of targeting India. Navi Pillay has regularly criticised India on human rights during her tenure as the UN High Commissioner for Human Rights (2008–2014) She has attacked India on Kashmir and mass graves and disappearances, on AFSPA, on Sexual Violence and New Delhi gang rape(2012), calling for substantial legal and systemic reforms to tackle widespread sexual violence, and Caste and Gender Discrimination (2014) Throughout her tenure, she has has had policy frictions with India on human rights issues. India has officially responded to her attacks. She has also been a judge of the ICC which India does not recognise.. What is the case for congratulating her? Simply because she is of Indian origin?
It’s been six days since this remarkable woman of Indian origin (see her story, attached) won the #NobelPeacePrize. And the Government of India, her ancestral homeland, hasn’t so much as congratulated her?! Shame on the petty men who have made such a deplorable decision.
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देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरा हरिद्वार स्थित श्रीपंचदशनाम जूनाअखाड़ा की आचार्यपीठ "श्री हरिहर आश्रम, कनखल" के सारस्वत परिसर में श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” के पावन सान्निध्य एवं सद्संकल्प से निरंतर संचालित 'अन्न, अक्षर और औषधि' सेवा-प्रकल्पों की श्रृंखला के अंतर्गत आज एकदिवसीय भव्य “निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण एवं वैक्सीनेशन शिविर” का सफल आयोजन संपन्न हुआ। ​आश्रम परिसर में “ऐंसीएन्ट हेरिटेज फाउंडेशन” (Ancient Heritage Foundation) के अंतर्गत संचालित “स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक” के सेवा-प्रवाह को विस्तार देते हुए, आज विश्वप्रसिद्ध “वेलमेड हॉस्पिटल, गुरुग्राम” (Wellmed Hospital, Gurugram) की विशेषज्ञ मेडिकल टीम ने आश्रम पहुँचकर अपनी समर्पित सेवाएं प्रदान कीं। ​शिविर का शुभारंभ पूज्य संतों एवं गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। उद्घाटन अवसर पर पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी ललितानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी अपूर्वानन्द गिरि जी महाराज, पूज्य स्वामी कैलाशानन्द गिरि जी, श्री आई.डी. शास्त्री जी, श्री वैभव अग्रवाल जी एवं श्री हरिहर जोशी जी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन उपस्थित रहे। ​शिविर में वेलमेड हॉस्पिटल के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. आशीष गुप्ता जी, वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रियंका गुप्ता जी, नाक-कान-गला रोग विशेषज्ञ डॉ. सुनील अग्रवाल जी, दंत रोग विशेषज्ञ डॉ. सोनाली अग्रवाल जी, जनरल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. दीपक श्योरान जी तथा स्वामी अवधेशानन्द पॉलीक्लिनिक की टीम ने अपनी बहुमूल्य सेवाएं दीं। विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा हृदय रोग, स्त्री रोग, ईएनटी, दंत व्याधियों एवं जनरल मेडिसिन से संबंधित गंभीर व जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले रोगों का गहन परीक्षण किया गया। ​शिविर में साधक-साधिकाओं का वैक्सीनेशन (टीकाकरण) किया गया तथा ईसीजी (ECG), हीमोग्लोबिन (Haemoglobin), ब्लड शुगर (Blood Sugar) और ब्लड प्रेशर (Blood Pressure) की आवश्यक परीक्षण पूर्णतः निःशुल्क की गईं। साथ ही सभी परीक्षणों के आधार पर रोगियों को उचित परामर्श एवं आवश्यक औषधियां निःशुल्क वितरित की गईं। ​इस जनकल्याणकारी शिविर में कनखल तथा आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में पधारे पूज्य सन्त-महात्माओं, साधकों, ब्राह्मण-बटुकों, आश्रमवासियों एवं स्थानीय नागरिकों सहित सैकड़ों लोगों ने इन निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया। ​पूज्य आचार्यश्री जी के दिव्य मार्गदर्शन में आयोजित यह सेवा-प्रकल्प समाज के आरोग्य संवर्धन एवं नर सेवा के संकल्प को चरितार्थ करने की दिशा में एक अनुकरणीय प्रयास सिद्ध हुआ। #AvdheshanandG_Quotes #स्वामी_अवधेशानन्द_पॉलीक्लिनिक #WellmedHospital #SwamiAvdheshanandPolyclinic #HariharAshramKankhal
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Now everyone realises what a Phattu this @dhruv_rathee is. When I was arrested by WB Govt. , few right wing groups in USA and EU had offered me religious asylum from the STSJ gang. Many well wishers also advised me to move away from West Bengal fearing re-arrest by @MamataOfficial . I declined both because that would have made Hindus in general look weak. Ek baar police ne kya poochtach Kiya, German Dog London bhag gaya...😆 Khalistaniyon, Bangladeshiyon aur pakistaniyon ke sath milke ab naare lagwaa raha hai India ke Khilaaf Baapu ke statue ke saamne..😆 Delhi mein bhi Baapu ka statue hai Dhruv... London Jaane Ki kya zarrorat hai..? Par tumko samajh mein aagaya, yahan se nahi bagha toh Bappu ka danda pichwaade mein guzayenge yeh naya India. Such a pathetic loser. Your Youtube revenue will start falling now. No one follows a weak leader.
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🚨 BIG! J&K Police REGISTER an FIR against the wife of a senior Indian Army officer, Palaparthy Naga Anagha Lakshmi, for allegedly TRANSMITTING SENSITIVE DEFENCE intel to Chinese intelligence assets. Case registered under Sections 3 & 5 of Official Secrets Act and BNS.
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।। माँ कालरात्रि ।। "एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी । वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी ।।" इस वर्ष "शारदीय नवरात्रि" में सप्तमी तिथि की वृद्धि हुई है। जो जगदम्बा स्वयं काल की अधीश्वरी हैं, उन्हीं की आराधना का काल इस बार विस्तृत हो गया है। यह विस्तार साधक के लिए माँ का असीम अनुग्रह है कि वह अपनी उपासना को और गहन करे। आज पुनः "माँ कालरात्रि" के श्रीचरणों में सश्रद्ध प्रणति। "कालरात्रि" का अर्थ है - काल की भी रात्रि, अर्थात् वह पराशक्ति जिसमें सर्वभक्षी काल भी लय को प्राप्त होता है। कठोपनिषद् ऐसे ही परमतत्त्व का संकेत करती है, जिसके लिए "मृत्युर्यस्योपसेचनम्", अर्थात् सबका संहार करने वाली मृत्यु भी अन्न के साथ लिए जाने वाले उपसेचन के समान गौण है। श्रीदुर्गासप्तशती के प्रथम चरित्र में ब्रह्माजी योगनिद्रा महामाया की स्तुति करते हुए कहते हैं - "प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ।।" यहाँ एक गूढ़ रहस्य है। जो "कालरात्रि" हैं, वही "मोहरात्रि" भी हैं। जिस महामाया के आवरण से जीव मोह की रात्रि में भटकता है, उसी के अनुग्रह से वह रात्रि समाप्त भी होती है। मेधा ऋषि का वचन है - "सा विद्या परमा मुक्तेर्हेतुभूता सनातनी । संसारबन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ।।" भगवत्पाद भगवान आद्य शंकराचार्य जी की अद्वैतदृष्टि में बन्धन आत्मा का वास्तविक धर्म नहीं, अविद्याजनित अध्यास है। अतः माँ का उग्र स्वरूप साधक पर नहीं, उसके अज्ञान पर प्रहार करता है। उनका खड्ग मोह का छेदन करता है और उनकी अभयमुद्रा स्मरण कराती है कि आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। सप्तमी के इस बढ़े हुए पुण्यकाल को जप, मौन, स्वाध्याय और आत्मविचार में अर्पित करें। सदैव शुभ फल देने के कारण "शुभंकरी" कहलाने वाली "माँ कालरात्रि" हमारे अन्तःकरण की मोहरात्रि का अवसान करें और विवेक का अरुणोदय कराएँ। उनकी कृपा से हमारा जीवन अभय, करुणा और आत्मज्योति से आलोकित हो। #कालरात्रि #शारदीय_नवरात्रि #सनातन_संस्कृति #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes – at Haridwar, India
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Zor lagalo, dam laga lo… aayenge toh Yogi hi! SAVE IT.
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।। माँ कालरात्रि ।। "शारदीय नवरात्रि" की सप्तमी पर जगज्जननी "माँ कालरात्रि" के श्रीचरणों में सश्रद्ध प्रणति। उनका कृष्णवर्ण, मुक्तकेश और उग्र स्वरूप साधक को जीवन की उस गम्भीर सच्चाई के सम्मुख खड़ा करता है, जिससे वह प्रायः बचना चाहता है: देह की अनित्यता, अहंकार की असारता और विषयों से प्राप्त सुरक्षा की सीमा। माँ की रौद्रता में भी करुणा है। वह साधक के मोह को विच्छिन्न करके उसके भीतर विवेक और अभय जागृत करती हैं। भगवत्पाद भगवान आद्य शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के आलोक में इस आराधना का अन्तरंग आशय आत्मस्वरूप पर आरोपित अविद्या की निवृत्ति है। आत्मा नित्यप्रकाश चैतन्य है; अज्ञान उसे वास्तव में ढक अथवा विकृत नहीं करता। किन्तु अविवेक के कारण मनुष्य देह की सीमाओं, मन की व्याकुलता और बुद्धि के संशयों को अपना स्वरूप मान लेता है। "माँ कालरात्रि" की उपासना को इस अध्यास के परिष्कार और ज्ञानयोग्यता की साधना के रूप में समझा जा सकता है। ललितासहस्रनाम में उसी पराम्बा का उद्घोष है कि “महेश्वरी महाकाली महाग्रासा महाशना।” और उनके परम स्वरूप का निर्देश है - “सर्ववेदान्तसंवेद्या सत्यानन्दस्वरूपिणी।” महाकाली का संहाररूप और सत्यानन्दस्वरूपिणी का शान्त प्रकाश एक ही आदिशक्ति के उपास्य आयाम हैं। वे त्रिगुणमयी सृष्टि की अधिष्ठात्री होकर भी अपने परम स्वरूप में गुणों से अपरिच्छिन्न हैं। अतः उन्हें केवल तमोगुण की सीमा में बाँधना उनकी महिमा को संकुचित करना होगा। भगवत्पाद विरचित सौन्दर्यलहरी में यह महिमा अत्यन्त प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त हुई है - "विरिञ्चिः पञ्चत्वं व्रजति हरिराप्नोति विरतिंविनाशं कीनाशो भजति धनदो याति निधनम् । वितन्द्री माहेन्द्री विततिरपि संमीलितदृशामहासंहारेऽस्मिन् विहरति सति त्वत्पतिरसौ ।।" महासंहार में ब्रह्मा, विष्णु, यम, कुबेर और इन्द्रादि की उपाधिगत शक्तियाँ लय को प्राप्त होती हैं। हे सती ! उस समय भी आपके पति शिव विहार करते हैं। इस स्तुति का अध्यात्मगत मनन साधक को उस अविनाशी अधिष्ठान की ओर ले जाता है, जिस पर समस्त उत्पत्ति, स्थिति और लय आश्रित हैं। यहाँ एक सूक्ष्म वेदान्तीय विवेक आवश्यक है। प्रलय में नामरूपों का लय और आत्मज्ञान में अविद्या की निवृत्ति भिन्न हैं। गहरी निःशब्दता अथवा विचारों का अस्थायी विराम अपने आप मुक्ति नहीं है। मुक्ति का आधार अपने नित्य, असङ्ग और अद्वैत आत्मस्वरूप का यथार्थ बोध है। इसीलिए "माँ कालरात्रि" की आराधना में बाह्य पूजन के साथ अन्तःकरण का परिष्कार भी अपेक्षित है। भय का निरीक्षण हो, मोह की पकड़ पहचानी जाए, प्रमाद के स्थान पर सजगता आए और अहंकार के स्थान पर समर्पण। जप, संयम, स्वाध्याय और गुरुोपदेश साधक को उस ज्ञान के योग्य बनाते हैं जो बन्धन के मूल का निरसन करता है। ललितासहस्रनाम के ये नाम इसी परम दिशा को प्रकाशित करते हैं - “एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता। “मिथ्याजगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरूपिणी ।।” अद्वैतबोध में आत्मा से पृथक् किसी दूसरी स्वतंत्र परम सत्ता की धारणा निवृत्त होती है। तैत्तिरीयोपनिषद् इसी अभय का उद्घोष करती है - “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कुतश्चन ।” "माँ कालरात्रि" की कृपा से साधक की दृष्टि भयावह प्रतीत होने वाले परिवर्तन के बीच भी अविनाशी आत्मतत्त्व की ओर उन्मुख हो। उनकी उपासना सत्यनिष्ठा, करुणा और धर्माचरण को पुष्ट करे। अद्वैत की समझ में व्यवहार की मर्यादा और शुभाशुभ का विवेक अपने स्थान पर बने रहते हैं। "माँ कालरात्रि" हमारे अन्तःकरण से अविद्या, मोह और प्रमाद का अन्धकार दूर करें। श्रद्धा को स्थिरता, विवेक को प्रखरता और साधना को आत्मनिष्ठा प्रदान करें। उनके उग्र स्वरूप में हमारी दृष्टि अभयदायिनी करुणा का दर्शन करे और उनके श्रीचरणों में समर्पित जीवन आत्मज्योति से आलोकित हो। #कालरात्रि #शारदीय_नवरात्रि #सनातन_संस्कृति #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes – at Haridwar, India
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2010 में FCRA किसलिए बना था?
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Mahishasura Mardini 🔱❤️ he really wanted to be part of the video since we were shooting in his ilaaka. The full video is out on Youtube and i think Spotify pe bhi hai 😬
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॥ माँ कात्यायनी ॥ वन्दे वाञ्छितमनोरथार्थाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहारूढां चतुर्भुजां कात्यायनीं यशस्विनीम् ।। स्वर्णवर्णामाज्ञाचक्रस्थितां षष्ठीं दुर्गां त्रिनेत्राम्। वराभीतिकरां दिव्यां कात्यायनसुतां भजे ।। "शारदीय नवरात्रि" का षष्ठम दिवस आदिशक्ति भगवती के तेजोमय स्वरूप "माँ कात्यायनी" की उपासना का दिवस है। यह स्वरूप केवल महिषासुर आदि दैत्यों के संहार की कथा ही नहीं, अपितु धर्म की प्रतिष्ठा, आत्मबल के जागरण, विवेकपूर्ण पराक्रम और ब्रह्मतेज की विजय का परम उद्घोष है। "माँ कात्यायनी" साधक के भीतर सुप्त दिव्य शक्ति को जाग्रत कर उसे भय, मोह, दुर्बलता और अज्ञान के बन्धनों से मुक्त करती हैं। भगवती का यह नाम पौराणिक ही नहीं, वैदिक भी है। तैत्तिरीय आरण्यक के अन्तर्गत महानारायणोपनिषद् की दुर्गा-गायत्री में उनका स्मरण है - "कात्यायनाय विद्महे कन्यकुमारि धीमहि। तन्नो दुर्गिः प्रचोदयात् ।।" दुर्गासप्तशती के द्वितीय अध्याय में वर्णन है कि समस्त देवताओं के शरीर से निकला तेज एकत्र होकर नारी-रूप में प्रकट हुआ - "अतुलं तत्र तत्तेजः सर्वदेवशरीरजम्। एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा ।।" वामनपुराण आदि के अनुसार यह तेजोराशि महर्षि कात्यायन के आश्रम में साकार हुई, ऋषि ने सर्वप्रथम उनका पूजन किया, इसी से वे "कात्यायनी" कहलाईं। इस कथा में एक गूढ़ साधना-सूत्र निहित है। ऐतरेयोपनिषद् कहता है कि अग्नि वाणी बनकर मुख में और आदित्य चक्षु बनकर नेत्रों में प्रविष्ट हुए; अर्थात् देवता ही हमारी इन्द्रियों के अधिष्ठाता हैं। अतः "सर्वदेवशरीरज" तेज का "एकस्थ" होना इस सत्य का संकेत है कि जब साधक की बिखरी हुई इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और संकल्प एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित हो जाते हैं, तब वही एकाग्र चेतना भगवती के रूप में प्रकट होती है। कात्यायन ऋषि का आश्रम तप से पवित्र हुआ अन्तःकरण है। बिखरी हुई शक्ति दुर्बलता है; संगठित और संकल्पित शक्ति ही दुर्गा है। शाक्त दर्शन में "माँ कात्यायनी" इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति की समन्वित अधिष्ठात्री हैं। उनका सिंह निर्भीकता का प्रतीक है, उनके आयुध काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य जैसे आन्तरिक शत्रुओं के उच्छेदक हैं, और उनकी वर एवं अभय मुद्राएँ आश्वस्त करती हैं कि धर्ममार्ग पर चलने वाले के लिए भगवती स्वयं रक्षा-कवच बन जाती हैं। योग-परम्परा में यह दिवस आज्ञाचक्र की साधना से जुड़ा है, जहाँ चित्त द्वैत से ऊपर उठकर विवेक और अन्तर्दृष्टि में स्थित होता है। सप्तशती की नारायणी-स्तुति में प्रार्थना है - "एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्। पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥" विचारणीय है कि रणभूमि में असुरों का संहार करने वाली भगवती से यहाँ उनके "सौम्य" मुख की याचना है। उनका पराक्रम क्रूरता नहीं, करुणा का ही रक्षक रूप है; जो त्रिनेत्र अधर्म को भस्म करता है, वही साधक को अभय प्रदान करता है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में व्रज की कुमारियाँ हेमन्त के प्रथम मास में कात्यायनी-व्रत करती हुई यह मन्त्र जपती हैं - "कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः।।" यह प्रसंग बताता है कि "माँ कात्यायनी" केवल संहार की नहीं, संयोग की भी अधिष्ठात्री हैं। वे वह कृपाशक्ति हैं जो जीव को उसके परम प्रियतम परमात्मा से मिलाती हैं। जहाँ शक्ति और भक्ति एक होती हैं, वहीं उनका प्रसाद अवतरित होता है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त में परम सत्य निर्गुण, निर्विशेष, अखण्ड ब्रह्म है; तथापि वही अपनी अनिर्वचनीय मायाशक्ति से जगत् का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बनता है। "शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि।" शक्ति से युक्त होकर ही शिव सृष्टि में समर्थ हैं, अन्यथा स्पन्दन में भी असमर्थ। अतः "माँ कात्यायनी" किसी सीमित रूप की देवी नहीं; वे वही अनन्त पराशक्ति हैं जो सृष्टि के कण-कण में गति और प्रत्येक जीव के अन्तःकरण में चैतन्य बनकर प्रकाशित हैं। उपासना की पराकाष्ठा वहाँ है जहाँ उपासक, उपास्य और उपासना की त्रिपुटी विलीन हो जाती है। तब कात्यायनी बाहर पूजी जाने वाली देवी नहीं रहतीं, साधक के अपने आत्मस्वरूप का प्रकाश बन जाती हैं। यही शाक्त साधना की पूर्णता है और यही अद्वैत का परम रहस्य। इस पावन षष्ठम दिवस पर "माँ कात्यायनी" से प्रार्थना है कि वे हमारे अन्तःकरण से अज्ञान, भय, दुर्बलता और अहंकार का अन्धकार दूर करें; हमारी बिखरी शक्तियों को एक दिव्य संकल्प में संगठित करें; हमारा आज्ञाचक्र ज्ञान के सूर्य से आलोकित हो, साधना ब्रह्मनिष्ठ बने, जीवन लोकमंगल को समर्पित हो और अन्ततः हम उसी अखण्ड पराशक्ति में प्रतिष्ठित होकर आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त हों। #कात्यायनी – at Haridwar, India
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“माँ स्कन्दमाता” "वन्दे वाञ्छितकामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्। सिंहारूढां चतुर्भुजां स्कन्दमातां यशस्विनीम् ।।" “शारदीय नवरात्रि” का पञ्चम दिवस “माँ स्कन्दमाता” की आराधना का पावन अवसर है। देवीकवच में नवदुर्गा का क्रम बताते हुए कहा गया है - “पञ्चमं स्कन्दमातेति”। वे केवल करुणामयी माता ही नहीं, अपितु साधक को आत्मबोध की ओर ले जाने वाली दिव्य चैतन्यशक्ति हैं। उनके अंक में विराजित “बाल स्कन्द” केवल मातृत्व का बिम्ब नहीं, वरन् उनकी अकारण करुणा और अनुग्रह का गूढ़ संकेत हैं। साधक को परम सत्ता तक पहुँचाने वाली शक्ति भी स्वयं “स्कन्दमाता” ही हैं। चौंसठ तन्त्रों के द्वारा समस्त भुवन को भिन्न-भिन्न सिद्धियों में उलझाकर भगवान पशुपति शान्त हो गए, क्योंकि वे तन्त्र अपनी-अपनी सिद्धि देने तक ही सीमित, अर्थात् परतन्त्र थे। किन्तु देवी के आग्रह पर उन्होंने देवी का वह “स्वतन्त्र तन्त्र” भूतल पर अवतरित किया, जो अकेले ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों पुरुषार्थों को सिद्ध करता है। ललितासहस्रनाम भगवती को इसी अर्थ में “स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी” कहता है। स्कन्दमाता उसी स्वतन्त्र चैतन्यशक्ति की अधिष्ठात्री हैं; वे लौकिक भय और मानसिक चञ्चलता से साधक को ऊपर उठाकर आत्मबोध की ओर ले जाती हैं। तप: शुद्धि से अन्तःकरण निर्मल होता है, आत्मस्मृति ध्रुव होती है और हृदय की समस्त ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं। जिसके कषाय धुल गए हैं, उसे अज्ञानरूपी अन्धकार के पार ले जाने वाले ज्ञानस्वरूप भगवान को ही श्रुति “स्कन्द” कहती है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - “सेनानीनामहं स्कन्दः” (१०.२४)। स्कन्द वह दिव्य सेनापति हैं, जो अन्तर्जगत् की आसुरी वृत्तियों पर दैवी सम्पदा की विजय सुनिश्चित करते हैं। और स्वयं माँ? केनोपनिषद् में जब इन्द्र उस अज्ञेय यक्ष को न जान सके, तब “स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीम्” उसी आकाश में परम शोभामयी उमा हैमवती प्रकट हुईं, और “सा ब्रह्मेति होवाच” उन्होंने ही देवराज को ब्रह्म का बोध कराया। भगवत्पाद ने अपने भाष्य में उमा को विद्यास्वरूपा माना है। स्कन्दमाता वही उमा हैं; जो माता वात्सल्य से पुत्र को अङ्क में धारण करती हैं, वही ब्रह्मविद्या बनकर देवताओं को भी परम तत्त्व का दर्शन कराती हैं। महर्षि पतञ्जलि का सूत्र है - “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” और उसका फल है, “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” एवं गीता इसी अवस्था का वर्णन करती है - यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥
(श्रीमद्भगवद्गीता, ६.२०) जब चित्त की वृत्तियाँ शान्त होती हैं, तभी आत्मा का साक्षात्कार सम्भव है। "स्कन्दमाता" का सिंह पर आरूढ़ होना इन्द्रियों के संयम का प्रतीक है। जो इन्द्रियाँ सिंह के समान प्रबल हैं, वे वश में आकर साधना का वाहन बन जाती हैं, क्योंकि “वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता” उनका चन्द्रार्धशेखर रूप चित्त की शीतलता एवं विवेकशीलता का सूचक है; श्रुति भी कहती है - “चन्द्रमा मनसो जातः”। साधना-परम्परा में स्कन्दमाता की उपासना का सम्बन्ध विशुद्ध चक्र से माना गया है, जो अन्तःकरण की उसी शुद्धि का संकेत है, जिसका उद्घोष छान्दोग्य श्रुति करती है। उनका स्वरूप साधक को सिखाता है कि करुणा और विवेक से युक्त होकर, संयम और स्थिरता से चित्त को निर्मल करें; तभी आत्मदर्शन सम्भव है। नवरात्रि की साधना बाह्य आडम्बर से परे, आत्मान्वेषण का मार्ग है। "माँ स्कन्दमाता" की उपासना साधक को उसी अनुभूति तक ले जाती है, जिसे भगवत्पाद ने निर्वाणषट्कम् में गाया है - "मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे। न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ।।" “मैं न मन हूँ, न बुद्धि, न अहङ्कार; न श्रोत्र, न जिह्वा, न नेत्र। मैं केवल परिपूर्ण चिदानन्दस्वरूप आत्मा हूँ।” “स्कन्दमाता” केवल वात्सल्य और मातृत्व की प्रतिमा नहीं, वे अद्वैत तत्त्व की करुणामयी सत्ता हैं। ललितासहस्रनाम उन्हें “शिवज्ञानप्रदायिनी” कहता है; वे अपने अङ्क में स्थित शिवज्ञान से साधक को उसकी आत्मसत्ता तक ले जाती हैं। उनकी करुणा साधक की योग्यता की प्रतीक्षा नहीं करती; भगवत्पाद के शब्दों में - “कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति”। उनकी उपासना साधक के जीवन में करुणा, विवेक, संयम और आत्मबोध की ज्योति प्रज्वलित करती है। "नमामि स्कन्दजननीं शिववामार्धवासिनीम्।
 चित्ते सुधाप्रदां देवीं शिवज्ञानप्रकाशिनीम् ।।" #स्कन्दमाता #शारदीय_नवरात्रि #सनातन_संस्कृति #AvdheshanandG_Mission #AvdheshanandG_Quotes – at Haridwar, India
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इस हफ़्ते प्रसारण स्थगित है। चाबी अंदर है। अगला प्रसारण - 23 अक्टूबर, रात 9 बजे। अब हर शुक्रवार। प्रकाश भारती | विशेष सूचना #PrakashBharati #80sStyle #IndianSatire #80strend #Protest
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What a fabulous line up of speakers. Looking forward to see/hear it all
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सांस्कृतिक पुनरुत्थान एवं लोकमंगल के संकल्प के साथ पवित्र छड़ी यात्रा का शुभारंभ ! धर्मनगरी हरिद्वार में आज सनातन हिन्दू वैदिक संस्कृति के रक्षण-संवर्धन, सांस्कृतिक पुनरुत्थान एवं लोककल्याण के संकल्प के साथ श्रीपंचदशनाम जूनाअखाड़ा की पवित्र छड़ी यात्रा का विधिवत शुभारंभ हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार, संतों के पावन सान्निध्य और श्रद्धापूर्ण वातावरण में संपन्न यह अनुष्ठान देवभूमि की तीर्थपरम्परा एवं आध्यात्मिक चेतना के संवर्धन का मंगल अवसर बना। छड़ी यात्रा के शुभारंभ से पूर्व श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्य श्री” ने हरिद्वार की अधिष्ठात्री भगवती माँ माया देवी, ऐश्वर्यप्रदाता श्री आनन्द भैरव एवं भगवान श्री दत्तात्रेय के दर्शन, अर्चन और पूजन कर चराचर जगत के मंगल की प्रार्थना की। तदुपरान्त पूज्य आचार्यश्री ने अखाड़े के वरिष्ठ सभापति पूज्य स्वामी श्री प्रेम गिरि जी महाराज तथा शीर्षस्थ संतों के साथ पवित्र छड़ी का विशेष पूजन-अर्चन किया और पूर्ण विधि-विधान से यात्रा को प्रस्थान कराया। यह यात्रा उत्तराखण्ड के पावन धामों एवं तीर्थस्थलों में पहुँचकर सनातन धर्म की ध्वजा और लोकमंगल का संदेश प्रसारित करेगी। हिमालय की तपोभूमि उत्तराखण्ड ऋषियों की साधना, देवालयों की दिव्यता और गंगा की पावन धारा से प्रतिष्ठित भारत की आध्यात्मिक राजधानी है। यहाँ के तीर्थ आत्मानुसंधान, तप और ज्ञान की सनातन परम्परा के जीवंत केन्द्र हैं। देश-विदेश के जिज्ञासु, मुमुक्षु एवं तपस्वी इस देवभूमि में आते रहें और यहाँ से आध्यात्मिक जागरण का शंखनाद विश्वभर में गुंजित हो, पवित्र छड़ी यात्रा इसी व्यापक संकल्प की संवाहिका है। अपने आशीर्वचन में पूज्य आचार्य श्री ने कहा कि श्री पंचदर्शनाम जूना अखाड़ा के परम संरक्षक एवं अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महामंत्री पूज्य स्वामी श्री हरि गिरि जी महाराज के समर्थ और कुशल नेतृत्व में अखाड़ा निरन्तर प्रगति करते हुए सनातन परम्पराओं तथा मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ कर रहा है। यह यात्रा तीर्थों के प्रति आस्था के संवर्धन के साथ सांस्कृतिक पुनरुत्थान, सामाजिक समरसता एवं प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का भी पावन अभियान है। समारोह में श्रीपंचदशनाम जूनाअखाड़ा के मुख्य संरक्षक तथा अखाड़ा परिषद के महासचिव पूज्य स्वामी श्री हरि गिरि जी महाराज, वरिष्ठ सभापति पूज्य स्वामी श्री प्रेम गिरि जी महाराज, कुंभ मेलाधिकारी श्रीमती सोनिका जी तथा हरिद्वार के जिलाधिकारी श्री मयूर दीक्षित जी ने अपने संबोधनों में यात्रा के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व को रेखांकित किया। इस अवसर पर अपर मेलाधिकारी श्री दयानंद सरस्वती जी, श्रीपंचदशनाम जूनाअखाड़ा के उपाध्यक्ष पूज्य स्वामी श्री महेश पुरी जी महाराज, महामंत्री पूज्य स्वामी श्री केदार पुरी जी महाराज, पूज्य स्वामी श्री शैलेंद्र गिरि जी महाराज, छड़ी यात्रा के महंत हिमालयन योगी महामण्डलेश्वर स्वामी श्री वीरेंद्रानंद गिरि जी महाराज, महामण्डलेश्वर स्वामी श्री ललितानन्द गिरि जी महाराज एवं आदरणीय श्री आई.डी. शास्त्री जी सहित बड़ी संख्या में संत-महात्मा, नागा संन्यासी, प्रशासनिक अधिकारी, साधक एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। श्रीपंचदशनाम जूनाअखाड़ा के इस पवित्र छड़ी यात्रा के समस्त अनुष्ठान पूज्य आचार्यश्री की अध्यक्षता में सम्पन्न हुए ! #श्रीपंचदशनाम_जूनाअखाड़ा #हरिद्वार #मायादेवी #हरिद्वार #आनंदभैरव #भगवान्_दत्तात्रेय #AvdheshanandG_Quotes #AvdheshanandG_Mission
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